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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/atom10full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" gd:etag="W/&quot;DkYDRHc7fSp7ImA9WhdVFEg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789</id><updated>2011-09-19T23:12:55.905+05:30</updated><category term="Social Media" /><category term="Twitter" /><category term="राज ठाकरे" /><category term="पोर्न साइट्स" /><category term="पोल टेक" /><category term="चीन" /><category term="नई दुनिया की गलतियां" /><category term="राखी सावंत" /><category term="गांधी" /><category term="साइबर कानून" /><category term="अवॉर्ड" /><category term="शरद पवार" /><category term="holi satire" /><category term="रिएलिटी टीवी" 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xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><feedburner:emailServiceId xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0">pandeypiyush</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0">http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><entry gd:etag="W/&quot;AkEMR3k_eip7ImA9Wx9UEkw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-2358225616904195107</id><published>2011-02-09T08:00:00.001+05:30</published><updated>2011-02-09T08:01:26.742+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-02-09T08:01:26.742+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मिस्र सोशल मीडिया" /><title>मिस्र में सोशल मीडिया पर लड़ी जंग के सबब</title><content type="html">फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब और सोशल मीडिया के दूसरे औजारों की ताकत का इल्म पूरी दुनिया को है। मिस्र में प्रदर्शनकारियों ने इसकी ताकत का अहसास एक बार फिर कराया है। ईरान में 2009 में आंदोलनकारियों ने ट्विटर और यूट्यूब का इस्तेमाल कर सत्ताधीशों की चूलें हिला दी थीं और यही कहानी मिस्र में दोहरायी गई। मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के खिलाफ आंदोलनकारियों का गुस्सा इंटरनेट पर बहते हुए भौगोलिक सीमाएं लांघने लगा तो सरकार ने इंटरनेट पर ही प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि, 30 साल से सत्ता संभाल रहे होस्नी मुबारक के खिलाफ लोगों के दिलों में सुलग रही चिंगारी सोशल मीडिया के जरिए पहले ही एक भयंकर आग के रुप में तब्दील हो चुकी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ट्यूनीशिया में तानाशाह जाइन अल आबीदीन बेन अली की सरकार के खिलाफ जनमत तैयार करने में सोशल मीडिया के औजार पहले ही बड़ी भूमिका निभा चुके थे। विकीलीक्स ने सरकार की करतूतों का खुलासा किया तो फेसबुक,ट्विटर और यूट्यूब ने लोगों को आंदोलन का हिस्सा बना डाला। उन्हें एकजुट किया। ट्यूनीशिया की आग मिस्र में कब पहुंच गई, ये होस्नी मुबारक को ठीक से पता भी नहीं चल पाया। यहां भी लोग सोशल साइट्स के जरिए आपस में एक जुड़ते चले गए। आबीदीन बेन अली ने कई साइटों पर रोक लगाई थी, लेकिन घबराए मुबारक ने तो देश में इंटरनेट पर ही पूर्ण पाबंदी लगा डाली। 2007 में म्यांमार की सरकार ने इंटरनेट पर पूरी तरह पाबंदी लगायी थी और मिस्र में इंटरनेट पर रोक इतिहास में दूसरा मौका है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, सवाल सिर्फ राजनीतिक विद्रोह के बीच सोशल मीडिया के इस्तेमाल का नहीं है। सवाल है निरंकुश शासन के दमनकारी हथकंडों के बीच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का। अपनी बात न केवल कहने बल्कि दुनिया तक पहुंचाने का। खास बात है कि मिस्र में इंटरनेट पर रोक के कदम ने वर्चुअल दुनिया में घटती क्रांति को नयी दिशा दे डाली। दरअसल, गूगल और ट्विटर ने लोगों को मौखिक ट्वीट की सुविधा देकर इस क्रांति में एक नया अध्याय जोड़ दिया। गूगल ने ट्विटर से समझौता किया और मिस्र के लोगों की आवाज़ दुनिया तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया। मिस्र में मोबाइल से एसएमएस करने पर भी रोक लग चुकी थी, लिहाजा इस सेवा के लिए लोगों को तीन अंतरराष्ट्रीय नंबरों पर फोन कर अपनी बात कहनी थी। उनके संदेश ऑडियो ट्वीट की शक्ल में ट्विटर व कुछ अन्य साइट पर उपलब्ध कराए गए। महज दो-तीन दिनों में ट्विटर की इस सेवा से हजारों लोग जुड़ गए और ट्वीट करने वालों में मिस्र के अलावा कई दूसरे अरब और पश्चिमी देश के लोग शामिल हो गए। इस सेवा का बड़ा फायदा अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों को मिला, जिन्हें आम लोगों की आवाज़ में उनकी बात सुनने को मिली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिस्र में इंटरनेट सेवा अब बहाल हो गई हैं, लेकिन सवाल बरकरार है कि भविष्य में इंटरनेट पर पाबंदी के बीच क्या नए विकल्प हैं। दूसरी तरफ, मिस्र के विद्रोह में सोशल मीडिया की भूमिका ने सरकारों को भी डरा दिया है कि वो इनसे कैसे निपटें। चीन इस बाबत सबसे अधिक सतर्क है, जहां हजारों विश्लेषकों को सत्ता के पक्ष में सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर कमेंट करने के लिए तैयार किया गया है। कई मुल्कों में सरकारें अब फेसबुक-ट्विटर आदि पर नियमित नजर रखने लगी हैं। ‘द गार्जियन’ में प्रकाशित हाल में एक रिपोर्ट में कहा कहा कि मिस्र में आंदोलनकारियों के बीच ‘विद्रोह के दौरान व्यवहारिक सतर्कता’ को लेकर कुछ पर्चे बांटे गए और इसमें लिखा गया कि वो इन पर्चों को ई-मेल और फोटोकॉपी के जरिए आपस में बांटे, लेकिन फेसबुक का इस्तेमाल न करें क्योंकि सरकारी अधिकारी उस पर नजर रखे हैं। भविष्य में निरंकुश सरकारें सोशल मीडिया के भीतर तांकझांक बढ़ाएंगी, इसमें संदेह नहीं। लेकिन, बुलंद इरादे हर हाल में जाहिर होते हैं। तकनीकी युग में तो उन्हें दबाना नामुमकिन है। मिस्र में इसकी बानगी हमनें देख ली है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-2358225616904195107?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/2358225616904195107/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2011/02/blog-post.html#comment-form" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/2358225616904195107?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/2358225616904195107?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2011/02/blog-post.html" title="मिस्र में सोशल मीडिया पर लड़ी जंग के सबब" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEMHRX86eSp7ImA9Wx9QEEU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-1205097159530942692</id><published>2010-12-23T12:09:00.001+05:30</published><updated>2010-12-23T12:10:34.111+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-12-23T12:10:34.111+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लॉबिंग का सिलेबस" /><title>लॉबिंग का सिलेबस (व्यंग्य)</title><content type="html">इधर एक यूनिवर्सिटी से प्रस्ताव आया है। सिलेबस तैयार करने का। पाठ्यक्रम नया है और संभवत:  आस्ट्रेलिया, अमेरिका, मंगोलिया,कंबोडिया किसी देश की यूनिवर्सिटी में नहीं पढ़ाया जाता। कोर्स है लॉबिंग का। पत्रकार होने के नाते यूनिवर्सिटी ने मुझे ही कोर्स तैयार करने के लिए सबसे लायक आदमी समझा। पिछले दिनों यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर से एक-दो लोगों को मिलवाया था और इसी मिलने-मिलवाने की योग्यता को लॉबिंग का कोर्स तैयार करने की क्वालिफिकेशन मान कर उन्होंने यह महती जिम्मेदारी सौंप डाली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिलेबस तैयार करने के लिए दस हजार रुपए का भुगतान भी होना है, सो लालच में यह प्रस्ताव ठुकराया भी नहीं जा सकता। वैसे, शेक्सपीयर, कीट्स, कालिदास, कबीरदास, बोफोर्स,राममंदिर और 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले से जुड़े मुद्दे पर पीएचडी भी करनी होती तो परेशानी नहीं होती क्योंकि एक रात में बैठकर सारा माल इंटरनेट से उठाकर चेंपना था। लेकिन, लॉबिंग का सिलेबस कैसे तैयार करुं? किसी यूनिवर्सिटी में कोर्स है नहीं, जहां की वेबसाइट से सिलेबस उड़ा सकूं! लॉबिंग पर छह छह पन्ने छापने वाली करमजली पत्रिकाओं या अखबारों में भी इस महान काम को दक्षतापूर्वक निपटाने की योग्यता को चरणों में नहीं बताया गया। जब कोर्स कहीं है ही नहीं,तो प्रोफेसर ढूंढना मुश्किल है। और जो इस खेल के महारथी हैं, उनसे मिलने की अपनी औकात नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काश! कभी अपन भी लॉबिंग के खिलाड़ियों के साथ उठे-बैठे होते। उनकी झूठी चाय भी पी ली होती तो आज एक टुच्चे से सिलेबस तैयार करने में इतना सिरदर्द नहीं होता। लेकिन, खुदा कब मेहरबां हुआ है हम गरीबो पर? हां, इस प्रस्ताव के चक्कर में दिमाग में दो विचारणीय प्रश्न आ गए। पहला, लगभग सभी यूनिवर्सिटी का यही हाल है कि जिसे जो पढ़ाना नहीं आता, वो वही सब्जेक्ट पढ़ा रहा है। दूसरा, इस लॉबिंग के कोर्स का सिलेबस सही तरीके से तैयार कर दूं तो शायद लाखों छात्रों का भविष्य सुधर जाए। लॉबिंग करने वालों का भविष्य उज्जवल है, इसमें किसे संदेह है? दिक्कत यह कि प्रोफेशनल लॉबिस्ट यूनिवर्सिटी तैयार नहीं कर रहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लॉबिंग का कोर्स इस देश में रोजगार की नयी संभावनाएं खोल सकता है। हमारे लॉबिस्ट अमेरिकी वीजा लेकर वहां भी अपना जलवा दिखा सकते हैं। वहां भी लॉबिंग होती है, लेकिन कोर्स नहीं है। आखिर डिग्रीधारी की कुछ तो औकात होती है! खैर, राष्ट्रहित में यह महान काम मेरे कंधों पर आन पड़ा है तो मैं मुंह नहीं चुराऊंगा। हार नहीं मानूंगा। लीजिए, दिमाग में लेटेस्ट आइडिया आया है। चलूं....नीरा मैडम से मिलने का वक्त मांगता हूं। पहले निवेदन करुंगा...फिर गिड़गिडाऊंगा..लेकिन किसी भी कीमत पर मनाऊंगा....। राष्ट्रहित में वो भी कहां मना कर पाएंगी?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-1205097159530942692?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/1205097159530942692/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/12/blog-post.html#comment-form" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/1205097159530942692?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/1205097159530942692?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/12/blog-post.html" title="लॉबिंग का सिलेबस (व्यंग्य)" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0QASH88eip7ImA9WxFWEk0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-8817179152024088352</id><published>2010-05-30T13:11:00.000+05:30</published><updated>2010-05-30T13:12:29.172+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-05-30T13:12:29.172+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="फ्रॉड" /><title>काश! ये कहानी सच हो...लेकिन</title><content type="html">स्काइपे पर मुझे अभी अभी एक महाशय ने ये संदेश भेजा है। काश!वास्तव में ऐसा होता। तो मैं एक झटके में करो़ड़पति बन जाता। लेकिन, नेट जालसाजी पर लिखते लिखते जान चुका हूं कि ये सच नहीं हो सकता। हालांकि, वक्त हुआ तो एक बार फिर पड़ताल करुंगा ताकि लेख को और तथ्यों के साथ लिख सकूं। अभी इस संदेश को ट्रांसलेट करने का न मन है, न वक्त। सो यूं ही दिए दे रहा हूं ताकि लोग सचेत हो सकें। क्योंकि पांच हजार मारे गए लोगों में आपके सरनेम का भी कोई न कोई होगा ही :-)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;Hello    Pandey,&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;I have tried to reach you on Skype phone, but your line was busy, so I decided to write you this message.  I have been in search of someone with this last  name "Pandey", so when I saw you online, I was pushed to contact you and see how best we can assist each other. I am YAQOOB Y. HASSAN, a Bank Officer here  in U. A. E. I believe it is the wish of God for me to come across you now. I am having an important business discussion I wish to share with you which I  believe will interest you, because it is in connection with your last name and you are going to benefit from it. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;One Late Michael  Pandey, a citizen of your country had a fixed deposit with my bank in 2004 for 60 calendar months, valued at US$26,700,000.00 (Twenty Six Million, Seven Hundred Thousand US Dollars) the due date for this deposit contract was last 22nd of February 2009.  Sadly Michael was among the death victims in   the May 26 2006 Earthquake disaster in Jawa, Indonesia that killed over 5,000 people.  He was in Indonesia on a business trip and  that was how he met his   end.  My bank management is yet to know about his death, I knew about it because he was my friend and I am his account officer.  Michael did not mention any   Next of Kin/ Heir when the account was opened, and he was not married and no children.  Last week my Bank Management requested that Michael should give  instructions on what to do about his funds, if to renew the contract.  I know this will  happen and that is why I have been looking for a means to handle the   situation, because if my Bank Directors happens to know that Michael is dead and do not have any Heir, they will take the funds for their personal  use, so I  don't want such to happen.  That was why when I saw your last name I was happy and I am now seeking your co-operation to present you as Next of Kin/ Heir to   the account, since you have the same last name with him and my bank head quarters will release the account to you. There is no risk involved; the transaction   will be executed under a legitimate arrangement that will protect you from any breach of law.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;It is better that we claim the money, than allowing the Bank Directors to take it, they are rich already.  I am not a greedy person, so I am suggesting we   share the funds equal, 50/50% to both parties, my share will assist me to start my own company which has been my dream.  Let me know your mind on this and   please do treat this information as TOP SECRET. We shall go over the details once I receive your urgent response strictly through my personal email address, yygohassb8@gmail.com&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;We can as well discuss this on phone; let me know when you will be available to speak with me on Skype.  Have a nice day and God bless. Anticipating your  communication.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;Yaqoob Y. Hassan.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-8817179152024088352?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/8817179152024088352/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/05/blog-post_30.html#comment-form" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/8817179152024088352?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/8817179152024088352?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/05/blog-post_30.html" title="काश! ये कहानी सच हो...लेकिन" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEQGSHo5eSp7ImA9WxFXF00.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-8090418651616848112</id><published>2010-05-24T18:34:00.001+05:30</published><updated>2010-05-24T18:35:29.421+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-05-24T18:35:29.421+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="Twitter queen britney" /><title>ब्रिटनी स्पीयर्स के Twitter Queen बनने का मतलब</title><content type="html">पॉप गायिका ब्रिटनी स्पीयर्स आखिरकार माइक्रोब्लॉगिंग साइट टविटर की रानी बन गईं। उन्होंने आज हॉलीवुड अभिनेता एस्टन कुचर को प्रशंसकों यानी फॉलोअर्स की संख्या के मामले में पीट दिया। ब्रिटनी स्पीयर्स अब संभवत: 50 लाख प्रशंसकों का आंकड़ा छूने वाली पहली महिला होंगी। क्योंकि, 49 लाख के बाद शुरु हुई जंग में ब्रिटनी स्पीयर्स कुचर से काफी आगे निकल गई हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस खबर को जानने के बाद अगर आप यह मानते हैं कि ब्रिटनी स्पीयर्स वास्तव में ट्विटर क्वीन बन गई हैं,तो आप गलत हैं। दरअसल, एस्टन और ब्रिटनी के बीच ट्विटर की लड़ाई के बीच एक बात अलग है। वो यह कि एस्टन कुचर न सिर्फ ट्विटर पर सबसे पहले दस लाख प्रशंसक जुटाने वाले पहले शख्स हैं,बल्कि वो पहले सेलेब्रिटी हैं,जिन्होंने ट्विटर की ताकत को अपनी पब्लिसिटी के जरिए भुनाया। कुचर लगातार प्रशंसकों से ट्विटर पर संवाद करते हैं, और घर परिवार से लेकर अपनी फिल्मों तक की बात ट्विटर पर करते हैं। वो एक सेलेब्रिटी हैं, लिहाजा चुनिंदा लोगों को फॉलो करते हैं। ये संख्या करीब 560 है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ, ब्रिटनी स्पीयर्स ने ट्विटर की ताकत का इस्तेमाल करने के लिए एक टीम गठित की है, जो लगातार न सिर्फ ट्वीट करती है। बल्कि, उनके ट्वीट को कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जाए-इसके तरीके खोजती है। इसी रणनीति के तरह ब्रिटनी स्पीयर्स 4 लाख से ज्यादा लोगों को फॉलो करती हैं। वो खुद ट्वीट नहीं करतीं, इसलिए ट्विटर में अपनत्व का भाव नहीं रहता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, ब्रिटनी की इस जीत का मतलब यह है कि रणनीतिक तरीके से अब ट्विटर का इस्तेमाल हो रहा है। निजी स्तर से लेकर कॉरपोरेट स्तर तक अब माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर के जरिए लोगों से संवाद करने की गुंजाइश खोजी जा रही है, और इसके लिए धन खर्च किया जा रहा है। अमेरिका में यह प्रचलन बहुत अधिक है,जबकि भारत में कई सेलेब्रिटी का एकाउंट पब्लिक रिलेशन कंपनियां संभाल रही हैं,तो कॉरपोरेट स्तर पर सोशल मीडिया मैनेजरों की नियुक्ति हो रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन,सवाल सिर्फ फॉलोअर्स की संख्या का नहीं है। सवाल है कि ब्रिटनी स्पीयर्स-ओबामा-कुचर सरीखे लोग अपने ट्वीट के जरिए क्या कह रहे हैं। यही सवाल भारतीय हस्तियों पर भी लागू होता है। लेकिन, भारतीय ट्विटर हस्तियां अभी आंकड़ों के गणित में उलझी हैं। और उनसे अधिक मीडिया उलझा है इस आंकड़ों के जाल में,जो रोजाना बताता है कि सचिन के कितने फॉलोअर्स हैं और अमिताभ के कितने। या शाहरुख अभी भी ट्विटर के बादशाह हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, जानकारी के लिए भारत में शशि थरुर ही अभी ट्विटर के शहंशाह हैं, क्योंकि शाहरुख या सचिन अभी उनकी तुलना में आधे प्रशंसक भी नहीं जुटा पाए हैं। शशि थरुर आठ लाख फॉलोअर्स पाने जा रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-8090418651616848112?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/8090418651616848112/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/05/twitter-queen.html#comment-form" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/8090418651616848112?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/8090418651616848112?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/05/twitter-queen.html" title="ब्रिटनी स्पीयर्स के Twitter Queen बनने का मतलब" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0EASXo5eSp7ImA9WxFXEEU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-8014661745566200916</id><published>2010-05-17T13:03:00.000+05:30</published><updated>2010-05-17T13:04:08.421+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-05-17T13:04:08.421+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="फेसबुक" /><title>‘अलविदा फेसबुक’ कहना हो तो !</title><content type="html">सोशल नेटवर्किंग साइट ‘फेसबुक’ के उपयोक्ताओं का एक देश बन जाए तो जनसंख्या के लिहाज से यह  चीन और भारत के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मुल्क होगा। आशय यह कि दुनिया भर में फेसबुक के उपयोक्ताओं की संख्या दिन दोगुनी गति से बढ़ रही है, और नेटवर्किंग-न्यूज-गेम्स समेत तमाम सुविधाओं वाले इस पैकेज को पूरी दुनिया अपना चुकी है। लेकिन, फेसबुक की बढ़ती लोकप्रियता के बीच नए खतरों की आशंकाओं ने एक बड़े तबके को इस प्लेटफॉर्म की उपयोगिता के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल में इंटरनेट सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी वेरीसाइन की इकाई आईडिफेंस ने खुलासा किया कि करीब 15 लाख फेसबुक एकाउंट बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। किर्लोस नाम के एक कथित हैकर ने इन खातों को ऑनलाइन बिक्री के लिए रखा। 10 मित्रों से कम संख्या वाले फेसबुक खाते 10 डॉलर और दस से अधिक मित्रों वाले एकाउंट 45 डॉलर में बेचने की बात कही गई। हालांकि, फेसबुक ने इस खुलासे को खारिज कर दिया लेकिन आईडिफेंस ने साफ कहा कि ऑनलाइन ठगी, स्पैम भेजने और डाटा चुराने वाले प्रोग्राम भेजने के उद्देश्य से इन एकाउंट्स को बेचा जा रहा है। ‘फेसबुक’ की प्राइवेसी सैटिंग्स का विवाद तो लगातार चल ही रहा है। फेसबुक में चंद दिन पहले कुछ ऐसे बग यानी कमियां उजागर हुई थीं, जिनके जरिए आसानी से प्राइवेसी सैटिंग्स को धता बताया जा सकता है। जानकारों के मुताबिक, फेसबुक के ऑनलाइन विज्ञापनों के जरिए उपयोक्ता के कंप्यूटर में सेंध लग सकती है। यहां उपलब्ध सैकड़ों प्रोफाइल फर्जी हैं, जिनका इस्तेमाल स्पैमर्स कर रहे हैं। फेसबुक आपकी जानकारी को तीसरी कंपनी के साथ बांट सकती है। हर बार साइट री-डिजाइन के साथ आपकी प्राइवेसी सैटिंग्स को कम स्तर पर ला सकती है यानी व्यवसायिक लाभ के लिए आपकी निजता को प्रभावित किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फेसबुक से तलाक के बढ़ते मामले, अपराधों में इस प्लेटफॉर्म की बढ़ती भूमिका और दफ्तरों में घटते उत्पादन घंटे से जुड़ी खबरें लगातार सुर्खियां बनती रही हैं। पचास करोड़ से अधिक उपयोक्ताओं वाली इस सोशल नेटवर्किंग साइट के इस्तेमाल की लत को फेसबुक एडिक्शन डिसॉर्डर के नाम से जाना जा रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, सवाल फेसबुक की लत का नहीं, इससे दूर होने का है। फेसबुक का एक तबका निजता भंग होने से लेकर तमाम संभावित खतरों से बचने के उद्देश्य से इस प्लेटफॉर्म को अलविदा कहना चाहता है। पर क्या यह इतना आसान है? फेसबुक पर डिसेक्टिव एकाउंट और डिलीट एकाउंट का लिंक खोजना ही इतना कठिन है कि सैकड़ों लोग अपना खाता डिलीट करने का इरादा बदल देते हैं। दरअसल, नेट पर अपना आधिपत्य स्थापित करने में जुटी फेसबुक का साम्राज्य ग्राहकों की संख्या से ही निर्धारित हो रहा है, और इन्हीं के बूते फेसबुक को करोड़ों डॉलर का विज्ञापन मिल रहा है। फिर भी अगर आप फेसबुक को कभी अलविदा कहना चाहें तो एकाउंट सैटिंग्स में जाकर डिसेक्टिव एकाउंट का लिंक पा सकते हैं। हालांकि, इस लिंक पर क्लिक करते ही अचानक आपके फेसबुक मित्र इस संदेश के साथ प्रगट होंगे कि वो आपको मिस करेंगे। लेकिन, अगर आप एकाउंट को खत्म ही कर देना चाहते हैं तो आप फेसबुक के हेल्प सेंटर में जाकर सर्च बॉक्स में डिलीट एकाउंट सर्च कीजिए। याद रखिए डिलीट करने के बाद भी 14 दिनों तक आपका डाटा सुरक्षित रहेगा। इस दौरान आपने कभी भी फेसबुक में लॉगिन की कोशिश की तो एकाउंट एक्टिव हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतलब यह कि फेसबुक को अलविदा कहना आसान नहीं है। वैसे, थोड़ी सी जागरुकता के साथ सोशल नेटवर्किंग के इस सबसे लोकप्रिय माध्यम का भरपूर लाभ भी उठाया जा सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-8014661745566200916?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/8014661745566200916/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/05/blog-post_17.html#comment-form" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/8014661745566200916?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/8014661745566200916?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/05/blog-post_17.html" title="‘अलविदा फेसबुक’ कहना हो तो !" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkMBSX88eip7ImA9WxFQEk8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-6179106546549569228</id><published>2010-05-07T13:46:00.002+05:30</published><updated>2010-05-07T13:50:58.172+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-05-07T13:50:58.172+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हिन्दी में डोमेन नेम" /><title>ध्यान दें- http://موقع.وزارة-الأتصالات.مصر</title><content type="html">छह मई का दिन इंटरनेट के 40 साल के इतिहास में एक अहम दिन बनकर उभरा, लेकिन संभवत: उस ऐतिहासिक घटना को ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई। इंटरनेट कॉरपोरेशन फॉर असाइन्ड नेम्स एंड नंबर (आईसीएएनएन) ने आखिरकार अंग्रेजी से इतर यानी नॉन लैटिन भाषा में तीन डोमेन नामों को मंजूरी दे दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें से एक को आप यहां देख सकते हैं- http://موقع.وزارة-الأتصالات.مصر&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि पिछले साल तीस अक्टूबर को सिओल में हुई बैठक में आईसीएएनएन ने तय किया था कि लैटिन भाषा के अक्षरों के अलावा दुनिया के कई मुल्कों की भाषाओं में भी इंटरनेट पते लिखे जाएं। इंटरनेट के 40 साल के इतिहास में आईसीएएनएन का यह फैसला ऐतिहासिक साबित हो सकता है-ये बात तो तभी साबित हो गई थी, लेकिन अरबी भाषा में पहला यूआरएल देखकर अब इस बात को महसूस किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका अर्थ यह है कि अब देवनागिरी लिपी में भी जल्द ही वेब पते लिखे जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजी में महारथी माने जाने वाले शुरुआती भारतीय इंटरनेट उपभोक्ताओं को इसकी आवश्यकता महसूस कभी नहीं हुई। लेकिन, इंटरनेट के फलक के विस्तार के साथ भारतीयों खासकर ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के बीच हिन्दी व दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में इंटरनेट की जरुरत दिखायी देने लगी है। अब हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं में वेबसाइट्स बन रही हैं। यूनिकोड ने फॉन्ट की समस्या को भी बहुत हद तक दूर किया है। हिन्दी में सर्च इंजन वेबसाइट खोजने की सुविधा दे रहे हैं। देवनागरी लिपी के की-बोर्ड बाज़ार में मिलने लगे हैं। लेकिन, वेब पतों का अंग्रेजी में होना कई लोगों के लिए व्यवहारिक परेशानी रहा है, क्योंकि उन्हें रोमन लिपी में टाइप करना नहीं आता अथवा झंझट लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, अरबी भाषा में डोमेन नेम को मंजूरी मिलने के बाद हिन्दी समेत कई भाषाओं में वेब एड्रेस लिखे दिखेंगे। &lt;br /&gt;आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के करीब 1.6 बिलियन इंटरनेट उपयोक्ताओं में आधे से ज्यादा अपनी प्राथमिक भाषा के रुप में अंग्रेजी का इस्तेमाल नहीं करते हैं। सिर्फ इस आंकड़े के बीच ही वेब एड्रेस में अंग्रेजी के प्रभुत्व के खत्म होने की दरकार समझी जा सकती है। हालांकि, चीन इस दिशा में पहले ही कदम उठा चुका है, जहां वेब पते चीनी भाषा लिखने की शुरुआत हो चुकी है। हान्यू पिनयिन सिस्टम के जरिए वेबसाइट चीनी भाषा के अक्षरों को लैटिन में ट्रांसलेट करती है। लेकिन, अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं होने और कई दूसरी तकनीकी समस्याओं के चलते चीन की कोशिश पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, अरबी भाषा में बनी मिस्र के सूचना मंत्रालय की इस साइट को देखने का अपना सुख है,क्योंकि इसका डोमेन नेम अंग्रेजी से इतर भाषा में लिखा गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-6179106546549569228?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/6179106546549569228/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/05/http.html#comment-form" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/6179106546549569228?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/6179106546549569228?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/05/http.html" title="ध्यान दें- http://موقع.وزارة-الأتصالات.مصر" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;A0QHQ349fip7ImA9WxFRGUk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-9143271223554589935</id><published>2010-05-04T10:31:00.000+05:30</published><updated>2010-05-04T10:32:12.066+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-05-04T10:32:12.066+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="नीतीश कुमार का ब्लॉग" /><title>नीतीश से ह्यूगो तक सोशल मीडिया का फैलता दायरा</title><content type="html">बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज़ में क्या कोई समानता है? बिलकुल नहीं। सिवाय इसके कि दोनों राजनेता सत्तासीन हैं और लगभग एक वक्त में सोशल मीडिया की अहमियत से रुबरु हुए हैं। नीतीश कुमार ने आम लोगों से संवाद करने के लिए ब्लॉग का मंच चुना है, तो ह्यूगो ने माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर का। आरंभिक दौर में इन दोनों का शानदार स्वागत हुआ है। नीतीश कुमार के ब्लॉग पर पाठकों की टिप्पणियां और ह्यूगो के ट्विटर खाते के ‘फॉलोअर्स’ इस बात की तस्दीक करते हैं। नीतीश की मुख्यमंत्री बालिका योजना पर लिखी पोस्ट पर तो करीब 700 टिप्पणियां आईं और मुख्यधारा के मीडिया में उनके ब्लॉग ने खासी सुर्खियां बटोरी। जबकि ह्यूगो ट्विटर पर अभी तक करीब पौने दो लाख प्रशंसक जोड़ चुके हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, बात नीतीश के ब्लॉग अथवा ह्यूगो के ट्विटर खाते की लोकप्रियता की नहीं है। सवाल है सोशल मीडिया के उपयोग को लेकर इनके उद्देश्य का। आखिर, नीतीश कुमार ब्लॉगिंग क्यों करना चाहते हैं? या ह्यूगो को अचानक ट्विटर पर आने की आवश्यकता क्यों पड़ी? ये सवाल इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया के मंच को इन्होंने जिस वक्त चुना है, वो चुनावी फिजां के बनने का दौर है, जब राजनेताओं को प्रचार के लिए अलग अलग माध्यमों की दरकार होती है। ब्लॉग से लेकर ट्विटर तक सोशल मीडिया के मंच की खासियत यह है कि यहां अपनी उपलब्धियों के बखान से लेकर विरोधियों को साधने का काम आसानी से किया जा सकता है। इस दौरान पत्रकारों से टेड़े सवालों से बचा जा सकता है, जबकि राज्य या राष्ट्र प्रमुख होने के नाते मुख्यधारा का मीडिया आपकी बात को जगह देता ही है। उल्लेखनीय है कि बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं,जबकि वेनेजुएला में संभवत: अगले साल के आखिर में राष्ट्रपति पद के चुनाव होंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यही है कि क्या नीतीश कुमार या ह्यूगो का सोशल मीडिया पर आना सिर्फ चुनावी रणनीति का हिस्सा भर है अथवा इन नए मंचों से दोनों का जनता से संवाद बरकरार रहेगा? ये आशंका फिजूल नहीं है। अमेरिका में सोशल मीडिया के रथ पर सवार होकर राष्ट्रपति बने बराक ओबामा की सफलता के बाद से भारतीय राजनीति में इन नए माध्यमों को ‘चमत्कार’ के रुप में देखा जा रहा है, लिहाजा चुनाव के वक्त अचानक ब्लॉग-साइट रुपी जिन्न बोतल से बाहर निकलते हैं।पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान हम इस तमाशे को देख चुके हैं, जब उम्मीदवारों ने सिर्फ इस मकसद से ब्लॉग-वेबसाइट बनाए कि वो जादू कर देंगे। लेकिन, चुनावी हल्ला खत्म हुआ तो ब्लॉग और वेबसाइट ढह गईं। इसका अर्थ यही है कि राजनेताओं ने सोशल मीडिया की अहमियत को पहचानने के बजाय इसे ‘अलादीन का जिन्न’ समझा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे उदाहरणों की लंबी फेहरिस्त है। बीजेपी के दिग्गज नेता डॉ.मुरली मनोहर जोशी ने अपना ब्लॉग पिछले साल अक्टूबर के बाद अपडेट नहीं किया। बीजेपी के शाहनवाज हुसैन ने चुनावी फिजां में अपनी वेबसाइट बनवाई, जो आज बिगड़ी हालत में है। फिल्म निर्देशक प्रकाश झा ने चंपारण से चुनाव लड़ते वक्त जोरशोर से ब्लॉगिंग शुरु की, लेकिन आज उनका ब्लॉग भी ठंडा पड़ा है। राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव तो साल 2008 में ही ब्लॉगिंग का शौक फरमा कर भूल गए। कांग्रेस नेता एसएमकृष्णा और मल्लिका साराभाई जैसे तमाम दिग्गजों ने लोकसभा चुनावों के दौरान ट्विटरिंग शुरु की, लेकिन चुनावों के बाद सब शांत हो गया। यहां तक कि बीजेपी ने अपना ट्विटर एकाउंट शुरु किया था, जिसे पिछले साल जुलाई के बाद अपडेट नहीं किया गया। बात सिर्फ ब्लॉग, ट्विटर एकाउंट या निजी वेबसाइट की भी नहीं है। सूचना क्रांति के दौर में साइबर हाइवे पर राजनीतिक दलों का चेहरा यानी पार्टी की वेबसाइट्स को जिस तरह चुनावी फिजां के वक्त चमकाया गया, वो चुनाव खत्म होते ही उपेक्षित हो गईं। छोटे राजनीतिक दलों की बात क्या कहनी, बड़ी पार्टियों की साइट्स में कई त्रुटियां अथवा अधूरापन है। कांग्रेस की वेबसाइट पर पार्टी के लोकसभा सांसदों की सूची से शशि थरुर का नाम गायब है, तो बीजेपी की वेबसाइट पर ‘भंडाफोड़’ आंदोलन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। समाजवादी पार्टी की साइट तो आज भी जनेश्वर मिश्र को जीवित रखे हुए है। बिहार के दोनों प्रमुख दलों की बात करें तो राष्ट्रीय जनता दल की कोई आधिकारिक साइट नहीं है। पार्टी के सदस्यों द्वारा निजी स्तर पर चलाई जा रही एक साइट अवश्य है। इस पर रेल बजट जैसी पुरानी सूचनाएं होमपेज पर टंगी दिखती हैं, तो लालू प्रसाद यादव से संवाद का कोई जरिया नहीं दिखता। लेकिन, जनता दल यूनाइटेड की तो इंटरनेट पर कोई उपस्थिति नहीं दिखती। बिहार में विधानसभा चुनावों की आहट के बीच यदि लोग(खासकर राज्य के बाहर के) वहां की राजनीतिक पार्टियों के ज़िला स्तर के नेताओं का ठौर-ठिकाना जानना चाहेंगे तो सबसे पहले इंटरनेट पर ‘गूगल देवता’ की शरण में जाकर संबंधित जानकारी से जुड़े कुछ ‘की वर्ड’ टाइप करेंगे और प्रतीक्षा करेंगे वांछित सूचना के मॉनीटर पर चमकने की। लेकिन, राज्य की प्रमुख पार्टियों की आधाकारिक वेबसाइट ही नहीं है तो उनके क्षेत्रीय नेताओं से जुड़ी जानकारी तो दूर की कौड़ी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उल्लेखनीय है कि भारत में इस वक्त करीब आठ करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं,जो करीब 30 से 40 फीसदी की दर से प्रतिवर्ष बढ़ रहे हैं। इन उपभोक्ताओं की कुल तादाद का करीब 30-40 फीसदी ‘नॉन मेट्रो’ शहरों से है। इसके अलावा, भारत में करीब 50 करोड़ लोगों के पास मोबाइल फोन है, जिसमें एक तिहाई फोन पर इंटरनेट एक्सेस किया जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, भारत में इंटरनेट के तेज़ी से बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद राजनीतिक पार्टियों को इसकी अहमियत अभी तक ठीक से समझ नहीं आयी है। राजनेता या तो इस माध्यम को बकवास मान बैठते हैं या चमत्कारी। बात सिर्फ इंटरनेट पर एक साइट बनाने की नहीं है। इंटरनेट प्रचार का सशक्त माध्यम है। इसके जरिए राजनीति से दूर युवाओं को वोटर में तब्दील किया जा सकता है। साइट-ब्लॉग द्विगामी संवाद का जरिया भी बन सकते हैं। आखिर,दिल्ली में बैठकर क्यों कोई शख्स अपनी पसंदीदा पार्टी के छपरा-मधुबनी या किसी भी छोटे शहर के राजनेताओं से संपर्क नहीं साध सकता? आधुनिक युग में भी क्यों एक वोटर को विधायक या सांसद से अपनी बात कहने में मशक्कत करनी पड़ती है? लेकिन,ऐसा है क्योंकि पार्टियां इंटरनेट की ताकत का समुचित इस्तेमाल नहीं कर रहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि, कुछ राजनेता निजी स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। नीतीश कुमार भी इस फेहरिस्त में शामिल हो गए हैं। अंग्रेजी से ब्लॉगिंग की शुरुआत करने वाले नीतीश पाठकों की शिकायत के बाद हिन्दी में पोस्ट लिख रहे हैं। वो पाठकों की प्रतिक्रियाएं पढ़ रहे हैं और लोगों से संवाद कर रहे हैं-यह सक्रिय और समझदार ब्लॉगर के लक्षण हैं। लेकिन, एक मुख्यमंत्री का ब्लॉग बेहतर डिजाइन किया हुआ और व्यवस्थित होना चाहिए-जो नीतीश का नहीं है। लेकिन, बड़ा सवाल यह है कि क्या ब्लॉगर नीतीश चुनावों के बाद भी सक्रिय रहेंगे? दूसरी तरफ, ह्यूगो समझ चुके हैं कि वेनेजुएला में अब ट्विटर का बोलबाला है। इस छोटे से देश में दो लाख से ज्यादा सक्रिय ट्विटर उपयोक्ता हैं,और पिछले एक साल में वहां इनकी संख्या में 1000 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। ह्यूगो का कहना है कि वो सोशल मीडिया पर मुख्यत: विरोधियों के दुष्प्रचार का जवाब देने के लिए आए हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल,नीतीश से ह्यूगो तक सोशल मीडिया के अलग अलग औजारों का इस्तेमाल करने वाले राजनेताओं को समझना होगा कि यह चमत्कारी माध्यम नहीं है। हां, यह नया माध्यम आम लोगों (वोटरों) से उस संवाद की गुंजाइश बनाता है, जो विश्वसनीयता पैदा करने का काम कर सकती है। और इसमें कोई दो राय नहीं कि आज राजनीतिक दलों और राजनेताओं को इस ’क्रेडेबिलिटी’ की सख्त आवश्यकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-9143271223554589935?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/9143271223554589935/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/05/blog-post.html#comment-form" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/9143271223554589935?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/9143271223554589935?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/05/blog-post.html" title="नीतीश से ह्यूगो तक सोशल मीडिया का फैलता दायरा" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CUAERX47cSp7ImA9WxFSGUw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-6161570658083301430</id><published>2010-04-22T00:44:00.004+05:30</published><updated>2010-04-22T10:51:44.009+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-04-22T10:51:44.009+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मुंबई इंडियंस" /><title>अब इस गलती का क्या कीजै?</title><content type="html">कभी कभी जल्दबाजी में बड़ी दिलचस्प गलतियां मीडिया संस्थान करते हैं। सहारा समय की वेबसाइट में हाल में बहुत बदलाव हुए हैं और साइट बहुत तेजी से अपडेट संभवत: हो रही है। लेकिन, इस जल्दबाजी में मित्रों ने मुंबई इंडियंस को सेमीफाइनल जीतने के बावजूद सेमीफाइनल में पहुंचा हुआ ही माना। होमपेज पर तो देखने पर लगता है कि साइट अपडेट नहीं हुई क्योंकि शीर्षक दिखता है-शान से सेमीफाइनल में पहुंचा मुंबई इंडियंस। लेकिन, भीतर जाने पर पता चलता है कि मुंबई इंडियंस के फाइनल में पहुंचने की खबर को ही इस शीर्षक से डाला गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/S89OuOZmTZI/AAAAAAAAACE/XwUOEoOlBm8/s1600/sahara-imp.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/S89OuOZmTZI/AAAAAAAAACE/XwUOEoOlBm8/s320/sahara-imp.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5462671429070114194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-6161570658083301430?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/6161570658083301430/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/04/blog-post_22.html#comment-form" title="4 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/6161570658083301430?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/6161570658083301430?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/04/blog-post_22.html" title="अब इस गलती का क्या कीजै?" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/S89OuOZmTZI/AAAAAAAAACE/XwUOEoOlBm8/s72-c/sahara-imp.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>4</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkMMQnw6fip7ImA9WxFSFks.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-1087106566049879558</id><published>2010-04-19T13:36:00.001+05:30</published><updated>2010-04-19T13:38:03.216+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-04-19T13:38:03.216+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पुलित्जर पुरस्कार" /><title>'प्रो पब्लिका' को पुलित्ज़र अवॉर्ड के मायने</title><content type="html">अमेरिका के कोलंबिया स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म ने 12 अप्रैल को 94वें पुलित्जर पुरस्कारों का ऐलान किया तो पहली बार ऑनलाइन समाचार साइट के महत्व पर खास मुहर लग गई। खोजी पत्रकारिता की श्रेणी में एक अवॉर्ड “प्रो पब्लिका डॉट ऑर्ग” को दिया गया है। पेशे से डॉक्टर और न्यूरोसाइंस में पीएचडी कर चुकीं शेरी फिंक ने प्रो पब्लिका के लिए एक खोजी रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट में उन्होंने खुलासा किया था कि किस तरह कैलिफोर्निया में कैटरीना तूफान के वक्त न्यू ऑर्लिन्स नर्सिंग होम में मौजूद डॉक्टरों ने अफरातफरी के बीच बुजुर्ग मरीजों को प्राणघातक दवा दे दी। नर्सिंग होम में बिजली नहीं थी। जेननेटर बंद हो चुका था। अस्पताल का बाहरी दुनिया से संपर्क कट गया था। जीवन रक्षक उपकरणों की कमी पड़ने लगी तो डॉक्टरों ने यह तरीका आजमाया। सबसे पहले प्रो पब्लिका पर आई इस रिपोर्ट को कुछ रेडियो स्टेशनों ने प्रसारित किया और कैटरीना तूफान से मची तबाही की चौथी बरसी पर न्यूयॉर्क टाइम्स ने पूरी रिपोर्ट को फिर प्रकाशित किया, जिसने सारी दुनिया का ध्यान खींचा। इस मामले में नए सिरे से जांच शुरु हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, सवाल प्रो पब्लिका का नहीं, पुलित्जर का है। पुलित्जर प्राइज बोर्ड ने हाल में नियमों में कुछ ढील दी है, जिसके बाद न्यूज साइट्स को भी रिपोर्ट नामांकित करने की सुविधा मिली। इस साल 1,103 नामांकनों के बीच प्रो पब्लिका ने भी अवॉर्ड जीता है। लेकिन,प्रो पब्लिका को पुलित्जर मिलने की अहमियत सिर्फ इसलिए नहीं है क्योंकि पहली बार किसी समाचार साइट को इतना प्रतिष्ठित अवॉर्ड मिला है। अहमियत इसलिए अधिक है क्योंकि प्रो पब्लिका किसी बड़े समाचार पत्र अथवा टेलीविजन चैनल की वेबसाइट नहीं है। यह एक स्वतंत्र और गैर व्यवसायिक न्यूज साइट है, जो लगातार सामाजिक सरोकारों की रिपोर्ट देती रहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि प्रो पब्लिका पहली वेबसाइट है, जिसने अपने बूते कोई खोजी रिपोर्ट दी हो। 1998 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और मोनिका लुइंसकी मामले का खुलासा ड्रजरिपोर्टडॉटकॉम ने किया था। भारत में भी तहलकाडॉटकॉम ने मैच फिक्सिंग से लेकर कई अहम मामलों का खुलासा किया। लेकिन, प्रो पब्लिका के गैर व्यवसायिक मॉडल ने अब सामाजिक मसलों या आम लोगों के हितों की पत्रकारिता करने वाली वेबसाइट्स को नयी राह दिखा दी है। प्रो पब्लिका की अर्थव्यवस्था सैंडरल फाउंडेशन के फंड और लोगों की सहयोग राशि यानी दान से संचालित होती है। पुलित्जर अवॉर्ड के बाद लोगों के बीच इसकी साख और मजबूत हुई है, जिससे साइट को आर्थिक लाभ होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में अभी ऑनलाइन पत्रकारिता की स्थिति इतनी बेहतर नहीं है, लेकिन न्यूज साइट्स के पाठक तेजी से बढ़े हैं। इस बीच,सामाजिक सरोकारों की बात करने वाली कई वेबसाइट्स खड़ी हुई हैं। प्रो पब्लिका की तरह अगर इन साइट्स पर बेहतरीन रिपोर्ट मिलें तो न केवल मीडिया में आम आदमी की आवाज़ मुखर होगी बल्कि मुख्यधारा का मीडिया भी इन्हें गंभीरता से लेना शुरु करेगा। फिर, मीडिया के मुनाफे से संचालित होने के आरोपों के बीच प्रो पब्लिका मुनाफारहित पत्रकारिता की संभावना का बिगुल तो बजाती ही है। प्रो पब्लिका का नारा है-जनता के हितों की पत्रकारिता और इसी उद्देश्य के साथ उसने अपनी पहचान बनायी है, जो इसी राह पर चलने वाली कई दूसरी न्यूज साइट्स के लिए उम्मीद जगाती हैं। हालांकि, हिन्दी में यह तब तक संभव नहीं दिखता, जब तक कुछ गैर सरकारी संगठन इस तरह की साइट्स को बढ़ावा न दें। क्योंकि हिन्दी में बड़ी संख्या में पाठकों को खींचना एक दिन का काम नहीं है, जिसके लिए सतत प्रयास और बेहतर रिपोर्टिंग की आवश्यकता होगी। हां, इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत जैसे देश में प्रो पब्लिका मॉडल की साइट की जरुरत बहुत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-1087106566049879558?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/1087106566049879558/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/04/blog-post.html#comment-form" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/1087106566049879558?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/1087106566049879558?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/04/blog-post.html" title="'प्रो पब्लिका' को पुलित्ज़र अवॉर्ड के मायने" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;A0AHRHs4cCp7ImA9WxBaFE4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-8352743550204003022</id><published>2010-03-24T19:37:00.001+05:30</published><updated>2010-03-24T19:38:55.538+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-03-24T19:38:55.538+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="व्यंग्य" /><title>पार्लियामेंट में सीटी(व्यंग्य)</title><content type="html">जापान की टोकूमोकूरोकू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों का दल संसद में बैठा भारतीय सांसदों की तरफ कातर निगाहों से ताक रहा है। कोई माई का लाल नहीं है क्या चिल्लाने वाला ! किसी ने इतना दूध नहीं पीया कि स्पीकर की कुर्सी के पास पहुंचकर विधेयक की चिंदी-चिंदी कर फूल सा उड़ा दे ! कोई पहलवान नहीं, जो विपक्षी की ऐसी तैसी करते हुए अपने नए शब्दों से हिन्दी-उर्दू को समृद्ध कर दे! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जापानी हैरान-परेशान हैं। आखिर, इसी संसद से लाइव टेलीकास्ट पर जो दिखता था-वो तो इस कदर खतरनाक था,मानो ओबामा का ट्रेनिंग स्कूल चल रहा हो। माइक फेंकते सांसद ऐसे लगते थे कि इस बार आसमान में सुराग करके ही दम लेंगे। अपने जन्मसिद्ध अधिकार यानी चिल्लाने के कंपटीशन में सांसद कब फेफड़ा बाहर निकालने के कंपटीशन से एकाकार हो जाते-ये गहन शोध का विषय था। स्पीकर नामक प्राणी की बेइज्जती का सट्टे से तो कोई संबंध नहीं-जापानियों की रिसर्च का सब्जेक्ट यह भी था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, जापान से इंडिया की फ्लाइट पकड़कर संसद पहुंचते पहुंचते ऐसा क्या हो लिया कि पूरा समां बदल गया? मामला विकट कन्फ्यूजन का था। संसद में अब अचानक सुर लहरियां गूंज रही थीं। शोर तो दूर दूर तक नहीं। हर तरफ से मधुर सीटी की आवाज। शाहरुख के फैन जापानी ताड़ रहे थे कि कोई ‘तू मेरे सामने, मैं तेरे सामने, तुझको देखूं तो प्यार करुं’ सीटिया रहा है तो कोई ‘मेरी महबूबा’ को। पार्लियामेंट में विधेयक पर चर्चा शुरु हुई तो सीटी बजाते बजाते सांसद वोटिंग कर रहे हैं। संसद का दंगल कहीं नहीं, मुहब्बत के तराने चहुं ओर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंडियन सिस्टम को समझने वाला जापानी दल का अगुआ समझ रहा है इंडियन कल्चर में सीटी का महत्व। प्रेशर कुकर की सीटी न बजे तो खेल हो ले। होंठ घूमा,सीटी बजा और गाड़ी बुला रही है,सीटी बजा रही है-जैसे गाने बनने से पहले दम तोड़ देते। थिएटर में अगली कतार में बैठे दर्शकों की सीटियां ही बॉलीवुड फिल्मों की सफलता की गारंटी होती हैं। लड़कियों को छेड़ने में सीटी का अहम रोल है,लेकिन रिसर्च बताती हैं कि लड़की को सिर्फ सीटी से छेड़ा छाए तो लड़कियों का मन भी मदमस्त हो जाता है। चालाक लड़कियां इस दौरान बुदबुदाती हैं-साला,मेरे बाप का क्या जाता है, बोर हो रही थी,तू सीटी बजा कर मनोरंजन कर रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर,इंडियन कल्चर में सीटी का नहीं,सवाल पार्लियामेंट में सीटी का था। जवाब मिला तो जापानी भौंचक। पार्लियामेंट में दो दिन पहले ही महिलाओं के लिए आरक्षण लागू हुआ था। इधर, मैं कन्फ्यूज हूं नेताजी के विराट अनुभव पर। उन्होंने पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि महिलाओं को आरक्षण मिला सीटी बजेगी। खूब सीटी बज रही है,पार्लियामेंट का काम धांसू तरीके से चल रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नोट-(नेताजी की भविष्यवाणी के मद्देनजर मैं भी भविष्यवक्ता हो लिया हूं और व्यंग्य आने वाले दिन के हिसाब से लिखा गया है। तारीख आप तय कर लें)&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-8352743550204003022?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/8352743550204003022/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/03/blog-post_24.html#comment-form" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/8352743550204003022?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/8352743550204003022?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/03/blog-post_24.html" title="पार्लियामेंट में सीटी(व्यंग्य)" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0IESHYyfyp7ImA9WxBbEUw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-3269228029687613629</id><published>2010-03-09T11:47:00.000+05:30</published><updated>2010-03-09T11:48:29.897+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-03-09T11:48:29.897+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भारत रत्न" /><title>मुझे दीजिए भारत रत्न (व्यंग्य)</title><content type="html">इधर लोगों के पास बड़ा फालतू वक्त आ गया है। तरह तरह की मांगें करने लगे हैं। अब सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने की मांग को लीजिए। जिसे देखो, वो सचिन के लिए भारत रत्न मांग रहा है। संसद में सरकार और विपक्ष पेट्रोल-डीजल की कीमत को लेकर एकमत नहीं हैं। महिला आरक्षण के मुद्दे पर एक दूसरे को पटकने में लगे हैं। हाथी की पूंछ सी लंबी हो चुकी महंगाई विपक्ष को दिख रही है तो सरकार को नहीं। लेकिन, सचिन को भारत रत्न की मांग पर सब सहमत हैं। वाह रे सचिन ! बापू जीवित होते तो बड़े खुश होते कि कोई तो है, जिसे लेकर पक्ष-विपक्ष में कोई मतभेद नहीं। और शायद इसी एक खूबी पर सचिन को भारत रत्न दिलवा देते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, बापू नहीं है। और इसके अलावा सचिन में कोई खूबी नहीं है कि उन्हें देश का यह सर्वोच्च सम्मान दिया जाए। भाई, सचिन ने किया ही क्या है? वो हमेशा कहता है कि खेलने में मज़ा आता है। अब फ्री में मज़ा लूटते-लूटते भारत रत्न कोई लूट ले जाए-ये देश के लिए अच्छा नहीं। अरे, जब आपने कोई काम ही नहीं किया, सिर्फ मज़े लिए और वो भी खूब नोट पीटकर तो काहे का सम्मान। और सचिन तो ‘मैन ऑफ द मैच’ भी खूब लूटते रहे। अपने आधे मैचों में भाई साहब अवॉर्ड लूट ले गए। क्या बाकियों ने मैदान में पसीना नहीं बहाया ! बाकी खिलाड़ी मुंह ताकें और सचिन मलाई चाटें? हद होती है कि इस अंधेरगर्दी की ! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन में बड़े भाई ने रमाकांत आचरेकर जैसे कोच के यहां भर्ती करा दिया। उस्ताद टॉप क्लास हो तो चेला तो कमाल करेगा ही ! और खिलाड़ी चौके-छक्के मारे, वनडे में 200 मारे, रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाए तो इसमें कमाल कैसा? उसका काम है ये। फिर, मदर टेरेसा, अब्दुल कलाम, लता मंगेशकर और तमाम दूसरी हस्तियां चप्पल घिस-घिसकर थक लीं तब सरकार को दया आई। बुढ़ापे में मिलता है भारत रत्न। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी सरकार से अपील है कि इस तरह की उलजुलूल मांगों पर ध्यान न दिया जाए। और अगर नियम में ढिलाई की गुंजाइश हो तो मेरे नाम पर ध्यान दिया जाए। आखिर, इस महंगाई में जब दाल-चावल-आलू-टमाटर के दाम सचिन के टोटल रनों से ज्यादा हो गए हैं,तब भी मैं स्ट्रोक पर स्ट्रोक खेलकर परिवार का पेट पाल रहा हूं। गढ़्डों के बीच से निकलती सड़क पर मैं रोज बाइक से स्वीप-कट-पुल लगाता हूं। पानी-बिजली की समस्याओं के बाउंसर के बीच नॉटआउट टिका हूं। लंबी फेहरिस्त है मेरी महानता की। खैर, चलूं देखूं कोई है क्या मुझे भारत रत्न दिलाने वाला....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-3269228029687613629?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/3269228029687613629/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/03/blog-post_09.html#comment-form" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/3269228029687613629?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/3269228029687613629?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/03/blog-post_09.html" title="मुझे दीजिए भारत रत्न (व्यंग्य)" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkAHQ38yfyp7ImA9WxBUGUg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-5338300575711822926</id><published>2010-03-07T15:07:00.000+05:30</published><updated>2010-03-07T15:08:52.197+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-03-07T15:08:52.197+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="चीयरलीडर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वित्त मंत्री" /><title>चीयरलीडर का वित्त मंत्री को ख़त (व्यंग्य)</title><content type="html">आदरणीय वित्त मंत्री जी, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इंडियन प्रीमियर लीग में ठुमके लगाकर अपना पेट भरने वाली एक साधारण चीयरलीडर हूं। आईपीएल सिर पर है। मैं आमिर खान की तरह ‘परफेक्शनिस्ट’ हूं, इसलिए तैयारियों में जुटी हूं। चौके पर ठुमका किस एंगल से लगना चाहिए और छक्के पर कमर कितनी बार और कितनी लचकनी चाहिए, इसकी प्रैक्टिस कर रही हूं। चौके-छक्के पर एक ही स्टाइल का डांस देख स्पांसर भन्ना जाते हैं, इसलिए वैरायटी पर जोर है। आखिर, पब्लिक हो या स्पांसर सभी को इन दिनों ‘एक्स्ट्रा’ चाहिए न !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने जॉब के बारे में इसलिए बता रही हूं ताकि आप समझ सकें कि दो जून की रोटी हमें भी बड़ी मुश्किल से नसीब होती है। लेकिन, आपने बजट में हमें क्या दिया ? लाखों करोड़ों रुपए इधर-उधर बांट दिए, लेकिन आपको एक पल के लिए भी हमारा ख्याल नहीं आया? आपको खेतों में काम करने वाले मजूदरों की याद रही, लेकिन खेलों में काम करने वाली मजदूरनियों को आप कैसे भूल गए? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नरेगा के तहत आप मजदूरों को साल में 100 दिन रोजगार देने के अपने वादे पर कायम हैं,लेकिन हमें तो सिर्फ साल में 40-45 दिन रोजगार मिलता है। उस पर भी पिछले साल तो गृह मंत्री चिदंबरम की जिद के चलते आईपीएल को दक्षिण अफ्रीका ट्रांसफर कर दिया गया और हमारा टिकट कट गया था। आखिर, साल में आईपीएल सिर्फ एक बार होता है तो हमें रोजगार सिर्फ 40-45 दिन मिल पाता है। बाकी इस देश में दूसरा कोई खेल न ठीक से खेला जाता है, न देखा जाता है, जहां हमें रोजगार मिले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपके राज में दाल-चावल से लेकर खूबसूरत दिखने वाली क्रीम तक सब आइटम जिस तरह महंगे हो लिए हैं, उसमें ‘पटाखा’ दिखने की आयोजकों की डिमांड पूरी करना मुश्किल हो गया है। मारु दिखने के लिए रोज चार टाइम चेहरे पर मलाई लगानी पड़ती है, जूस पीना पड़ता है और ब्यूटीपार्लर में रेगुलर अडेंनडेंस लगानी पड़ती है। लेकिन, छप्पर फाड़ती दूध-जूस की कीमतों के चलते तो यह आइटम अब वीकली भी नसीब नहीं हो रहे। उस पर ब्यूटीपार्लर वाली आपके सर्विस टैक्स से परेशान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुरा न मानिएगा पर जानती हूं कि महंगाई कम करना आपकी हैसियत से बाहर है। इसलिए कम से कम बजट में संशोधन कर हमें कुछ रकम दें । राज की बात बताती हूं-राहुल बाबा को हमारे लटके-झटके बहुत पसंद हैं। वो आईपीएल में मैच देखने थोड़े आते हैं ! मेरी मांग पर ध्यान दीजिएगा। खैर, चलूं अभी अभी डिमांड आई है कि आईपीएल चीयरलीडर्स के लिए ‘बैकवर्ड मसाला ठुमका’ लगाना प्राइमरी कंडीशन है। कभी सुना है इस ठुमके के बारे में? नहीं न ! इस बार देखिएगा...।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-5338300575711822926?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/5338300575711822926/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/03/blog-post.html#comment-form" title="6 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/5338300575711822926?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/5338300575711822926?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/03/blog-post.html" title="चीयरलीडर का वित्त मंत्री को ख़त (व्यंग्य)" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;A0AGRXw-eSp7ImA9WxBUE0s.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-1972721708039420596</id><published>2010-02-28T20:37:00.001+05:30</published><updated>2010-02-28T20:38:44.251+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-02-28T20:38:44.251+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="holi satire" /><title>होली से डरने वालों के लिए क्रेश कोर्स (व्यंग्य)</title><content type="html">अगर आपको होली से डर लगता है। होली नामक त्योहार के लिए खुद को फिट न समझते हुए आप इस भद्दा मजाक करार देते हैं। लुटे-पिटे-काले-कलूटे चेहरों को देख आप सहम जाते हैं। कोई रंग लगाने आए तो आप खुद को बाथरूम में बंद कर घरवालों को गांधी के सत्य के नियम के खिलाफ जाने के लिए लगभग बाध्य करते हैं। होली की सुबह 7 से शाम पांच बजे तक अपनी ऐसी-तैसी सिर्फ और सिर्फ टेलीविजन के सामने कराते हैं, और घर से बाहर निकलने के ख्वाब मात्र से आपको घर में बने ‘होनालूलू’ जाना पड़ता है तो यह क्रेश कोर्स आपके लिए है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो जनाब, होली बड़ा विकट किस्म का त्योहार है। और मुरली मनोहर की पावन धरा के इस वर्ल्ड फेम गेम से डरने वालों के लिए बाबा रंगानी का आजमाया हुआ दस सूत्रीय फॉर्मूला निम्नलिखित है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1-होली पर सबसे पहले सुबह सुबह तेल में भिगोकर अपनी ही चप्पल कम से पचास बार खुद को जड़ डालें। इस चप्पल को बीच बीच में अपने पसंदीदा रंग में भी डुबो लें और फिर खुद को जड़े। शरीर पर हुए हर वार का दूसरे वार से एक बिलत्ते का फासला होना चाहिए। ऐसा होने से एक एथनिक लुक आ जाएगा। और आपको रंगने आने वाला भेड़िया इस एथनिक लुक में आपको लुटा पिटा देख अपना रंग बर्बाद करने के विषय में नहीं सोचेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2-अपनी बॉडी पर एथनिक पेंट करने के बाद अपने वस्त्रों को मनीष मल्होत्रा टाइप डिजाइन कीजिए। इसके लिए अपना फटा कुर्ता ढूंढकर निकालिए। यदि ‘फटा होने’ के विषय में संशय हो तो घर में रखे कैकटस के पौधे अथवा दरवाजे के कड़े में दोनों जेबों को फंसाकर खींचिए। जेब फटते हुए ऊपर की ओर जहां तक जाएगी, वो आपकी डिजाइन को उतना ही लेटेस्ट लुक देगा।&lt;br /&gt;3-खैर, इस लुक में काफी वक्त बर्बाद होने के बाद आपके भीतर एक सेल्फ कॉन्फिडेंस आ जाएगा। आखिर, अगर आप होली की तैयारी इस शिद्दत से कर सकते हैं तो होली खेल भी सकते हैं। डरिए मत। अब वक्त आ रहा है कि आप रंगों के त्योहार में रंग जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4-चलिए, आप होली खेलने के लिए आखिर तैयार तो हो गए। लुक बिलकुल हुलियारों सरीखा बन चुका है। बस,अब उमंग की कमी है। इस उमंग को भंग के साथ एक झटके में पैदा किया जा सकता है। इसलिए भंग का कोई एक्सपीरियंस हो तो फौरन ठंडाई में डालकर पी ही लीजिए। लेकिन, अगर यह महान अनुभव नहीं है,तो कोई बात नहीं। नशेबाज ही होली खेलेंगे-ऐसा किसी वेद-पुराण में नहीं लिखा। बस आप हौसला रखिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5-तो जनाब, नंगपन की हद तक होली खेलने की आवश्यक शर्त -भंग पीना- आप पूरी नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए, नयी डगर से आपको मंजिल तक भेजना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6-तो ऐसा है जनाब। अगर आप किसी मकान के मालिक हैं। उस मकान मालिक की औलाद हैं या उसके रिश्तेदार हैं, तो बस किराएदार को बेहिचक रंगने पहुंच जाइए। और हां, किराएदार के घर में तभी जाइए, जब ‘भैया’ न हों। इस करतब को करते हुए आपका दिल पहली पहली बार थोड़ा घबराएगा जरुर, लेकिन आप डटे रहिए। क्योंकि, अगर आपकी इमेज सज्जन टाइप के प्राणी की है तो भाभी खुद आपको रंग देंगी। भाभी आपके चिकने गालों को खुद रगड़ रगड़ कर रंगीला बना देंगी। इस केस में आपको कुछ नहीं करना है। सिर्फ आंख बंद कर भाभी को देखना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;7-लेकिन,अगर आपकी इमेज हरामी टाइप की है,तो अव्वल तो आपको होली से डर लगता नहीं होगा। लेकिन, अगर लगता भी होगा तो आप भाभी से होली पर छेड़खानी करने में बिलकुल न डरें। ये आपका जन्मसिद्ध अधिकार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;8-खैर, भाभियों से मौज मस्ती के बाद आपको थोड़ा कॉन्फिडेंस और आएगा। मान लीजिए कि आप अब ट्रेंड हुलियारों की कैटेगरी में पहुंच रहे हैं। बस, आपको अब करना यह है कि पड़ोस की जिस कुड़ी को आप लगातार निहार रहे हैं, और जिसके गुलाबी गालों के चक्कर में आपकी रंग भेद में अक्षम आंखों को रंग समझ आने लगे हैं-उस कुड़ी के घर पहुंच जाइए। हिम्मत रखिए.....अगर लड़की का बाप या मां से आमना-सामना हो जाए तो फौरन उनके पैर छूकर थोड़ा गुलाल मल दीजिए। हैप्पी होली कहिए और चीते की फुर्ती से आगे बढ़ जाइए। आपको यह जोखिम भरा लग सकता है, लेकिन घबराने से कुछ नहीं होगा। आप अपने कदमों को बढ़ने दीजिए। आपकी पिंकी, प्रीति, छुटकी, बिल्लो, रानी वगैरह वगैरह जो भी है, वो आपके सामने होगी। अब बस बिना देर किए उसके गुलाबी गालों पर उधार का गुलाल मल दीजिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;9-समझ लीजिए। होली छिछोरेबाजी का त्योहार है। भारत में छिछोरेबाजों को सारी ट्रेनिंग इसी त्योहार में मिलती है। इसलिए डरिए मत। दूसरे गाल पर भी रंग मल दीजिए। और अगर आपको उसके शरीर के किसी भी कोने में हाथ लगाने का मौका मिल जाए तो बस उस मौके पर शेर के शिकार की तरह लपक लीजिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10-खुदा कसम...इसके बाद आपके शरीर में जो करंट दौड़ेगा, वो दुनिया के सभी किस्म के डरों का खात्मा कर देगा। अजीब सी सरसराहट शरीर को झंकृत कर देगी। और खुदा न खास्ता अगर लड़की भी आपसे कुछ इसी किस्म की छिछोरेबाजी की उम्मीद कर रही हुई, और उसने भी आपके बालों- गालों और ???? पर उंगली फेर दी तो..........। बस, समझ लीजिए कि होली इसी अहसास का नाम है। हां, इस किस्म की होली के बाद पड़ोस के घर में आपका आना जाना बंद हो सकता है, लेकिन उस आवाजाही को दोबारा खुलवाना का मौका भी तो होली ही है......।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-1972721708039420596?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/1972721708039420596/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/02/blog-post_729.html#comment-form" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/1972721708039420596?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/1972721708039420596?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/02/blog-post_729.html" title="होली से डरने वालों के लिए क्रेश कोर्स (व्यंग्य)" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;A0ENQno7cSp7ImA9WxBUE0k.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-6268320213908824952</id><published>2010-02-28T15:02:00.002+05:30</published><updated>2010-02-28T15:04:53.409+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-02-28T15:04:53.409+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="गब्बर की होली" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="होली पर गब्बर-सांभा संवाद" /><title>क्यों न मना सका गब्बर होली (व्यंग्य)</title><content type="html">“अरे ओ सांभा, होली कब है? कब है होली?”  जेल से छूटकर लौटे गब्बर ने बौखला कर सांभा से पूछा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“सरदार, होली 1 तारीख को है। लेकिन, अचानक होली का ख्याल कैसे आया। बसंती तो गांव छोड़कर जा चुकी है, और ठाकुर भी अब ज़िंदा नहीं है। फिर, होली किसके साथ खेलोगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“धत् तेरे की। लेकिन, वीरु-जय उनका क्या हुआ?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“सरदार, तंबाकू चबाते चबाते तुम्हारी याददाश्त भी चली गई है। जय को तुमने ही ठिकाने लगा दिया था, और वीरु बसंती को लेकर मुंबई चला गया था।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“जे बात...। जेल में बहुत साल गुजारने के बाद फ्लैशबैक में जाने में दिक्कत हो रही है। खैर, ये बताओ बाकी सब कहां हैं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“ कौन बाकी। तुम और हम बचे हैं। कालिया को जैसे तुमने मारा था, उसके बाद सारे साथी भाग लिए थे। बचे घुचे जय-वीरु ने टपका दिए थे।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“तो रामगढ़ में हमारी कोई औकात नहीं अब ? कोई डरता नहीं हमसे? एक ज़माना था कि यहां से पचास पचास मील दूर कोई बच्चा रोता था तो मां कहती थी कि.....”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“अरे, कित्ती बार मारोगे ये डायलॉग। इन दिनों बच्चे रोते नहीं। मां-बाप रोते हैं। बच्चे हर दूसरे दिन मैक्डोनाल्ड जाने की जिद करते हैं। मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने की मांग करते हैं। बंगी जंपिग के लिए प्रेशर डालते हैं। एक बार बच्चों को घुमाने गए मां-बाप शाम तक दो-तीन हजार का फटका खाकर लौटते हैं....।“ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“सांभा,छोड़ो बच्चों को। बसंती की बहुत याद आ रही है। बसंती नहीं है धन्नो के पास ही ले चलो।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“अरे सरदार...कौन जमाने में जी रहे हो तुम। धन्नो बसंती की याद में टहल गई थी। और धन्नो की बेटी बन्नो धन्नों की याद में निकल ली। अब, धन्नो नहीं सेट्रो, स्विफ्ट, नैनो, एसएक्स-4,सफारी वगैरह से सड़कें पटी पड़ी हैं”&lt;br /&gt;“अरे, ये कौन से हथियार  हैं?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“ये हथियार नहीं। मोटर कार हैं। तुम्हारे जमाने में तो एम्बेसेडर भी बमुश्किल दिखती थी। अब नये नये ब्रांड की कारें आ गई हैं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“सांभा. होली आ रही है। रामगढ़ की होली देखे जमाना हो गया। होली कार में बैठकर देखेंगे। आओ कार खरीदकर लाते हैं।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“अरे तुम्हारी औकात नहीं है कार खरीदने की।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“जुबान संभाल सांभा। पता नहीं है सरकार कित्ते का इनाम रखे है हम पर। ”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“भटा इनाम। कोई इनाम नहीं है तुम पर अब। और जो था न पचास हजार का ! उसमें गाड़ी का एक पहिया नहीं आए। सबसे छोटी गाड़ी भी तीन-चार लाख की है। तुम तो साइकिल पर होली देख लो-यही गनीमत है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“सांभा,बहुत बदल गया रे रामगढ़। अब कौन सी चक्की का आटा खाते हैं ये रामगढ़ वाले?” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“अरे, काई की चक्की। चक्की बंद हो लीं सारी सालों पहले। अब तो पिज्जा-बर्गर खाते हैं। गरीब टाइप के रामगढ़ वाले कोक के साथ सैंडविच वगैरह खा लेते हैं। इन दिनों गरीबों के लिए कंपनी ने कोक के साथ सैंडविच फ्री की स्कीम निकाली है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“सांभा, खाने की बात से भूख लग गई। होली पर गुझिया वगैरह तो अब भी बनाते होंगे ये लोग?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“गब्बर बुढ़िया गए हो तुम। आज के बच्चों को गुझिया का नाम भी पता नहीं। बीकानेरवाला, हल्दीरामवाला,गुप्तावाला वगैरह वगैरह मिठाईवाले धांसू डिब्बों में मिठाई बेचते हैं। बस, वो ही खरीदी जाती हैं। एक-एक डिब्बा सातसौ-आठसौ का आता है। तुमाई औकात मिठाई खाने की भी नहीं है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“सांभा, तूने बोहत बरसों तक हमारा नमक खाया है न..? ”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“जी सरदार”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“तो अब गोली खा। गोली खाकर फिर जेल जाऊंगा। वहां अब भी होली पर रंग-गुलाल उड़ता है, दाढ़ी वाले गाल पर ही सही पर बाकी कैदी प्यार से रंग मलते हैं तो दिल खुश हो जाता है। जेल में दुश्मन पुलिसवाले भी गले लगा लेते हैं होली पर। ठंडाई छनती है खूब। और मिठाई मिलती है अलग से। सांभा, रामगढ़ हमारा नहीं रहा। तू जीकर क्या करेगा। ”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धांय............................&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-6268320213908824952?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/6268320213908824952/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/02/blog-post_28.html#comment-form" title="4 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/6268320213908824952?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/6268320213908824952?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/02/blog-post_28.html" title="क्यों न मना सका गब्बर होली (व्यंग्य)" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0cAQHY8fyp7ImA9WxBUEE8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-2897368874315014852</id><published>2010-02-24T20:53:00.003+05:30</published><updated>2010-02-24T20:54:01.877+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-02-24T20:54:01.877+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="sachin tendulkar" /><title>सचिन के लम्हे को बार बार जीने का मन करता है</title><content type="html">एक हाथ में बैट और दूसरे में हेलमेट लिए हवा में हाथ उठाए सचिन तेंदुलकर। इस एक लम्हे को सचिन तेंदुलकर ने बार बार जीया है। लेकिन, ग्वालियर के रुप सिंह स्टेडियम में क्रिकेट के इस भगवान ने क्रिकेट के इतिहास में पहली बार एकदिवसीय मैच में 200 के आंकड़े को छुआ तो वक्त ठहर गया। बाएं हाथ में हेलमेट और दाएं हाथ में बल्ला लिए सचिन रमेश तेंदुलकर ने इस बार दोनों हाथ फैलाकर हवा में उठाए तो उनके खामोश चेहरे का संतोष साफ पढ़ा जा सकता था। 441 एकदिवसीय मैचों और 21 साल लंबे अंतरराष्ट्रीय करियर के बाद आए इस एक पल ने सचिन तेंदुलकर से ज्यादा उनके प्रशंसकों को खुशी से सराबोर कर दिया। सचिन की इस उपलब्धि ने चार दिन पहले ही रंगों के त्योहार के साथ दस्तक दे डाली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;50 वें ओवर की तीसरी गेंद पर सचिन प्वाइंट की तरफ गेंद को कट कर एक रन के लिए दौड़े तो यह महज एक रन नहीं था। ये सचिन की ज़िंदगी की मेहनत को एक नयी उपलब्धि में गढ़ता एक रन था। क्रिकेट के इतिहास में नया मुकाम गढ़ता एक रन था। वनडे क्रिकेट में सचिन को उस शिखर पर बैठाता एक रन था, जिसके करीब तो कई खिलाड़ी पहुंचे लेकिन उस पर काबिज कभी नहीं हो पाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;22 गज की पिच पर यह एक रन पूरा हुआ ही था कि 50-50 ओवर के खेल की परिभाषा और विस्तार ले गई। आखिर, वनडे में 200 का आंकड़ा कोई कभी नहीं छू पाया ! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, ग्वालियर के मैदान में सचिन ने अपनी इस पारी की झलक पहली गेंद से ही दे दी थी, जब उन्होंने मुकाबले की पहली और दूसरी गेंद को सीमा रेखा के बाहर पहुंचा दिया। इसके बाद तो मैदान के हर हिस्से से उन्होंने रन बटोरे और पहली से आखिरी गेंद तक खेलते हुए वो न केवल नॉट आउट रहे बल्कि क्रिकेट की किताब में एक नया रिकॉर्ड भी दर्ज करा गए। सचिन इससे पहले न्यूजीलैंड के खिलाफ 186 और आस्ट्रेलिया के खिलाफ 175 रन ठोंककर लोगों में इस रिकॉर्ड तक पहुंचने की उम्मीद तो पहले भी जगा चुके थे,लेकिन कामयाबी मिली दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ। सचिन ने 147 गेंदों में तीन छक्कों और 25 चौकों के साथ यह कामयाबी पाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन की इस अनूठी उपलब्धि के बीच कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी की आतिशी पारी गुम हो गई,जिसने 35 गेंदों में चार छक्कों और सात चौकों के साथ 68 रन बनाए। लेकिन, इसका ग़म न धोनी को था, और न दर्शकों को। क्योंकि, सचिन का लम्हा सिर्फ सचिन का था, जिसे हर क्रिकेट प्रेमी बार बार जीना चाहता है। सचिन की इस उपलब्धि के क्या मायने हैं, इसे सुनील गावस्कर के एक बयान से समझा जा सकता है। गावस्कर ने सचिन के इस रिकॉर्ड के बाद कहा-मैं इस जीनियस के पैर छूना चाहता हूं....।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-2897368874315014852?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/2897368874315014852/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/02/blog-post_24.html#comment-form" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/2897368874315014852?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/2897368874315014852?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/02/blog-post_24.html" title="सचिन के लम्हे को बार बार जीने का मन करता है" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;Ck4DRX04eCp7ImA9WxBWFkQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-6383364822086664850</id><published>2010-02-09T10:18:00.001+05:30</published><updated>2010-02-09T10:19:34.330+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-02-09T10:19:34.330+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="Internet nobel prize" /><title>इंटरनेट को शांति का नोबेल दिलाने की कवायद का मतलब</title><content type="html">सूचना तकनीक की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाला इंटरनेट 2010 के नोबेल शांति पुरस्कारों के दावेदारों में एक है। इंटरनेट का नाम मशहूर पत्रिका ‘वायर्ड’ के इतावली संस्करण की तरफ से भेजा गया है, जिसे अमेरिकी और ब्रिटिश संस्करणों ने सहमति दी है। लेकिन, क्या इंटरनेट को इस पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए? ये सवाल इसलिए क्योंकि इंटरनेट को यह पुरस्कार दिलाने की मुहिम शुरु हो चुकी है। इस कैंपेन को 2003 की नोबेल विजेता शिरीन इबादी और मशहूर इतावली सर्जन अंबेर्तो वेरोनेसी का समर्थन तो मिला ही है, साथ ही सोनी एरिक्सन से लेकर माइक्रोसॉफ्ट इटली तक दर्जनों कंपनियों का समर्थन भी प्राप्त है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंटरनेट को नामांकित करने वाले ‘वायर्ड इटली’ के मेनीफेस्टो के मुताबिक-“डिजीटल संस्कृति ने एक नए समाज की नींव रखी है। और ये समाज संचार के जरिए संवाद,बहस और सहमति को बढ़ावा दे रहा है। लोकतंत्र हमेशा वहीं फलता-फूलता है,जहां खुलापन,स्वीकार्यता,बहस और भागीदारी की गुंजाइश होती है। मेल-मिलाप हमेशा घृणा और झगड़े के ‘एंटीडॉट’ के रुप में काम करता है,लिहाजा इंटरनेट शांति का एक महत्वपूर्ण औजार है और इसीलिए शांति का नोबेल पुरस्कार इंटरनेट को दिया जाना चाहिए।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निसंदेह इंटरनेट ने दुनिया के सोचने-समझने का ढंग बदला है। इसकी उपयोगिता का फलक बेहद विस्तृत है। दुनियाभर में लोगों के क्षण भर में आपस में जुड़ने से लेकर सूचना और ज्ञान के विशाल खजाने तक एक क्लिक के जरिए पहुंचने जैसे हज़ारों उदाहरण हैं। इरान में राष्ट्रपति चुनावों के दौरान हुई कथित धांधली से लेकर मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों और हैती में आए विनाशकारी भूकंप समेत कई मौकों पर लाखों लोगों ने फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग का इस्तेमाल कर दुनिया तक अपनी बात पहुंचाई। बावजूद इसके क्या इंटरनेट शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए योग्य है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंटरनेट का शांति के नोबेल पुरस्कारों के लिए नामांकन एक बहस की मांग करता है। भारत से भी इस बहस का एक सिरा इस मायने में जुड़ता है कि यहां नेट उपयोक्ताओं की संख्या 8 करोड़ पार हो चुकी है। इंटरनेट के सैकड़ों लाभ लेता भारतीय उपयोक्ता भी ‘इंटरनेट फॉर पीस’ कैंपेन का हिस्सा बन सकता है,जिसे अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नेतृत्व में परवान चढ़ना है। लेकिन, सवाल सिर्फ इस कैंपेन का हिस्सा बनने का नहीं है। सवाल इंटरनेट के इस लब्धप्रतिष्ठित पुरस्कार के नामांकन के पीछे की कहानी का है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंटरनेट की उपयोगिता अगर असीमित है,तो इसके खतरे भी कम नहीं हैं। पोर्नोग्राफी को नेट ने खासा बढ़ावा दिया। निजी सूचनाएं सार्वजनिक होने का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। फिर, साइबर आतंकवाद को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है? साल 2007 में अमेरिका के पेंटागन की ई-मेल प्रणाली और वर्ल्ड बैंक की वित्तीय सूचना प्रणाली में साइबर घुसपैठ अगर पूरी तरह सफल रहती तो भयंकर नुकसान हो सकता था। सीईआरटी के मुताबिक साल 2009 में भारत में ही 6000 वेबसाइट्स पर साइबर हमला हुआ। दिलचस्प यह कि अगर इंटरनेट की वजह से शांति को बढ़ावा मिल रहा होता तो गूगल के चीन छोड़ने की धमकी के बाद अमेरिका-चीन आमने-सामने न खड़े होते। चीन समेत कई मुल्कों में सेंसरशिप इस फिलोसफी पर भी बट्टा लगाती है कि इंटरनेट समाज में खुलापन, स्वीकार्यता और बहस की गुंजाइश पैदा करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि नोबेल शांति पुरस्कार हमेशा किसी व्यक्ति को ही दिया गया हो। 2007 में अल गोर और इंटरगोवर्नमेंट ऑन क्लामेट चेंज(आईपीसीसी), 2006 में मोहम्मद युनूस और ग्रामीण बैंक, 2001 में संयुक्तर राष्ट्र और कोफी अन्नान और 1999 में डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स को दिया जा चुका है। यानी संस्थाओं को उल्लेखनीय कार्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिलता रहा है, लेकिन इंटरनेट तो संस्था भी नहीं है। पारिभाषिक शब्दावली में इंटरनेट महज छोटे-छोटे कंप्यूटर नेटवर्क्स को मिलाकर बना एक बड़ा नेटवर्क है। वर्ल्ड वाइड वेब(डब्लूडब्लूडब्लू) भी कई सेवाओं को प्लेटफॉर्म देने वाली एक सर्विस है। इस प्लेटफॉर्म पर ई-मेल,सोशल नेटवर्किंग साइट्स, ई-बैकिंग आदि तमाम सुविधाएं संचालित होती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन किंतु-परंतु के बावजूद इंटरनेट शांति के नोबेल पुरस्कारों के मजबूत दावेदारों में उभर सकता है। वजह-इसके पक्ष में होने वाला कैंपेन। नोबेल पुरस्कारों की घोषणा अक्टूबर 2010 में होगी, और वायर्ड पत्रिका की तरफ से सितंबर तक मुहिम चलायी जाएगी। इंटरनेट को नोबेल पुरस्कार मिले अथवा न मिले-वायर्ड पत्रिका के लिए यह दोनों हाथ में लड्डू सरीखा है। वायर्ड पत्रिका का मकसद महज कैंपेन का सफल बनाना है और इसमें वो सफल भी होगी। &lt;br /&gt;दरअसल, दुनिया की मशहूर पत्रिकाओं में शुमार वायर्ड मंदी के दौर में खासी प्रभावित हुई है। पिछले साल इस पत्रिका के विज्ञापन राजस्व में लगातार कमी हुई। पब्लिशर्स इनफोरमेशन ब्यूरो के आंकड़े के मुताबिक 2009 की पहली तिमाही में तो पत्रिका के विज्ञापन राजस्व में 50.4 फीसदी की गिरावट आई। यह हाल पूरे साल रहा। क्रिस एंडरसन के संपादन में निकलने वाली इस पत्रिका को लेकर मशहूर स्तंभकार स्टीफेनी क्लीफोर्ड ने न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा भी- ‘तीन नेशनल मैग्जीन अवॉर्ड जीतने वाली वायर्ड का करिश्मा विज्ञापन जुटाने में नाकाम रहा और 2009 में विज्ञापन राजस्व 50 फीसदी तक गिर गया।‘ मंदी से जूझते हुए पत्रिका ने बड़ी संख्या में अपने कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया। इसी वक्त, कंपनी के सामने इटली और ब्रिटेन में पत्रिका शुरु करने का दबाव था,जहां काफी निवेश किया जा चुका था। इस कड़ी में 18 फरवरी 2009 को वायर्ड के इतावली संस्करण की शुरुआत हुई। फिर अप्रैल में ब्रिटिश संस्करण की। वायर्ड पत्रिका इन दोनों देशों में अमेरिकी संस्करण का रुपांतरित संस्करण नहीं निकालना चाहती थी, लिहाजा कंटेंट को पूरी तरह अलग रखा गया। बावजूद इसके, वायर्ड के इतावली और ब्रिटिश संस्करण को कोई करिश्माई कामयाबी नहीं मिली है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वायर्ड ने इंटरनेट को शांति के नोबल पुरस्कारों के लिए नामांकित कर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। दुनियाभर में इस खबर के बाद अचानक सुर्खियों में आई पत्रिका ने खासी पब्लिसिटी बटोरी। इंटरनेट को अवॉर्ड दिलाने की मुहिम अब अगले छह-सात महीनों तक जारी रहेगी। यानी बिक्री में बढ़ोतरी होने की संभावना बढ़ेगी और बड़ी संख्या में लोग पत्रिका के नेट संस्करण तक पहुंचेंगे। वायर्ड उन चुनिंदा पत्रिकाओं में है,जिसका नेट संस्करण खासा कमाऊ रहा है। अमेरिका में वायर्डडॉटकॉम टॉप 200 वेबसाइट्स में एक है। इतावली संस्करण को इस कैंपेन का अगुआ बनाकर पत्रिका ने कई कंपनियों से ‘टाइ-अप’ करने में कामयाबी पाई है,जो उसके लिए विज्ञापनों का बड़ा स्रोत बनेंगे। सिर्फ इटली में ही नहीं, अमेरिका और ब्रिटेन में भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानकारों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को जिस तरह अवॉर्ड कमिटी ने शांति के नोबेल पुरस्कारों के लिए चुना, उसके बाद इंटरनेट का चुनाव नामुमकिन नहीं है। क्योंकि,कमिटी के लिए अब ‘परसेप्शन’ महत्वपूर्ण हो गया है। दिलचस्प है कि जुलाई 2009 में इरान में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर के योगदान के बीच अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मार्क पफेल ने ट्विटर के संस्थापकों को नोबेल शांति पुरस्कार देने की मांग की थी। सरकार में बैठे कुछ आला अधिकारियों ने उनकी मांग का समर्थन भी किया था। लेकिन इस बार तो वायर्ड ने बाकायदा रणनीति के तहत कैंपेन शुरु किया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित नोबेल शांति अवॉर्ड के लिए इंटरनेट के पक्ष में कैंपेन एक व्यवसायिक कवायद है। हालांकि, अवॉर्ड के लिए इंटरनेट की राह आसान नहीं हैं,लेकिन वायर्ड को तो सिर्फ कैंपेन की सफलता से मतलब है। फिर, इंटरनेट पर ही इन दिनों एक चुटकुला चल निकला है, नेट को नोबेल का शांति पुरस्कार मिल भी गया तो लेने आएगा कौन?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-6383364822086664850?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/6383364822086664850/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/02/blog-post_09.html#comment-form" title="4 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/6383364822086664850?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/6383364822086664850?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/02/blog-post_09.html" title="इंटरनेट को शांति का नोबेल दिलाने की कवायद का मतलब" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DE8BRnk_fSp7ImA9WxBWEU0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-8133610001758292185</id><published>2010-02-02T16:03:00.000+05:30</published><updated>2010-02-02T16:04:17.745+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-02-02T16:04:17.745+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="Social Media" /><title>सोशल मीडिया में नौकरी भी है.....</title><content type="html">सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव। सोशल मीडिया रिसर्चर। सोशल मीडिया एनालिस्ट। और सोशल मीडिया स्ट्रेटेजिस्ट। बहुत से लोगों ने शायद कभी इन ‘पॉजिशन’ के बारे में नहीं सुना होगा, लेकिन तमाम कंपनियों में इन दिनों धड़ल्ले से इस तरह के पदों पर नियुक्तियां हो रही हैं। भारत में आठ करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोक्ताओं और फेसबुक, ऑर्कुट, ट्विटर, ब्लॉग, यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया के सभी औजारों की बढ़ती लोकप्रियता के बीच कंपनियों को सोशल मीडिया के जानकारों की जरुरत पड़ने लगी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोशल मीडिया पर अपने ब्रांड को मजबूत करने से लेकर, अपनी इमेज सुधारने और नया बाज़ार बनाने के मकसद से कंपनियों को सोशल मीडिया के तमाम पहलुओं की जानकारी रखने वाले लोगों की आवश्यकता हो रही है। इस तरह सोशल मीडिया की समझ रखने वाले लोगों के लिए रोजगार की एक नयी राह खुल चुकी है। दिलचस्प यह कि सोशल मीडिया के क्षेत्र में उन युवाओं के लिए भी खास मौके हैं,जिनके पास किसी कंपनी में काम का कोई अनुभव नहीं है। अनिल धीरुबाई अंबानी ग्रुप ने हाल में मुंबई में ‘ऑनलाइन/सोशल मीडिया मैनेजमेंट’ नाम से भर्ती का विज्ञापन निकाला तो उसमें अनुभव कैटेगरी में लिखा गया-शून्य। चेन्नई के अखबारों या वेबसाइट्स पर सोशल मीडिया इंटर्न से एक्सपर्ट तक के तमाम विज्ञापन दिखायी दे रहे हैं,जहां अभ्यर्थियों से अनुभव नहीं मांगा जा रहा अलबत्ता इस क्षेत्र में समझ की दरकार जरुर है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मामले में न्यूयॉर्क की एक नयी ई-कॉमर्स कंपनी का क्रेगलिस्ट में प्रकाशित विज्ञापन शानदार है। कंपनी ने महज 195 शब्दों के अपने विज्ञापन में अभ्यर्थियों से कहा-‘आप हमें दो ट्वीट ई-मेल कीजिए। पहला अपने अनुभव के बारे में। दूसरा,क्यों आप इस जॉब के लिए उपयुक्त हैं। अगर आपने ट्विटर की शब्द संख्या में अपना जवाब दे दिया तो आप अपना काम कर गए। इसके अलावा हमें अपना ट्विटर एकाउंट मेल कीजिए। बताइए आपके कितने फॉलोअर्स हैं। और कितने लोगों को आप फॉलो करते हैं। ज्यादा फॉलोअर्स बनाने के क्या तरीके हैं। और आपकी वेतन अपेक्षा क्या है।‘ इस विज्ञापन से स्पष्ट है कि सोशल मीडिया की समझ लगातार कंपनियों के लिए कितनी अहम हो रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, फेसबुक,आर्कुट,माइस्पेस जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स से लेकर माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर तक सोशल मीडिया पर एक नया संसार बस चुका है, जहां लोग जाति-धर्म और आर्थिक भेदभाव के बिना आपस में जुड़े हैं। इस नए संसार की समझ नयी पीढ़ी के युवाओं को बहुत है, और अगर वो इस क्षेत्र में रोजगार की संभावना को तलाशें तो यह एक करियर विकल्प भी हो सकता है। दूसरे शब्दों में, सोशल मीडिया लफ्फाजी और मनोरंजन से कहीं आगे जिंदगी जीने का जरिया बन सकता है। वैसे, एक दिलचस्प बात यह भी है कि कंपनियां अगर सोशल मीडिया एक्सपर्ट तलाश रही हैं,तो इसी सोशल मीडिया के जरिए अभ्यर्थियों को खारिज भी कर रही हैं। ऑनलाइन जॉब साइट करियरबिल्डर द्वारा 1000 कंपनियों के बीच किए एक सर्वे के मुताबिक 73 फीसदी कंपनियां अभ्यर्थियों के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए सोशल मीडिया खासकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स खंगाल रही हैं। रिपोर्ट की मानें तो 42 फीसदी कंपनियों को अभ्यर्थियों के बारे में सोशल मीडिया पर ऐसी जानकारी मिली, जिसके चलते उन्हें जॉब नहीं दी गई। 48 फीसदी कंपनियों ने कहा कि सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपनी अकादमिक योग्यता के बारे में झूठ बोलने की वजह से कई कैंडिडेट्स को नौकरी नहीं दी गई। सोशल नेटवर्किंग साइट्स समेत सोशल मीडिया के तमाम माध्यमों पर दी गईं सूचनाएं कंपनियों के लिए अभ्यर्थियों को जानने समझने का जरिया बन रही हैं। इस प्लेटफॉर्म पर कुछ झूठ भविष्य में बड़े मौके की राह का कांटा बन सकते हैं-ये भी युवाओं को समझना होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-8133610001758292185?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/8133610001758292185/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/02/blog-post.html#comment-form" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/8133610001758292185?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/8133610001758292185?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/02/blog-post.html" title="सोशल मीडिया में नौकरी भी है....." /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DUMBQHg_cCp7ImA9WxBXE0Q.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-5143551217608749910</id><published>2010-01-25T10:59:00.003+05:30</published><updated>2010-01-25T11:00:51.648+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-01-25T11:00:51.648+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कंटेंट शुल्क" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ऑनलाइन अखबार" /><title>न्यूयॉर्क टाइम्स ऑनलाइन की पहल का मतलब</title><content type="html">अमेरिकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स अगले साल की शुरुआत से अपने वेब संस्करण के लिए शुल्क वसूलेगा। ऑनलाइन न्यूज प्रदाताओं के लिए यह बड़ी खबर है, क्योंकि इस कदम के जरिए न्यूयॉर्क टाइम्स डॉट कॉम एक नए युग की शुरुआत करने जा रहा है। अपने वर्तमान ऑनलाइन पाठकों को बचाए रखने, सर्च इंजन में अपनी मौजूदगी को यथावत रखने और विज्ञापनदाताओं का भरोसा कायम रखने के मकसद से न्यूयॉर्क टाइम्स ने भुगतान के लिए ‘मीटर प्रणाली’ को चुना है। यानी कोई पाठक एक महीने में चंद बार निशुल्क साइट देख सकता है। इसके बाद साइट सर्फ करने के लिए उसे शुल्क देना होगा। पाठक कितनी बार निशुल्क साइट सर्फ कर सकता है और उसे कितना शुल्क देना होगा-इसका खुलासा नहीं किया गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स को खरीदकर पढ़ने वाले पाठक निशुल्क साइट देख पाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न्यूजकॉर्प के प्रमुख रुपर्ट मर्डोक ने हाल में गूगल पर अपने अखबारों के कंटेंट चोरी करने का आरोप लगाते हुए ऑनलाइन कंटेंट के लिए शुल्क वसूलने की बात कहकर एक जोरदार बहस छेड़ दी थी। मर्डोक का तर्क था कि सर्च इंजन ऑनलाइन कंटेंट की विशिष्टता खत्म कर देते हैं,लिहाजा वहां से लिंक हटाए जाएं और पाठकों को बेहतरीन कंटेंट देने के लिए शुल्क लिया जाए। लेकिन,सवाल यही है कि क्या पाठक ऑनलाइन कंटेंट खासकर सामान्य न्यूज कंटेंट के लिए शुल्क देने को तैयार हैं? एक तर्क है कि फाइनेंशियल टाइम्स, वॉल स्ट्रीट जर्नल और कुछ दूसरे अखबार अपने ऑनलाइन संस्करण के लिए फीस वसूल सकते हैं तो न्यूयॉर्क टाइम्स क्यों नहीं? दूसरा तर्क है कि शुल्क वसूलने वाले सभी अखबार-पत्रिकाएं बिजनेस अथवा किसी खास विषय पर केंद्रित हैं,जबकि न्यूयॉर्क टाइम्स के कई विकल्प बाजार में मौजूद हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों तर्क अपनी जगह सही हैं, लेकिन सचाई यह है कि न्यूयॉर्क टाइम्स ऑनलाइन इस पहल के जरिए भविष्य की रणनीति तैयार कर रहा है। साइट के ट्रैफिक पर नजर रखने वाली कंपनी कॉमस्कोर के मुताबिक न्यूयॉर्क टाइम्स डॉट कॉम के सितंबर 2009 में 15.4 मिलियन पाठक थे, जो दिसंबर में घटकर 12.4 मिलियन रह गए। ट्रैफिक घटने की और आशंका के बावजूद न्यूयॉर्क टाइम्स इस दिशा में आगे बढ़ा है,तो सोच-समझकर। हालांकि, 2005-07 में भी साइट टाइम्ससिलेक्ट नाम से शुल्क वसूलने का एक विफल प्रयोग कर चुकी है। लेकिन, इस दौर में भी साइट ने 2,10,000 ग्राहक बटोरने में कामयाबी पाई थी,जिनसे 50 डॉलर सालाना शुल्क लिया गया था। इसके जरिए न्यूयॉर्क टाइम्स ने 10.5 मिलियन डॉलर की कमाई की थी।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, शुल्क वसूलने का ‘मीटर सिस्टम’ न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए कामयाब साबित हो सकता है। रिसर्च बताती हैं कि अमेरिका में एक औसत पाठक 3.7 बार न्यूयॉर्क टाइम्स की साइट पर आता है, यानी ऐसे पाठकों को नये फॉर्मूले में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जबकि,गंभीर पाठक 10-15 डॉलर तक आसानी से खर्च कर सकता है। यानी नया फॉर्मूला विज्ञापनों की घटती आय को कुछ हद तक पाट सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, बात सिर्फ न्यूयॉर्क टाइम्स के ऑनलाइन संस्करण की नहीं, पूरे ऑनलाइन न्यूज कंटेंट की है। एक्सक्लूसिव कंटेंट के बिना शुल्क वसूलना मुमकिन नहीं है। न्यूयॉर्क टाइम्स को भरोसा है कि प्रामाणिक खबरें और विश्लेषात्मक रिपोर्ट उसे दौड़ में आगे रखेंगी। वैसे, कई दूसरे अंतरराष्ट्रीय अखबार अब इस दिशा में सोचने पर मजबूर होंगे। लेकिन, भारत में अभी यह दूर की कौड़ी है। ऑनलाइन संस्करणों के रुप में अखबारी संस्करणों की नकल, एक्सक्लूसिव कंटेंट की जबरदस्त कमी, इंटरनेट की सीमित उपलब्धता और खबरों के लिए ज्यादा जेब ढीली न करने की भारतीय मानसिकता जैसे कई इसके कारण हैं। हालांकि, ‘द हिन्दू’ ने ई-पेपर के लिए शुल्क वसूलने की शुरुआत की है, लेकिन असल सवाल तो अखबारों के वेब एडिशन का है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-5143551217608749910?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/5143551217608749910/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/01/blog-post_25.html#comment-form" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/5143551217608749910?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/5143551217608749910?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/01/blog-post_25.html" title="न्यूयॉर्क टाइम्स ऑनलाइन की पहल का मतलब" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0ICQXo-eyp7ImA9WxBQFk0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-7887352135863357259</id><published>2010-01-16T05:56:00.000+05:30</published><updated>2010-01-16T05:56:00.453+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-01-16T05:56:00.453+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="गूगल" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="चीन" /><title>चीन को गूगल की धमकी के मायने</title><content type="html">इंटरनेट की दुनिया की बेताज बादशाह गूगल क्या चीन से बोरिया-बिस्तर वास्तव में समेट सकती है?  अगर ऐसा हुआ तो इसका अर्थ सिर्फ एक कंपनी का चीन से काम-काज समेटना भर है? अथवा इसके निहितार्थ कहीं व्यापक हैं ? ये सवाल इसलिए क्योंकि गूगल के चीन से कामकाज समेटने की धमकी देने के बाद दुनिया भर की सूचना तकनीक कंपनियां इस मसले पर आंख गढ़ाए बैठी हैं। कंपनियां ही नहीं भारत समेत कई देशों की सरकारें भी गूगल के भावी कदम से लेकर चीन की प्रतिक्रिया जानने को बेचैन हैं। गूगल ने अभी आधिकारिक तौर पर चीन छोड़ने का कोई फैसला नहीं किया है, लेकिन गूगल की धमकी को इस बार आर-पार की लड़ाई के रुप में देखा जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि,गूगल ने चीन को अलविदा कहा तो उसका भी कम नुकसान नहीं होगा। कंपनी के चीन में 700 से ज्यादा कर्मचारी हैं। गूगल चीन से सालाना 300 मिलियन डॉलर कमा रहा है। कंपनी के सर्च इंजन की लोकप्रियता चीन में तेजी से बढ़ रही है। बीजिंग की संस्था एनलासिस इंटरनेशनल के आंकड़ों के मुताबिक 2009 की चौथी तिमाई में सर्च इंजन बाजार के 35.6 फीसदी हिस्से पर गूगल का कब्जा हो चुका है,जो तीन साल पहले 15 फीसदी भी नहीं था। हालांकि, चीनी सर्च इंजन बाइडू का अभी भी 58.4 फीसदी हिस्से पर कब्जा है, लेकिन गूगल की चुनौती लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा गूगल का चीन की कई कंपनियों से अलग अलग स्तर पर समझौता है। इनमें चाइना मोबाइल लिमिटेड से लेकर देश के सबसे बड़े इंटरनेट पोर्टल सिना कॉर्प जैसी कंपनियां शामिल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका मतलब यह कि चीन से बोरिया-बिस्तर समेटना कंपनी के लिए काफी नुकसानदायक है। लेकिन, गूगल ऐसा कर सकता है क्योंकि अब चीन के नियम-कायदे उसकी साख पर बट्टा लगा रहे हैं। दरअसल, अमेरिकी कंपनी गूगल ने 2005 में सबसे अधिक इंटरनेट उपयोक्ताओं वाले देश चीन में कदम रखा तो उसकी नज़र बड़े बाजार पर थी। लिहाजा,चीनी सरकार के सीमित लोकतंत्र के फलसफे को उसे अपने सर्च इंजन पर भी लागू करने में हिचक नहीं हुई। गूगलडॉटसीएन यानी चीन में संचालित होने वाला कंपनी का सर्च इंजन एक सेंसरशिप के तहत काम कर रहा है,जहां दलाई लामा से लेकर तेनमेन चौक नरसंहार समेत करीब पांच हजार राजनीतिक और गैरराजनीतिक शब्दों पर इस कदर सेंसरशिप है कि इन्हें सर्च करने पर नतीजा खाली पेज के रुप में दिखायी देता है। सेंसरशिप पर गूगल चीनी सरकार के नियमों से बंधी हुई है,जबकि उसका अंतरराष्ट्रीय सर्च इंजन गूगलडॉटकॉम इन नियमों से नहीं बंधा है। ऐसे में गूगल के मुख्य सर्च इंजन और उसकी तमाम सेवाओं (जीमेल-ब्लॉगर-यूट्यूब,विकीपीडिया) पर चीन विरोधी नारे अकसर गूंजते रहते हैं। असल दिक्तत तब शुरु हुई,जब हैकर्स ने गूगल की अन्य सेवाओं पर धावा बोलना शुरु किया। चीन में मानवाधिकार हनन अथवा चीन सरकार के राजनीतिक कदमों के खिलाफ सामग्री हैकर्स के निशाने पर रही। चीन सरकार ने भी कभी यूट्यूब को प्रतिबंधि किया तो कभी माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर पाबंदी लगाई। यानी नेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल लगातार चीन में उठता रहा। लेकिन, गूगल ने अब आरोप लगाया है कि दिसंबर में हैकर्स ने जी-मेल के दुनियाभर के उन एकाउंट को निशाना बनाया,जो चीन में मानवाधिकार की वकालत करते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बांधने के तहत किए इन हमलों को संगठित चीनी हैकर्स ने संचालित किया, और यह सरकारी मदद के मुमकिन नहीं है। हालांकि, गूगल ने सीधे सीधे चीनी सरकार पर हैकिंग का आरोप नहीं लगाया लेकिन उसने कह दिया कि सेंसरशिप के साए में उसका काम करना मुश्किल है। वो चीन की सरकार से बात करेगी, लेकिन सरकार के सख्त कानूनों के तहत समझौते का रास्ता निकलना मुश्किल है,लिहाजा गूगल चीन से बाहर निकलने को तैयार है। जानकारों का कहना है कि गूगल एक तरफ तो चीन के विशाल नेट बाजार से फायदा कमाना चाहती है,लेकिन दूसरी तरफ उन्हें उन लोकल कानूनों और परंपराओं से जूझना है,जो पश्चिम से भिन्न हैं। खासकर मीडिया कंपनियों के परिप्रेक्ष्य में। चीन में निजता और मानवाधिकार की अपनी परिभाषा है,जिससे गूगल दो चार है। वैसे, इंटरनेट शुरुआत से चीन में सेंसरशिप के साए में है। अब, हैकिंग से साख पर लगते बट्टे और लगातार सेंसरशिप की परेशानियों से त्रस्त गूगल आर-पार की लड़ाई में है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गूगल के जाने से बाइडू और दूसरी लोकल सर्च कंपनियों को जरुर फायदा होगा। इसकी पुष्टि गूगल की धमकी के बाद नैसडेक में बाइडू के शेयरों की बढ़त से हो गई, जहां बाइडू के शेयर 16.1 फीसदी उछल गए। लेकिन चीन को भी भारी नुकसान हो सकता है। गूगल जैसी हाईटेक कंपनी के बाहर होने के बाद विदेशी निवेशकों को चिंता हो सकती हैं कि सरकारी समर्थन वाली हैकिंग के चलते उनके कारोबारी राज और बौद्धिक संपदा सुरक्षित नहीं है। इसके अलावा अमेरिकी डमोक्रेटिक प्रशासन में बैठे उन लोगों को भी यह मसला सक्रिय कर सकता है,जो मानवाधिकार के प्रति संवेदनशील हैं। गूगल का जाना अमेरिका का चीन के प्रति बढ़ती मुहब्बत पर विराम लगा सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हाल में चीन की अपनी यात्रा के दौरान मानवाधिकार के हनन और मुद्रा में जोड़तोड़ जैसे मसलों पर चीन की आलोचनाओं को दरकिनार कर दिया था लेकिन इस वाकये के बाद अमेरिका सख्ती से चीन से स्पष्टीकरण मांग रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कोई दो राय नहीं है कि चीन में सीमित लोकतंत्र है,लेकिन गूगल भी अपने पांव पसारने को बेताब हर देश में घुसपैठ कर रहा है। अलग अलग देशों की अपनी सोच है,जिसे गूगल अपने मुताबिक नहीं ढाल सकता। दिलचस्प है कि जिस वक्त गूगल ने चीन से बाहर जाने की धमकी दी, लगभग उसी वक्त फ्रांस सरकार ने गूगल के किताबों को डिजीटल करने के प्रोजेक्ट को बाहर फेंकने की धमकी दे डाली। फ्रांस सरकार इस मसले को कॉपीराइट के अलावा अपनी सांस्कृतिक धरोहर को एक अमेरिकी कंपनी की गिरफ्त के रुप में देख रही है। फिलहाल, गूगल के लिए भी चुनौती है कि वो कैसे इन संकटों से उबरती है। खासकर विश्वसनीयता के संकट से, क्योंकि जी-मेल एकाउंट हैक होने की बात तो आम आदमी को भी डराती है कि क्या जी-मेल का ई-मेल एकाउंट हैक होना इतना आसान है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-7887352135863357259?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/7887352135863357259/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/01/blog-post.html#comment-form" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/7887352135863357259?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/7887352135863357259?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2010/01/blog-post.html" title="चीन को गूगल की धमकी के मायने" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEECSH4-cSp7ImA9WxBREk4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-5385036758822113601</id><published>2009-12-31T10:47:00.001+05:30</published><updated>2009-12-31T10:47:49.059+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-12-31T10:47:49.059+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="व्यंग्य" /><title>छिछोरेबाजी का रिजोल्यूशन !</title><content type="html">नया साल आने वाला है। इस मौके रिजोल्यूशन-रिजोल्यूशन नामक दिलचस्प खेल खूब खेला जाता है। खासकर अमेरिका-ब्रिटेन में। फिरंगी खेलें और हम नहीं ! नकल हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। इसलिए हम भी जमकर खेलते हैं। साल के आखिरी दिन रिजोल्यूशन करने वालों की तादाद अचानक हिमालय की चोटी लांघ जाती है। आप चूक न जाएं, इसलिए याद दिलाना बंदे का कर्तव्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिजोल्यूशन एक्सपर्ट बताते हैं कि ये तीन प्रकार के होते हैं। पहला, जो सिर्फ नए साल के पहले दिन की शाम तक डंके की चोट पर चलता है।  रात होते होते धराशायी हो जाता है। दूसरा यानी वीकली रिजोल्यूशन। नाम से साफ है कि ये रिजोल्यूशन हफ्ते भर चलता है,लेकिन इस संडे से उस संडे तक आते आते शहीद हो जाता है। मंथली रिजोल्यूशन विकट किस्म का रिजोल्यूशन होता है क्योंकि इसके झांसे में परिवार वाले भी आने लगते हैं। बंदा,जो रोज दारु पीता हो। रिजोल्यूशन ले कि नहीं पीऊंगा। एक महीने नहीं पिये तो घरवालों को भी यकीन होने लगता है कि डट गया बात पर। लेकिन,एक महीने बाद अचानक झूम शराबी झूम गाते हुए घर पहुंचता है,तो बर्तन भी टूटते हैं और भरोसा भी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे,एक चौथा प्रकार और होता है रिजोल्यूशन का। इयरली रिजोल्यूशन। जानकार मानते हैं कि ये रिजोल्यूशन निभाने की औकात आजकल के बंदों में रही नहीं। खैर,अपना इरादा रिजोल्यूशन पर आईएएस मार्का निबंध लिखने का नहीं है। अपना इरादा रिजोल्यूलेशन लेने का है। अपन अलग टाइप के पहलवान हैं, इसलिए इयरली रिजोल्यूशन ही लेंगे। पुराने ज़माने के खगड्ड मानते हैं कि रिजोल्यूशन के बारे में किसी को बताना नहीं चाहिए।  लेकिन, बताया नहीं,तो काहे का रिजोल्यूशन। पब्लिसिटी का ज़माना है भाई ! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नए साल पर अपन रिजोल्यूशन लेंगे छिछोरेबाजी का। गलत न समझें भइया। वक्त इसी का है। लिखते लिखते सालों बीत गए-किसने जाना ? यही हाल टाइगर वुड्स का भी रहा। बंदा गोल्फ के खेल में चार किलोमीटर से गेंद मार सीधे छेद में डाल देता है। लीजेंड है। लेकिन, किसने पहचाना? हमारी पड़ोसिन तो पहली बार जानीं टाइगर वुड्स गोल्फर है,वरना वो तो विशेष प्रजाति का शेर माने बैठीं थीं। लेकिन, गर्लफ्रेंड के चक्कर खुले तो बंदा मुहल्ला मुहल्ला मशहूर हो गया। फिर, छिछोरेबाजी करेंगे तो मौका 'बिग बॉस' में मिल सकता है। वहां भी यही काम करेंगे तो टीआरपी बढ़ जाएगी अपनी। उसके बाद किसी शो में जज बन सकते हैं,कहीं नाच सकते हैं। मौका लगा तो झटके में स्वयंवधू रचा सकते हैं। वाह ! अपने रिजोल्यूशन का आइडिया खुद को ही अब जंचने लगा है। चलूं, छिछोरेबाजी पर कोई किताब लेकर आऊं। नया साल आने वाला है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-5385036758822113601?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/5385036758822113601/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2009/12/blog-post.html#comment-form" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/5385036758822113601?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/5385036758822113601?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2009/12/blog-post.html" title="छिछोरेबाजी का रिजोल्यूशन !" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0MMQX85fip7ImA9WxNaFk4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-4362276667243972377</id><published>2009-12-01T07:08:00.000+05:30</published><updated>2009-12-01T07:08:00.126+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-12-01T07:08:00.126+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="News" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="Social Media" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="Twitter" /><title>मीडिया संस्थानों के लिए Twitter पर समाचार की अहमियत समझना जरुरी</title><content type="html">माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर के बारे में एक साल पहले तक आम लोगों को खास पता नहीं था। मुंबई हमलों के दौरान सोशल मीडिया के इस औजार की अहमियत पहली बार कायदे से लोगों के सामने आई,जब लोगों ने ट्विटर के जरिए लाइव रिपोर्टिंग की। सैकड़ों लोगों ने आंखों देखा हाल बताया और कई अहम जानकारियां ट्विटर के जरिए ही सामने आईं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस घटना के बाद ट्विटर की लोकप्रियता में अचानक जबरदस्त इजाफा हुआ। एक साल पहले तक भारत में ट्विटर के उपयोक्ताओं की संख्या खासी कम थी, लेकिन अब करीब 26 लाख हो चुकी है। ट्विटर उपयोक्ताओं के मामले में भारत का नंबर अमेरिका और जर्मनी के बाद तीसरे नंबर पर है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, ट्विटर के तेजी से बढ़ते उपयोक्ताओं के बीच आम धारणा यही है कि लोग सोशल नेटवर्किंग के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। अपना हाल बताने और स्टेटस अपडेट करने के इरादे से लोग ट्विटर के सदस्य बनते हैं। इसके अलावा, उन्हें यहां कई सेलेब्रिटी से जुड़ने का मौका मिला है,लिहाजा ट्विटर का आकर्षण बढ़ा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, हाल में ट्विटर उपयोक्ताओं के बीच प्लग्डडॉटइन के किए एक सर्वे में चौकाने वाले नतीजे सामने आए। इस सर्वे के मुताबिक 16 फीसदी ट्विटर ग्राहक न्यूज पाने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं,जबकि मित्रों से संपर्क में रहने के लिए महज 11 फीसदी। 17 फीसदी लोगों को अभी तक नहीं मालूम कि वो सोशल नेटवर्किंग के इस प्लेटफॉर्म पर क्यों हैं? 12 फीसदी लोग काम के सिलसिले में ट्विटर पर मौजूद हैं,जबकि 11 फीसदी लोगों को स्टेटस अपडेट करने का शौक है। 10 फीसदी ट्विटर उपयोक्ताओं को लगता है कि वो इसके जरिए कुछ दिलचस्प लोगों (सेलेब्रिटी शामिल) से मिल सकते हैं। लेकिन,बात इन आंकड़ों की नहीं,सर्वे के सबसे अहम पहलू की है। वो ये कि सबसे ज्यादा लोग न्यूज पाने के लिए ट्विटर पर हैं। ये आंकड़ा इसलिए हैरान करता है,क्योंकि ये सर्वे भारतीय उपयोक्ताओं के बीच है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलचस्प ये है कि भारतीय मीडिया संस्थानों ने अभी न्यूज के रुप में ट्विटर फीड को गंभीरता से नहीं लिया है। देश के दो सबसे अधिक बिकने वाले अंग्रेजी समाचार पत्रों यानी टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स को छोड़कर बाकी अखबारों की ट्विटर फीड संभवत: फीड़ है नहीं, अथवा उपेक्षित है। मसलन इंडियन एक्सप्रेस के कथित ट्विटर एकाउंट के महज 300 के करीब फॉलोअर हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग ट्विटर पर ख़बरें चाहते हैं,इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि टाइम्स ऑफ इंडिया के फॉलोअरों की संख्या 6 हजार से अधिक है,जो लगातार बढ़ रही है। दूसरी तरफ, अमेरिका में ट्विटर पर ख़बरों को लेकर लोगों की दिलचस्पी इस कदर है कि न्यूयॉर्क टाइम्स की ट्विटर फीड़ के ग्राहकों की तादाद 21 लाख से ज्यादा है। बाकी बड़े मीडिया संस्थानों की ट्विटर फीड के भी लाखों में फॉलोअर हैं। सोशल मीडिया के जानकारों की मानें तो लोगों में समाचारों को जानने की एक स्वाभाविक कुलबुलाहट होती है। और इस कुलबुलाहट को ट्विटर फीड के जरिए आसानी से शांत किया जा सकता है। खबरों को लेकर उत्सुकता अमेरिका से लेकर भारत सभी जगह है। यानी ट्विटर फीड के अपने ग्राहक हो सकते हैं, और फिर ट्विटर के जरिए लोगों को अखबार-टेलीविजन चैनल अपनी साइट तक खींच सकते हैं। क्योंकि ट्विटर पर न्यूज देने का एक तरीका यह है कि हेडलाइन के साथ खबर का लिंक भी दे दिया जाता है। लेकिन, भारत में अभी मीडिया संस्थानों ने इस बारे में गंभीरता से सोचा नहीं है। एयरटेल के साथ ट्विटर के समझौते के बाद करीब 11 करोड़ लोग तो अपने मोबाइल फोन पर ट्विटर फीड मुफ्त में पा सकते हैं,यानी अब ट्विटर उपयोक्ताओं की संख्या यहां तेजी से बढ़ सकती है। ऐसे में,हिन्दी-अंग्रेजी समेत तमाम भाषाओं में लोग ट्विटर पर न्यूज चाहेंगे, और जो पहले इस प्लेटफॉर्म पर गंभीर पहल करेगा, बढ़त उसी को मिलना तय है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-4362276667243972377?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/4362276667243972377/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2009/12/twitter.html#comment-form" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/4362276667243972377?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/4362276667243972377?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2009/12/twitter.html" title="मीडिया संस्थानों के लिए Twitter पर समाचार की अहमियत समझना जरुरी" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;A0EGRnYzeSp7ImA9WxNaE0Q.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-3883087563873763397</id><published>2009-11-28T14:40:00.002+05:30</published><updated>2009-11-28T14:43:47.881+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-11-28T14:43:47.881+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="व्यंग्य" /><title>I-Next में आज प्रकाशित व्यंग्य- मुहब्बत के तराने</title><content type="html">ज्यादा वक्त नहीं गुजरा जब आशिक बड़ी मुहब्बत से ख़त लिखा करते थे। नया नवेला आशिक प्रेम पत्र को रोमांटिक बनाने के लिए हिन्दी साहित्य में डूब जाया करता था। ग़ालिब से लेकर मीर तक की शायरी के दरिया में तैर जाया करता था। कुछ जुनूनी किस्म के पागल प्रेमी लहू की लाल स्याही से मुहब्बत का पैगाम लिखा करते थे। आशिक के रकीब यानी प्रेमिका के बाकी प्रेमी भी इसी खत नुमा आइटम के जरिए उसे ठिकाने लगाने की कोशिश करते थे। वो आशिक ने नाम से गालियों का ख़त प्रेमिका के घर पर टपका आते। हालांकि, लड़की के घरवाले यह समझ जाते थे कि भद्दा खत उस लड़के ने नहीं लिखा, जिसके नाम से भेजा गया है, लेकिन घरवालों की प्रतिबंधित सूची में आशिक का नाम आना तय हो जाता था। लड़कियां प्रेम पत्र नहीं लिखती थी, इस बात के इतिहास में सबूत नहीं है, अलबत्ता ज्यादातर अपने नाम से नहीं लिखती थी, और बहुत विश्वासपात्र सहेलियां ही उनके खतों की ‘पोस्टमैन’ होती थीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन,बात गुजरे जमाने की नहीं गुजरते जमाने की है। एसएमएस का तूफान कमबख्त मुहब्बत की इस पाती परंपरा को उजाड़ गया। स्कूली एसएमएसी मुहब्बत की गाड़ी कई बार ‘बैलेंस’ के झंझावत में पटरी से उतर जाती है। अनपढ़ से अनपढ़ टपोरी आशिक के पास भी मोबाइल नामक ये यंत्र है, जिससे भेजे एसएमएस से समझ नहीं आता कि किस कैटेगरी का आशिक है। भौंदू-नादान-चिरकुट-रक्तप्रिय...किस टाइप का। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ही एसएमएस फॉरवर्ड हो-होकर इतनी बार महबूबा के पास पहुंचता है कि पता नहीं चलता कि एसएमएस में व्यक्त भावनाएं रामू की हैं या शामू की। हालांकि, मोबाइल ने लड़कियों को भी सुविधा दी है कि वो आंखों के तीर से घायल हुए तमाम परिंदों को एसएमएस का चारा डालकर लपेट लें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लुटे-पिटे आशिकों के शोध बताते हैं कि एक एसएमएस पाकर तर्र हुआ छोरा एक महीने तक मुफ्त का सेवक होता है। दुहने के बाद गाय को पता चलता है कि दूध-मलाई-मक्खन और घी सब कुछ कोई और खा गया है,तो वो उस प्राणप्रिय एसएमएस को ‘डिलीट’ कर नए सिरे से कोशिश में जुटता है।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कन्फ्यूजन के बावजूद एसएमएस पर रोमांस धड़ल्ले से जारी है। सर्वे बता रहे हैं कि दफ्तरों में रोमांस अब मोबाइल के बिना दम तोड़ देंगे। कॉलेजों में भी बिप-बिप की चहचहाहट कइयों की मुहब्बत ज़िंदा रखे है। एसएमएस धर्म-निरपेक्ष भाव से इंस्टेंट प्यार करने वाली बिरादरी की सेवा कर रहे हैं। लेकिन, इस एसएमएसी मुहब्बत के युग में भी कुछ मजनूं अपनी लैला को प्यार की पाती लिखे बिना बाज नहीं आते। उन्हें न जाने क्यों ढाई आखर प्रेम के हाथ से लिखने में ही आनंद आता है। नयी पीढ़ी उन्हें ‘बैकवर्ड’ कहते हुए ताना कसती है-मजनूं है न!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-3883087563873763397?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/3883087563873763397/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2009/11/i-next.html#comment-form" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/3883087563873763397?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/3883087563873763397?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2009/11/i-next.html" title="I-Next में आज प्रकाशित व्यंग्य- मुहब्बत के तराने" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0QMQHc9eCp7ImA9WxNUGUk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-146363596237636448</id><published>2009-11-11T17:34:00.003+05:30</published><updated>2009-11-11T17:39:41.960+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-11-11T17:39:41.960+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अमर उजाला" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="फेसबुक" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="प्रशासन" /><title>चंडीगढ़ हादसे से फिर उजागर प्रशासन का संवेदनहीन चेहरा</title><content type="html">प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पीजीआई चंडीगढ़ में मरीजों से कुशलक्षेम पूछ रहे हैं,तो अस्पताल के बाहर गेट नंबर-1 पर एक मरीज बेसुध हालत में कार में पड़ा है। मरीज के रिश्तेदार प्रधानमंत्री की सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मियों से गिड़गिड़ाकर अंदर जाने की मिन्नतें मांग रहे हैं ताकि मरीज को इमरजेंसी वार्ड में पहुंचाया जा सके। सुरक्षाकर्मियों ने डंडा बरसाते हुए उन्हें गेट नंबर-2 की ओर भेज दिया। यहां उन्हें झिड़कते हुए फिर गेट नंबर-1 पर जाने को कहा गया। अस्पताल की दहलीज पर खड़े मरीज ने आखिरकार इस आने-जाने के बीच दम तोड़ दिया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने अब इस हादसे की रिपोर्ट तलब की है,लेकिन यह गंभीर वाक्या अपने आप में कई बड़े सवाल खड़े करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सवालों पर चर्चा से पहले एक और हादसे का जिक्र। ये हादसा ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड में हुआ। यहां एक स्कूली छात्र ने खुदकुशी की कोशिश की। छात्र ने खुदकुशी की कोशिश से पहले सोशल नेटवर्किंग साइट ‘फेसबुक’ पर अपने  स्टेटस मैसेज के रुप में सुसाइड नोट लिखा। उसने लिखा-“मैं अब बहुत दूर जा रहा हूं,वो करने जिसके बारे में मैं काफी वक्त से सोच रहा था। अब लोग मुझे खोजेंगे।” अमेरिका में बैठी छात्र की ऑनलाइन मित्र ने इस संदेश को पढ़ा तो दंग रह गई। उसे नहीं मालूम था कि छात्र ब्रिटेन में कहां रहता है ? इस लड़की ने अपनी मां को इस बारे में  फौरन बताया। मां ने मैरीलेंड पुलिस को सूचित किया। पुलिस ने राष्ट्रपति भवन यानी व्हाइट हाउस के स्पेशल एजेंट से संपर्क साधा, और उसने एक झटके में वाशिंगटन में ब्रिटिश दूतावास के अधिकारियों से। उन्होंने ब्रिटेन के मेट्रोपॉलिटन पुलिस से संपर्क किया, और इस बीच छात्र के घर का पता लगाकर थेम्स वैली के पुलिस अधिकारी उसके घर जा पहुंचे। पुलिस अधिकारियों के पहुंचने से पहले छात्र नींद की कई गोलियां निगल चुका था। उसकी हालत बेहद खराब थी, और मुंह से खून आ रहा था। लेकिन, पुलिस अधिकारियों ने हार नहीं मानी। उन्होंने आनन-फानन में छात्र को अस्पताल पहुंचाया, जहां आखिरकार उसकी जान बच गई। इस पूरी कवायद में एटलांटिक सागर के दोनों ओर सांस रोककर काम कर रही पांच बड़ी एजेंसियों की तारीफ करनी होगी,जिन्होंने वक्त के साथ होड़ लगाते हुए छात्र की जान बचाने में कामयाबी पाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कर्तव्यनिष्ठा की अनूठी मिसाल पेश करने वाली इस वाक्ये को पढ़ने-सुनने के बाद चंडीगढ़ के हादसे से रुबरु होना शर्मसार कर देता है। आखिर, ऑक्सफोर्ड का छात्र किसी का क्या लगता था, जिसके लिए दो देशों की बड़ी एजेंसियों ने एक पांव पर खड़े होकर काम किया ? दूसरी तरफ, चंडीगढ़ में आंखों के सामने लाचार तड़पता मरीज भी क्यों सुरक्षाकर्मियों के दिलों में रहम की अलख नहीं जगा सका ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल सिर्फ चंडीगढ़ की घटना का नहीं है। इस तरह के हादसे लगातार सुर्खियां बनते रहे हैं, जब वीवीआईपी सुरक्षा पर आम आदमी की ‘बलि’ ली गई। 1998 में मार्टिन मैसे नाम के एक एक्जीक्यूटिव को कई पुलिसकर्मियों ने पीट पीटकर अधमरा कर दिया था,क्योंकि वो गलती से प्रधानमंत्री काफिले को तोड़ बैठा था। एनडीए शासनकाल में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के वीवीआईपी रूट में फंसने की वजह से कई छात्र इम्तिहान नहीं दे पाए थे। ऐसी घटनाओं की लंबी फेहरिस्त है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, सवाल संवेदनहीनता का है, जो अब अपने आप में एक मर्ज बनता जा रहा है। वीवीआईपी सुरक्षा के दौरान मरीज की मौत इस मर्ज की तरफ जोरशोर से ध्यान दिलाने को बाध्य करती है। वरना, इसी साल पटना के अस्पताल में जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल के चलते 38 मरीजों की जान चली गई, लेकिन क्या किसी के खिलाफ ठोस कार्रवाई हुई अथवा पुनरावृत्ति रोकने के लिए कोई कदम उठाया गया। पिछले साल 13 अगस्त को विश्व हिन्दू परिषद के अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन स्थानांतरित किए जाने के मसले पर किए गए राष्ट्रीय चक्का जाम के चलते एक 70 साल के बुजुर्ग ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। इस बुजुर्ग को दिल का दौरा पड़ा था। वो अंबाला में लगे ट्रैफिक जाम में फंसकर रह गया और चंडीगढ़ नहीं पहुंच पाया। लेकिन,क्या इस मामले पर किसी ने ध्यान दिया ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रैलियों-धरने-हड़ताल और वीवीआईपी सुरक्षा आम लोगों के लिए परेशानी का सबब बनते रहे हैं, लेकिन इनके चलते मरीजों की जान जाने की घटनाएं अब न्यूनतम संवेदनशीलता की मांग करती हैं। और ये संवेदनशीलता सिर्फ चंद लोगों को नहीं बरतनी बल्कि पूरे समाज को बरतनी है। वीवीआईपी सुरक्षा के मामले में संवेदनहीनता बर्बर भी हो जाती है,क्योंकि वहां कानून के रखवालों के हाथ में ‘काम निपटाने’ का जिम्मा होता है। यानी अगर सुरक्षाकर्मियों को प्रधानमंत्री की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया है, तो किसी पंछी की भी क्या बिसात कि वो उनके सुरक्षा घेरे को तोड़ पाए ! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वीवीआईपी दौरों के दौरान पूरा प्रशासन सिर्फ एक सूत्र पर काम करता है। वो यह कि दौरा सकुशल निपट जाए। इस बीच आम आदमी ‘भाड़ में जाए’ की तर्ज पर उपेक्षित दिखता है। फिर, व्यवहारिक स्तर पर तैयारियों का अभाव छोटी परेशानी को बड़ा कर देता है। मसलन प्रधानमंत्री के चंडीगढ़ पीजीआई दौरे के दौरान अगर सिर्फ इमरजेंसी वार्ड में जाने वाले मरीजों की सुविधा को थोड़ा ख्याल रखा जाता तो मुश्किल हल हो सकती थी। ऑक्सफोर्ड छात्र की जान बचाने की घटना जहां पश्चिमी एजेंसियों की संवेदनशील और चौकस कार्यप्रणाली की ओर इशारा करती है,तो वहीं चंडीगढ़ की घटना संवेदनहीन,लचर और बेहूदा सिस्टम की तरफ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परेशानी यह है कि इन हादसों से कोई सबक नहीं लेता। वीवीआईपी रूट में अभद्रता का शिकार हुए लोगों की सैकड़ों शिकायतें मानवाधिकार आयोग में दर्ज हैं,लेकिन कुछ नहीं हुआ। एनडीए शासनकाल में लालकृष्ण आडवाणी ने वीवीआईपी के लिए एक अलग ट्रैफिक नीति बनाने की वकालत की थी, लेकिन इस दिशा में भी कुछ खास नहीं हुआ। मीडिया में भी ऐसे हादसे कभी मुहिम नहीं बन पाए।  और राजनेताओं के लिए तो मानो दौरा लोकप्रिय होने की सबसे जरुरी खुराक है। फिर, आलू की फसल इफरात में होने पर जैसे आलू सड़क पर मारा-मारा डोलता है, उसी तर्ज पर एक अरब से अधिक आबादी वाले हमारे देश में लोग मारे डोलते हैं। सचाई यही है कि यहां जान की कोई कीमत नहीं है और यूरोपीय देशों एक जान बचाने में पूरी मशीनरी हमेशा एक पांव पर खड़ी रहती है। ऑक्सफोर्ड की घटना तो उनकी सक्रियता की अनूठी मिसाल भर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(ये लेख आज यानी 11 नवंबर को अमर उजाला के संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुआ है)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-146363596237636448?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/146363596237636448/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2009/11/blog-post.html#comment-form" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/146363596237636448?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/146363596237636448?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2009/11/blog-post.html" title="चंडीगढ़ हादसे से फिर उजागर प्रशासन का संवेदनहीन चेहरा" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;Dk8DRXo4fip7ImA9WxNVF0g.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-966290902679776061</id><published>2009-10-29T00:03:00.001+05:30</published><updated>2009-10-29T00:04:34.436+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-10-29T00:04:34.436+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सीरियल" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लापतागंज" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="व्यंग्य" /><title>कॉमेडी के बाजार में विशुद्ध व्यंग्य को पुनर्स्थापित करता ‘लापतागंज ’</title><content type="html">बुधवार यानी 28 अक्टूबर को सब टीवी पर प्रसारित लापतागंज का तीसरा एपिसोड देखा तो एक छोटे से शब्द ने दिल खुश कर दिया। शब्द था-लबड़याए। धारावाहिक के मुख्य किरदार मुकंदी लाल गुप्ता की पत्नी घर के बीच में चावल की बोरी पर गिरे पति से दो टूक कहती है- तुम कहां बीच में ही लबड़याए रहे हो...सोना है तो बिस्तर पर सोओ। पूरी तरह याद नहीं है, लेकिन ये एपिसोड शरद जोशी के संभवत: डेमोक्रेसी नामक निबंध का रुपांतरण था, जिसमें वोट की ताकत से अंजान लोगों की वोट डालने में दिलचस्पी नहीं है, और जिन चंद लोगों की दिलचस्पी है भी, उन्हें वोट डालना नसीब नहीं होता, क्योंकि या तो उनके वोट पहले ही डाल दिए जाते हैं या फिर वोटर लिस्ट में उनका नाम नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लब्धप्रतिष्ठ व्यंग्यकार शरद जोशी के व्यंग्य पर आधारित सीरियल लापतागंज की पिछली तीन कड़ियों को देखकर शिद्दत से अहसास होता है कि टेलीविजन पर बन चुके कॉमेडी के बड़े बाजार में विशुद्ध व्यंग्य के लिए न केवल जगह है, बल्कि विज्ञापन भी हैं। अच्छी बात यह है कि इन व्यंग्यों को स्क्रिप्ट में परिवर्तित करते हुए थोड़ा बहुत परिवर्तन किया है लेकिन वो आज की परिस्थतियों आवश्यक मालूम पड़ता है। मसलन-बुधवार के एपिसोड में वोट डालने को इच्छुक एक शख्स कहता है- मेरी पत्नी ने जब से देखा है कि वोट डालने के बाद लोग अपनी निशान लगी उंगली दिखाते हैं, तब से वोट डालने को उतावली है। इसलिए उसने नेल पॉलिश भी लगाई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी सीरियल के सबसे पहले एपिसोड़ की शुरुआत शरद जोशी के उस व्यंग्य से हुई, जिसमें उन्होंने अचानक प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने वाले राजीव गांधी पर कटाक्ष किया था। उस दौर में उनका वो व्यंग्य लेख खासा चर्चित भी हुआ था। पानी की समस्या पर आधारित इस व्यंग्य में राजीव जी गांव के लोगों से पूछते हैं- गांव से नदी कितनी दूर है? गांव वाले जवाब देते हैं-दो किलोमीटर। तो राजीव फिर सवाल करते हैं-तो क्या लौटते में भी इतनी ही पड़ती है। ऐसे कई कटाक्ष इस व्यंग्य में हैं। लेकिन,लापतागंज में राजीव जी का किरदार बदलकर एक विदेश में पढ़े-लिखे मुख्यमंत्री का हो जाता है, जो अपने पिता के मरने के बाद कुर्सी संभालता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन,सवाल शरद जोशी के व्यंग्य के टेलीस्क्रिप्ट में बदलने का नहीं है। सवाल है इस सीरियल के बहाने विशुद्द व्यंग्य की दर्शकों के बीच पहुंच का। अचानक रजनी, ये जो है ज़िंदगी और कक्का जी कहिन जैसे दूरदर्शन मार्का लेकिन सामाजिक विसंगतियों पर कटाक्ष करते धारावाहिकों की याद दिलाता हुआ ‘लापतागंज ’ बाजारवाद के उस दौर में दर्शकों से रुबरु है, जहां इस तरह का सीरियल निर्माण की सोच भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल,लापतागंज सिर्फ एक कॉमेडी सीरियल नहीं है,ये उससे कहीं आगे का धारावाहिक है। आखिर,व्यंग्य को सामाजिक आक्रोश की परीणिति कहा गया है, और इस सीरियल के बहाने शरद जोशी की कलम से निकले कटाक्ष एक बार फिर दर्शकों को सोचने को मजबूर करेंगे कि कुछ भी तो नहीं बदला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर, स्वस्थ्य मनोरंजन की दृष्टि से देखें तो हंसी-ठिठोली का बड़ा बाजार आज मौजूद है, लेकिन इसमें व्यंग्य कहां है ?या तो इस कॉमेडी में मिमिक्री है या भौंडा हास्य। कहीं द्विअर्थी चुटकुलेबाजी है, तो कहीं सिर्फ हंसाने की कोशिश करते निरर्थक चुटकले। हां, इनके बीच तारक मेहता का उल्टा चश्मा जैसे धारावाहिक सामाजिक संदेश देने की कोशिश करते जरुर दिखते हैं,लेकिन एक सीमा तक। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलचस्प यह है कि ‘लापतागंज ’ के दौरान विज्ञापनों की खासी तादाद पहली नज़र में यह भरोसा जगाती है कि विज्ञापनदाताओं को भी शरद जोशी के व्यंग्य की ताकत मालूम है, और उन्हें इसके हिट होने का भरोसा है। सब टीवी का भारतीय टेलीविजन की दुनिया में यह योगदान तो है ही, कि वो उन सीरियल्स के जरिए स्वस्थ्य मनोरंजन की अलख जगाए हुए है,जिनके लिए टीआरपी की होड़ में जुटे चैनलों पर जगह नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-966290902679776061?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/966290902679776061/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2009/10/blog-post_29.html#comment-form" title="8 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/966290902679776061?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/966290902679776061?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2009/10/blog-post_29.html" title="कॉमेडी के बाजार में विशुद्ध व्यंग्य को पुनर्स्थापित करता ‘लापतागंज ’" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0ANRHs_fip7ImA9WxNVFUU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-7428917939570378789.post-2802807606471871635</id><published>2009-10-26T23:54:00.007+05:30</published><updated>2009-10-26T23:59:55.546+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-10-26T23:59:55.546+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हिन्दी अखबार" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="नई दुनिया की गलतियां" /><title>'नई दुनिया' की गलतियों के बहाने एक सवाल</title><content type="html">&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SuXp-5dzgyI/AAAAAAAAAB4/XOIFK1C1DvQ/s1600-h/naidunia-mistake3.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 286px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SuXp-5dzgyI/AAAAAAAAAB4/XOIFK1C1DvQ/s320/naidunia-mistake3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5396976995260400418" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;क्या हिन्दी के समाचार पत्र भाषा-वर्तनी की गलतियां बहुत ज्यादा करते हैं? ये सवाल इसलिए क्योंकि यह गलतियां लगातार अख़बारों में दिखायी देती हैं, और आप इनसे चाहकर भी नज़र नहीं चुरा सकते। राष्ट्रीय समाचार पत्रों में तमाम सावधानियों के बावजूद गलतियां दिखायी देती हैं तो अफसोस अधिक होता है। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SuXpnG2TvlI/AAAAAAAAABo/uzUJS5uLt9k/s1600-h/naidunia-mistake1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 286px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SuXpnG2TvlI/AAAAAAAAABo/uzUJS5uLt9k/s320/naidunia-mistake1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5396976586535976530" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ये बात आज इसलिए क्योंकि राष्ट्रीय समाचार पत्र ‘नई दुनिया’ के 26 अक्टूबर के अंक को रोज की तरह देखा तो अचानक हेडलाइन्स में एक के बाद एक कई गलतियां दिखायी दे गईं। कहीं बदमाश को बादमाश लिखा गया, तो कहीं शिकंजा को शिंकजा। सवाल, छोटी-बड़ी गलती का नहीं है, सवाल है अशुद्धि का।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SuXpxLPZFRI/AAAAAAAAABw/xrafbbwU9uA/s1600-h/naidunia-mistake2.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 259px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SuXpxLPZFRI/AAAAAAAAABw/xrafbbwU9uA/s320/naidunia-mistake2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5396976759513617682" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;क्योंकि, जब शब्द हेडलाइन में ही गलत लिखे दिखायी देते हैं,तो पढ़ना अचानक भारी लगने लगता है। खास बात यह कि आपके सामने प्रस्तुत तीन कतरनें सरसरी निगाह से अखबार पढ़ने के दौरान ही दिखायी दे गईं। और इन समाचारों की पूरी कॉपी नहीं पढ़ी गई है। अब आप इन तीन कतरनों पर नज़र डालिए और अपने विचार बताइए.........&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7428917939570378789-2802807606471871635?l=pandeypiyush.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/feeds/2802807606471871635/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2009/10/blog-post_26.html#comment-form" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/2802807606471871635?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/7428917939570378789/posts/default/2802807606471871635?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pandeypiyush.blogspot.com/2009/10/blog-post_26.html" title="'नई दुनिया' की गलतियों के बहाने एक सवाल" /><author><name>पीयूष पाण्डे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11829771563390877484</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://1.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SYcX1LQPSzI/AAAAAAAAAAM/XrgN3OioRPY/s1600-R/piyush.jpg" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_blG4658K9Lk/SuXp-5dzgyI/AAAAAAAAAB4/XOIFK1C1DvQ/s72-c/naidunia-mistake3.jpg" height="72" width="72" 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