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	<title>मंतव्य :: पंकज बेंगाणी का ब्लॉग । Mantavya :: Hindi Blog of Pankaj Bengani</title>
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	<description>पंकज बेंगाणी का ब्लॉग</description>
	<pubDate>Thu, 24 Jun 2010 06:03:12 +0000</pubDate>
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		<title>लैट्स टॉक इन इंग्लिश बड्डी</title>
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		<pubDate>Thu, 24 Jun 2010 06:03:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पंकज बेंगाणी</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[आचार व्यवहार]]></category>

		<category><![CDATA[अंग्रेजी]]></category>

		<category><![CDATA[भाषा]]></category>

		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

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		<description><![CDATA[आज सुबह एक स्टोर में दो महिलाओं को बतियाते देखा. दोनों &#8220;बड़ी मुश्किल&#8221; से अंग्रेजी में बात कर रही थी. देख कर ही लग रहा था कि उनका दिमागी कम्प्यूटर तेजी से अनुवाद की प्रक्रिया को अंजाम दे रहा है परंतु फिर भी गफलत उनके चेहरे पर हावी थी.
वे दोनों वस्तुत: अपना मजाक बना रही [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आज सुबह एक स्टोर में दो महिलाओं को बतियाते देखा. दोनों &#8220;बड़ी मुश्किल&#8221; से अंग्रेजी में बात कर रही थी. देख कर ही लग रहा था कि उनका दिमागी कम्प्यूटर तेजी से अनुवाद की प्रक्रिया को अंजाम दे रहा है परंतु फिर भी गफलत उनके चेहरे पर हावी थी.</p>
<p>वे दोनों वस्तुत: अपना मजाक बना रही थी और मुझे तथा कुछ अन्य लोगों को मुस्कुराने की वजह उपलब्ध करवा रही थी. धीरे धीरे उनका कम्प्यूटर जवाब देता गया और अंत में उनकी गाड़ी हिन्दी की पटरी पर लौट आई. उन्होनें भी राहत की सांस ली और हमने भी.</p>
<p>मुझे यह आजतक समझ नहीं आया कि लोग जिस भाषा (पढें अंग्रेजी) में बोलने से असहजता महसूस करते हैं उसे आम बोलचाल के समय इस्तेमाल ही क्यों करते हैं? क्या यह दिखाने के लिए कि वे &#8220;पढे लिखे&#8221; और &#8220;आधुनिक&#8221; हैं. यदि हाँ, तो क्या हिन्दी भाषी बेवकूफ हैं? मुझे तो लगता है जो टूटी फुटी अंग्रेजी में जबरदस्ती गलत सलत बोलकर अपनी भद पिटवाते हैं वे बेवकूफ हैं.</p>
<p>हमें हिन्दी या अन्य स्थानीय भाषा में बात करने से शर्म क्यों आनी चाहिए? विश्वास कीजिए कई जगह तो हिन्दी तथा प्रादेशिक भाषा में बात करने से उल्टा सम्मान प्राप्त होता है, और मैं किसी &#8220;हिन्दी बढाओ - चलाओ - उठाओ&#8221; किस्म के कार्यक्रम की बात नहीं कर रहा हूँ.</p>
<p>कुछ महिनों पहले मैं दिल्ली में था. अवसर था मंथन पुरस्कार कार्यक्रम. कार्यक्रम के दौरान मैनें एक को छोडकर अन्य लोगों की तरह &#8220;तरकश&#8221; पर व्यक्तत्व अंग्रेजी में, थोड़ी कठिनाई के साथ दिया. बाद में मुझे काफी ग्लानि का अनुभव हुआ.</p>
<p>दूसरे दिन मंच पर जाकर तरकश के लिए पुरस्कार ग्रहण करने के बाद सैंकडों लोगों के समक्ष धन्यवाद टिप्पणी मैनें &#8220;हिन्दी&#8221; में ही कही. मैनें खुब तालियाँ बटोरी परंतु उससे भी अधिक मुझे काफी आत्मसंतुष्टि का अनुभव हुआ. जब मैं नीचे उतरा तो &#8220;गुजरात लॉ सोसाइटी&#8221; के आला अफसर ने मुझे धन्यवाद करते हुए कहा कि &#8220;वे बहुत खुश हैं कि मैं हिन्दी में बोला&#8221;.</p>
<p>एक मैं ही था जो हिन्दी में बोला था. एक अन्य विजेता जो कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आया था, उसने तेलुगु में बात की, और आयोजक उससे सहानुभूति प्रगट करते हुए से पेश आए.</p>
<p>बात इतनी सी है कि अपनी भाषा बोलने में शर्म नहीं आनी चाहिए, और अपनी भाषा बोलकर खुद को नीचा भी नहीं समझना चाहिए. भाषा भाषा होती है, सम्पर्क का एक माध्यम, इसमें छोटा-बडा नहीं होता.</p>
<p>कई अन्य लोगों की तरह हिन्दी के उत्थान के लिए मैं अंग्रेजी के पतन की कामना नहीं करता, ना ही कहता हूँ कि अंग्रेजी हटाओ. दोष अंग्रेजी भाषा का नहीं है, दोष उन मूढ अंग्रेजी प्रेमियों का है जिन्हें शायद यह भी नहीं पता कि अंग्रेजी में मूलाक्षर कितने होते हैं.</p>
<p>मेरी नाराजगी उन लोगों से भी है जो हिन्दी - संस्कृत का जानबूझ कर ना ना प्रकार से मजाक उडाते हैं. कई लोगों को आपने भी देखा होगा जो कहते फिरते हैं कि हिन्दी में &#8220;<strong>रेल</strong>&#8221; को कहते हैं &#8220;<strong>लोहपतगामिनी</strong>&#8220;. यह घटिया अनुवाद है और रेल का पर्याय बिल्कुल भी नहीं है. इन लोगों को मैं बेवकूफ से अधिक कुछ नहीं मानता. <strong>रेल </strong>का हिन्दी <strong>रेल </strong>है और इसमें क्या दोष है? हिन्दी में उपयुक्त शब्द नहीं है तो अपना लो ना!</p>
<p>और जरा ये अंग्रेजी प्रेमी बताएँ कि &#8220;योग&#8221;, &#8220;रोटी&#8221;, &#8220;अवतार&#8221;, &#8220;आरती&#8221;&#8230; आदि के मूल शुद्ध अंग्रेजी शब्द (पर्याय) क्या हैं? योग को फिर क्यों &#8220;योगा&#8221; कहते फिरते हैं? क्यों नहीं &#8220;Stretched Body Divine Exercise&#8221; गढ लिया जाए.</p>
<p>मजाक किसी भी भाषा का नहीं बनना चाहिए और हमें हर उस भाषा को सीखना भी चाहिए जो उपयोगी हो और आवश्यक भी. मेरी समझ से, अब भारतीयों को चीनी भाषा को सीखने पर भी ध्यान देना चाहिए. मगर पहले &#8220;अंग्रेजियत&#8221; से तो बाहर आएँ.</p>
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		<title>तरकश पर 6 नई श्रेणियाँ</title>
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		<pubDate>Thu, 10 Jun 2010 10:12:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पंकज बेंगाणी</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[तकनीक]]></category>

		<category><![CDATA[माइक्रोपोस्ट]]></category>

		<category><![CDATA[तरकश]]></category>

		<category><![CDATA[साइट]]></category>

		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

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		<description><![CDATA[माइक्रोपोस्ट -
तरकश.कॉम पर कुछ नई श्रेणियाँ जोड़ी गई हैं. उम्मीद है कि तरकश के पाठक इनसे लाभांवित होंगे.
नई श्रेणियाँ इस प्रकार से है -
टेक टिप्स : तकनीकी टिप्स और ट्रिक्स
अंतरिक्ष : ब्रह्मांड की बातें, खोज अभियान तथा अन्य
अपराध और आतंक : अपराध के विरूद्ध लड़ाई, नई तकनीकें
प्रतिरक्षा : नए हथियार और तकनीकें
व्यक्तित्व : बातें महानुभावों [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>माइक्रोपोस्ट -</p>
<p><a href="http://www.tarakash.com/2" target="_blank"><strong>तरकश.कॉम</strong></a> पर कुछ नई श्रेणियाँ जोड़ी गई हैं. उम्मीद है कि तरकश के पाठक इनसे लाभांवित होंगे.</p>
<p>नई श्रेणियाँ इस प्रकार से है -</p>
<p><strong><a href="http://www.tarakash.com/2/e-word/tech-tips.html" target="_blank">टेक टिप्स</a> : </strong>तकनीकी टिप्स और ट्रिक्स</p>
<p><strong><a href="http://www.tarakash.com/2/science/space.html" target="_blank">अंतरिक्ष</a> :</strong> ब्रह्मांड की बातें, खोज अभियान तथा अन्य</p>
<p><strong><a href="http://www.tarakash.com/2/technology/crime-terrorism.html" target="_blank">अपराध और आतंक</a> : </strong>अपराध के विरूद्ध लड़ाई, नई तकनीकें</p>
<p><strong><a href="http://www.tarakash.com/2/technology/defence.html" target="_blank">प्रतिरक्षा </a>: </strong>नए हथियार और तकनीकें</p>
<p><strong><a href="http://www.tarakash.com/2/magazine/personalities.html" target="_blank">व्यक्तित्व </a>:</strong> बातें महानुभावों की</p>
<p><strong><a href="http://www.tarakash.com/2/entertainment/celebrity.html" target="_blank">सेलेब्रिटी</a> : </strong>उनकी खबरें जिन्हें लोग चाहते हैं</p>
<p><a href="http://www.tarakash.com/2" target="_blank"><strong>तरकश</strong></a> पर अब ज्ञान, विज्ञान, मनोरंजन, तकनीक, इतिहास और रोचक तथ्यों पर आधारित कुल <strong>37 श्रेणियाँ</strong> उपलब्ध हैं.</p>
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		<title>कश्मीर घाटी के लोग आज़ादी चाहते हैं! यह कैसी रिपोर्टिंग?</title>
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		<pubDate>Thu, 27 May 2010 06:20:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पंकज बेंगाणी</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[आतंकवाद]]></category>

		<category><![CDATA[मीडिया]]></category>

		<category><![CDATA[राजनिति]]></category>

		<category><![CDATA[कश्मीर]]></category>

		<category><![CDATA[बीबीसी]]></category>

		<category><![CDATA[भारत]]></category>

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		<description><![CDATA[बीबीसी की हिन्दी सेवा की आज की मुख्य खबर है - भारत प्रशासित (यह ब्रिटिश सेवा है इसलिए ऐसा लिखती है) कश्मीर घाटी के लोग आज़ादी चाहते हैं.
यह खबर एक सर्वे पर आधारित है जिसे एक ब्रितानी कथाकथित अकादमिक ने किया है. इस खबर पर नज़र डालें तो इसमें तथ्यात्मक भूलें नजर आती हैं.

एक तरफ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>बीबीसी की हिन्दी सेवा की आज की <a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/05/100527_kashmir_survey_va.shtml" target="_blank">मुख्य खबर</a> है - भारत प्रशासित (यह ब्रिटिश सेवा है इसलिए ऐसा लिखती है) कश्मीर घाटी के लोग आज़ादी चाहते हैं.</p>
<p>यह खबर एक सर्वे पर आधारित है जिसे एक ब्रितानी कथाकथित अकादमिक ने किया है. इस खबर पर नज़र डालें तो इसमें तथ्यात्मक भूलें नजर आती हैं.</p>
<p><img class="aligncenter size-full wp-image-1040" title="bbc" src="http://www.tarakash.com/blogs/mantavya/wp-content/uploads/2010/05/bbc.jpg" alt="bbc" width="450" height="474" /><br />
एक तरफ लिखा है कि घाटी के 74% से 95% लोग आज़ादी चाहते हैं (इतना बड़ा फर्क?). चलो ठीक है मान लेते हैं. परंतु आगे लिखा है भारतीय प्रशासित कश्मीर के 43% लोग आज़ादी के पक्षधर हैं. कमाल है!</p>
<p>चलिए मान लेते हैं पहला प्रतिशत घाटी के लोगों का है और दूसरा समूचे कश्मीर का. तो भी जम्मु क्षैत्र के लोगों की संख्या इतनी भी अधिक नहीं कि इतना बड़ा फर्क आ जाए.</p>
<p>अब आगे देखिए - कश्मीर के किसी भी हिस्से में (यानी कि घाटी भी) आज़ादी को लेकर बहुमत नज़र नहीं आया. तो पहली पंक्ति में ऐसा क्यों लिखा है कि 95% लोग आज़ादी चाहते हैं. क्या 95% बहुमत नहीं होता?</p>
<p>अजीब सर्वेक्षण और उससे भी अजीब रिपोर्टिंग. यह भारत है जहाँ कोई भी विदेशी अकादमिक उठकर कश्मीर जाकर सर्वे कर आता है और फिर अनर्गल नतीजे प्रकाशित भी कर देता है. धन्य हो और जय हो!</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
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		<title>गुजरात क्यों है स्वर्णिम?</title>
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		<pubDate>Sat, 01 May 2010 05:31:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पंकज बेंगाणी</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[विकास]]></category>

		<category><![CDATA[समाज]]></category>

		<category><![CDATA[गुजरात]]></category>

		<category><![CDATA[मोदी]]></category>

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		<description><![CDATA[गरवी गुजरात की स्थापना के आज 50 वर्ष पूर्ण हुए हैं.  तत्कालीन मुम्बई राज्य से गुजरात प्रदेश को अलग राज्य के रूप में मान्यता  दिलवाने के लिए महागुजरात आंदोलन हुआ था और कई लोगों की जानें भी गई थी.  गुजरात को मुम्बई राज्य से अलग ना करने के पीछे एक तर्क यह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गरवी गुजरात</strong> की स्थापना के आज 50 वर्ष पूर्ण हुए हैं.  तत्कालीन मुम्बई राज्य से गुजरात प्रदेश को अलग राज्य के रूप में मान्यता  दिलवाने के लिए महागुजरात आंदोलन हुआ था और कई लोगों की जानें भी गई थी.  गुजरात को मुम्बई राज्य से अलग ना करने के पीछे एक तर्क यह दिया जाता था कि  मुम्बई से अलग गुजरात राज्य टिक नहीं पाएगा और ना ही प्रगति कर पाएगा.  लेकिन महागुजरात आंदोलन और लोगों की भावनाओं को अंतत: जीत मिली और 1 मई  1960 मुम्बई राज्य के दो भाग कर दिए गए. एक गुजरात प्रदेश के रूप में जाना  गया और एक महाराष्ट्र.</p>
<p>समय गवाह है कि 60 दशक में जो भावनाएँ व्यक्त की गई थी कि मुम्बई से  अलग गुजरात राज्य का कोई भविष्य नहीं होगा वह गलत साबित हुईं. गुजरात को आज  भारत का &#8220;विकास इंजिन&#8221; माना जाता है. विगत कई वर्षों से दो अंकों की  जीडीपी विकासदर के साथ गुजरात भारत का &#8220;स्वर्णिम राज्य&#8217; बना है. गुजरात के  गौरव को कुछेक शब्दों में वर्णित करना कठीन है. गुजरात का इतिहास हजारों  वर्ष पूराना है और अत्यंत गौरवशाली है. परंतु हमने पिछले कुछेक दशकों को  मानक मानकर 7 ऐसी बातें चुनी जिनसे गुजरात <strong>&#8220;गरवी गुजरात&#8217;</strong> बना है.</p>
<p><a href="http://www.tarakash.com/2/magazine/-7/2094-7-facts-which-makes-gujarat-best.html" target="_blank"><strong>सम्पूर्ण लेख तरकश पर</strong></a></p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>इसे कहते हैं &#8216;आइडिया&#8221; उड़ाना</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Apr 2010 05:22:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पंकज बेंगाणी</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[मीडिया]]></category>

		<category><![CDATA[विज्ञापन]]></category>

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		<description><![CDATA[आप किसी विज्ञापन केम्पेन के पीछे बहुत मेहनत करें. अपनी ब्रांड बिल्डिंग के लिए पैसे खर्च करें और इससे पहले कि आप उससे लाभ अर्जित करने की सोचें कोई यदि आपका आइडिया ही उठा ले जाए तो आपको कैसा लगेगा?
यह बात भास्कर समूह को पूछनी चाहिए जिसके दो प्रकाशनों के साथ ऐसा हुआ है.
रांची में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आप किसी विज्ञापन केम्पेन के पीछे बहुत मेहनत करें. अपनी ब्रांड बिल्डिंग के लिए पैसे खर्च करें और इससे पहले कि आप उससे लाभ अर्जित करने की सोचें कोई यदि आपका आइडिया ही उठा ले जाए तो आपको कैसा लगेगा?</p>
<p>यह बात भास्कर समूह को पूछनी चाहिए जिसके दो प्रकाशनों के साथ ऐसा हुआ है.</p>
<p>रांची में दैनिक भास्कर समाचारपत्र की लॉंचिंग से पहले एक <strong>&#8220;टीज़र&#8217; </strong>केम्पेन शुरू किया गया जिसमें सड़को के किनारे लगे बिलबॉर्डों पर बड़े बड़े अक्षरों से लिखा गया था कि - <strong>सुना तुमने, अब रांची में चलेगी हमारी मर्जी.</strong></p>
<p>यह केम्पेन भास्कर की विज्ञापन नीति का हिस्सा था. कुछ ही दिनों में मूल समाचारपत्र को प्रदर्शित किया जाना था और साथ में लिखा जाना था यह -<strong> दैनिक भास्कर - अब चलेगी आपकी मर्जी</strong>.</p>
<p>लेकिन ऐसा होता इससे पहले ही वहाँ पहले से ही स्थापित दैनिक<strong> हिन्दूस्तान </strong>ने इस कैम्पेन की हवा निकाल दी. इस समाचारपत्र ने &#8220;<strong>आपकी मर्जी</strong>&#8221; नाम से एक &#8220;पोल&#8221; शुरू कर दिया जिसमें पाठकों से किसी भी एक विषय पर राय मांगी जाती है. आपकी मर्जी की अक्षर भी भास्कर के जैसे ही रखे गए हैं. यानी कि पढने वाले को लगे कि यह कैम्पेन किसी और का नहीं बल्कि हिन्दूस्तान का ही है!</p>
<p>ऐसा भास्कर के साथ पहली बार नहीं हुआ है. मुम्बई में <strong>भास्कर और ज़ी </strong>के समाचारपत्र <strong>डीएनए</strong> के लॉंच के समय भी यही हुआ था. तब इस समूह ने बिलबॉर्डो पर लिखा था -<strong> Speak Up. It&#8217;s in your DNA</strong>. बिलबॉर्डों पर ऐसे लोगों की तस्वीर लगाई गई जिनके मूँह पर टेप लगे थे. लोगों में उत्सुकता जागृत हुई. परंतु इससे पहले की DNA समाचारपत्र की छवि दिखाई जाए या इसे लॉंच किया जाए <strong>Times of India</strong> ने एक विज्ञापन छापा जिसमें लोग अपने मूँह पर से टेप हटा रहे हैं. नीचे लिखा था.<strong> Speak Up. It&#8217;s in your DNA. Maharashtra Times. </strong></p>
<p>ऐसा अन्य कम्पनियों के साथ भी होता है. एयरटेल डिजिटल टीवी को अपने लॉंच के समय भी इसी तरह की &#8220;आइडिया थेफ्ट&#8217; का सामना करना पड़ा था. तब एयरटेल ने अपने केम्पेन में एक लाल रंग का बड़ा सा सोफा दिखाया और ऊपर लिखा था - &#8220;<strong>Welcome us to your home</strong>&#8220;. <strong>एयरटेल </strong>जब तक अपना नाम जाहिर करता यह पूरा केम्पेन <strong>रिलायंस बिग टीवी </strong>ने उठा लिया. और उसके विज्ञापनों में हुबहू वही सोफा दिखाई देने लगा.</p>
<p>एक दूसरे को पटखनी देने के लिए ऐसा भी होता है.</p>
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		</item>
		<item>
		<title>नैतिकता की दुहाई और बेशर्म समाचार चैनल</title>
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		<pubDate>Thu, 22 Apr 2010 08:42:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पंकज बेंगाणी</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[मीडिया]]></category>

		<category><![CDATA[BJP]]></category>

		<category><![CDATA[congress]]></category>

		<category><![CDATA[India]]></category>

		<category><![CDATA[news]]></category>

		<category><![CDATA[भाजपा]]></category>

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		<description><![CDATA[कल शाम स्टार न्यूज़ पर भाजपा की महँगाई विरोधी रैली और भाजपा अध्यक्ष नीतीन गडकरी के गर्मी से बेहाल हो जाने की खबर को जिस तरह से दिखाया गया उससे शर्म सी महसूस होने लगी.
स्टार न्यूज़ के एंकर ने लगभग अभ्रदता की सीमाएँ ही लांघ ली थी. स्टोरी कॉपीराइटर ने गडकरी के मोटापे का मजाक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कल शाम स्टार न्यूज़ पर भाजपा की महँगाई विरोधी रैली और भाजपा अध्यक्ष नीतीन गडकरी के गर्मी से बेहाल हो जाने की खबर को जिस तरह से दिखाया गया उससे शर्म सी महसूस होने लगी.</p>
<p>स्टार न्यूज़ के एंकर ने लगभग अभ्रदता की सीमाएँ ही लांघ ली थी. स्टोरी कॉपीराइटर ने गडकरी के मोटापे का मजाक उडाने से भी परहेज नहीं की.</p>
<p>पूरी रिपोर्ट देखते समय मैं सिर्फ यह सोचता रहा कि इसमें आखिर खबर कहाँ है. नीतीन गर्मी को झेल नहीं पाए क्या यह इतनी बडी खबर है कि 15 मिनट की विशेष रिपोर्ट बनाई जाए?</p>
<p>खबर यह बनती कि भाजपा की रैली सफल रही, या यह बनती कि रैली असफल रही, या यह तो जरूर बनती कि ट्रेफिक में फंसे लोगों का बुरा हाल रहा. लेकिन गडकरी की खबर तो विचित्र ही लगी.</p>
<p>समाचार चैनलों को कम से कम थोडी भद्रता दिखानी चाहिए. भाजपा मुख्य विपक्षी दल है और गडकरी उसके अध्यक्ष हैं. उनका इस तरह से मजाक उडाना पसंद नहीं आया.</p>
<p>क्या कोई आदमी गर्मी के मारे बेहोश नहीं हो सकता? बाकी नेता तो खड़े ही थे. क्या सोनिया गांधी [भगवान ना करे] इस तरह से बेहोश हो जाती तो उनका भी क्या इसी तरह से मजाक बनाया जाता? असम्भव!</p>
<p>चैनल बदला तो एनडीटीवी इंडिया पर श्री विनोद दुआ नैतिकता की दुहाई देते दिखे. उन्होनें 6 बार कहा हम समाचार चैनल वाले कलम के सिपाही हैं यही हमारा हथियार है. उन्हें शायद पता नहीं उनका हथियार जंग खा चुका है .</p>
<p>[दुआ साहब की नैतिकता पर अगली बार]</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>हिन्दी अनुवाद की समस्या</title>
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		<pubDate>Tue, 20 Apr 2010 07:32:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पंकज बेंगाणी</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

		<category><![CDATA[book]]></category>

		<category><![CDATA[hindi]]></category>

		<category><![CDATA[translation]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछले दिनों एक बुक स्टोर में जाना हुआ. पूरे स्टोर में अंग्रेजी किताबें भरी हुई थी परंतु एक रैक में हिन्दी किताबें भी रखी हुई थी इसलिए ध्यान उस ओर विशेष रूप से गया. देखा कि हिन्दी किताबों में अधिकतर किताबें धार्मिक थी, मानों हिन्दी पाठक वहीं पढते हों. चेतन भगत की चारों उपन्यासों का [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले दिनों एक बुक स्टोर में जाना हुआ. पूरे स्टोर में अंग्रेजी किताबें भरी हुई थी परंतु एक रैक में हिन्दी किताबें भी रखी हुई थी इसलिए ध्यान उस ओर विशेष रूप से गया. देखा कि हिन्दी किताबों में अधिकतर किताबें धार्मिक थी, मानों हिन्दी पाठक वहीं पढते हों. चेतन भगत की चारों उपन्यासों का हिन्दी संस्करण भी प्रमुखता से रखा गया था, मानो वे चारों काफी बिकती हों. और वहाँ मुझे पाउलो कोएलो की अति प्रसिद्ध किताब &#8220;द अलकेमिस्ट&#8221; का हिन्दी संस्करण भी - पीछे कहीं दबा हुआ - दिख गया, मानों उसमें किसी की रूचि होगी ही नहीं.</p>
<p>मैने मूल अंग्रेजी उपन्यास भी देखा है जो कि काफी मोटा है, परंतु हिन्दी संस्करण काफी पतला लगा और अक्षर भी बड़े थे. इसलिए खोजने लगा कि कहीं &#8220;सम्पादक&#8221; का नाम तो नहीं लिखा है. परंतु वह कहीं नहीं दिखा.</p>
<p>इसलिए सोचा चलो &#8220;लम्बी&#8221; अंग्रेजी &#8220;छोटी&#8221; हिन्दी में समा जाती होगी तो अब आगे की राह पकड़ी जाए. वह यह कि अनुवादक का नाम देखा जाए. &#8216;कमलेश्वर&#8221;! नाम ही काफी है, यदि ये कमलेश्वर वही हों जो मैं मान रहा हूँ. फिर मैनें किताब पढनी शुरू की. वैसे इस तरह के स्टोर की यह विशेषता होती है. वहाँ जाइए और सोफे पर धम्म से बैठकर किताब पढिए. कोई टोकने वाला नहीं कि भैया मुफ्त में ही पढ लोगे तो हम क्या कमाएंगे!</p>
<p>मैनें पढना शुरू किया तो अनुवाद कुछ अजीब सा लगा. ऐसा लगा मानों अंग्रेजी से सीधा अनुवाद किया गया हो. वैसे मैं यह तो मानुंगा कि पाउलो कोएलो के उपन्यासों का हिन्दी अनुवाद करना कठीन हो सकता है क्योंकि उनकी लेखनी कुछ कुछ दार्शनिक होती है. परंतु जो अनुवाद मैनें देखा वह बहुत ही सामान्य स्तर का लगा.</p>
<p>अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद पढते समय अमूमन ऐसा अनुभव होता है. अनुवादक मात्र &#8220;अनुवाद&#8221; ही करते हैं, यह नहीं देखते कि वाक्य पढने मे कैसा लग रहा है. यह बहुत बड़ी दिक्कत है. दिक्कत इसलिए क्योंकि हिन्दी किताब खरीदने की तीव्र ईच्छा रखने वाले मेरे जैसे व्यक्ति ने भी उस किताब को फिर से रैक में रख दिया और उसे खरीदा नहीं. तो ऐसे किसी व्यक्ति को इस तरह की अनुवादित हिन्दी किताबें पढने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जाए?</p>
<p><strong>&#8220;I saw him when I was going to school.&#8221; - &#8220;मैनें उसे देखा जब मैं जा रहा था विद्यालय.&#8217;</strong></p>
<p>पसंद आया अनुवाद?</p>
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		<title>ऐसे बदलती है सूरत!</title>
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		<pubDate>Fri, 19 Feb 2010 06:19:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पंकज बेंगाणी</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[विकास]]></category>

		<category><![CDATA[अहमदाबाद]]></category>

		<category><![CDATA[जनमार्ग]]></category>

		<category><![CDATA[बीआरटी]]></category>

		<category><![CDATA[मोदी]]></category>

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		<description><![CDATA[5-6 वर्ष पहले एक रिपोर्ट पढी थी. भारत के सर्वाधिक प्रदुषित शहरों की सूचि में अहमदाबाद का नाम दूसरे नम्बर पर था. दुख हुआ था.
5 साल बाद अब एक बार फिर प्रदुषण संबंधित सूचि देखी. सबसे कम प्रदुषित शहरों में दूसरे नम्बर पर अहमदाबाद. जो पहले नम्बर पर है वह शहर इतना बड़ा नहीं है [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>5-6 वर्ष पहले एक रिपोर्ट पढी थी. भारत के सर्वाधिक प्रदुषित शहरों की सूचि में अहमदाबाद का नाम दूसरे नम्बर पर था. दुख हुआ था.</p>
<p>5 साल बाद अब एक बार फिर प्रदुषण संबंधित सूचि देखी. सबसे कम प्रदुषित शहरों में दूसरे नम्बर पर अहमदाबाद. जो पहले नम्बर पर है वह शहर इतना बड़ा नहीं है ना ही इतने कारखाने और वाहन ही हैं.</p>
<p>बदलाव आ सकता है, नियत हो तो! अहमदाबाद और विशेष रूप से जनमार्ग से संबंधित यह नया वीडियो देखें :</p>
<p><object width="560" height="340"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/l15OetusJj8&#038;hl=en_US&#038;fs=1&#038;"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/l15OetusJj8&#038;hl=en_US&#038;fs=1&#038;" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="560" height="340"></embed></object></p>
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		<title>अरे, पेपर नहीं आया!</title>
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		<pubDate>Sat, 30 Jan 2010 06:02:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पंकज बेंगाणी</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[सुबह 6.30 को उठ जाता हूँ. फिर भूत की तरह टहलने लगता हूँ. इंतजार पेपर (पढें समाचार पत्र) का होता है. फेरिया आया कि नहीं. नहीं आएगा तो मुश्किल होगी. शौच के लिए कैसे जाया जाएगा.
बार बार दरवाजे तक जाता हूँ, फिर मायूस होकर लौट आता हूँ. एक आँख घड़ी पर होती है, समय तो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सुबह 6.30 को उठ जाता हूँ. फिर भूत की तरह टहलने लगता हूँ. इंतजार पेपर (पढें समाचार पत्र) का होता है. फेरिया आया कि नहीं. नहीं आएगा तो मुश्किल होगी. शौच के लिए कैसे जाया जाएगा.</p>
<p>बार बार दरवाजे तक जाता हूँ, फिर मायूस होकर लौट आता हूँ. एक आँख घड़ी पर होती है, समय तो बीत रहा है. एक बार लिफ्ट की आवाज़ आती है और मन प्रफुल्लित हो जाता है. फेरिया आ गया अब तो. पर हाय, लिफ्ट तो बीच में ही रूक गई और कोई साहब दूध लेकर अपने घर चले गए. फेरिया नहीं आया.</p>
<p>अब नहीं रूका जाएगा. तो पुराना कोई अखबार उठाकर काम चलाने के लिए शौच में घुस जाता हूँ. अनमने ढंग से थोड़ी देर में वापस लौटता हूँ. 7 बजे गए. फेरिया नहीं आया. क्या हुआ होगा?</p>
<p>दरवाजा खोलता हूँ. नही, पेपर नहीं है. मेरा भतिजा मुझसे कहता है - तो खरीद कर ले आओ. मै कहता हूँ, नहीं आ जाएगा. होती है देर कभी कभी.</p>
<p>लेकिन फिर देर तो बढती ही जा रही है. 7.45 हो गए. आज तो चाय भी नहीं भाई. फिर से दरवाजे पर देखा. पेपर नहीं है. सामने वाले पड़ोसी बैचेन आत्मा की तरह घूम रहे हैं. मुझे देखते ही बताते हैं, पेपर नहीं आया.</p>
<p>जानते हैं भाई नहीं आया, देख तो लो, मैं भी तो घूम ही रहा हूँ.</p>
<p>8.15 हो गए, 8.30 हो गए. अब कोई उम्मीद नहीं. अब नहाने जाओ. नाश्ता करो. ऑफिस के लिए तैयार हो जाओ. 9 बज गए. अब तो नहीं ही आएगा. मन में कैसे कैसे विचार आ रहे हैं. रोज तो 6.15 को आ जाता है. क्या हुआ होगा? बिमार होगा, कहीं एक्सीडेंट तो नहीं हो गया. हे भगवान.</p>
<p>ऑफिस के लिए निकलता हूँ. दरवाजा खोलता हूँ.</p>
<p>पेपर का बंडल पड़ा है. बता नहीं सकता कितनी खुशी मिलती है. बड़े चाव से उठाता हूँ कि पत्नी की आवाज आती है - ऑफिस ऑफिस.</p>
<p>[मेरा घर पढाकु है. घर में 3 पेपर आते हैं. रविवार को 4 भी हो जाते हैं. सोचिए इतने समाचार चैनल है, इंटरनेट है लेकिन "पेपर" तो पेपर है]</p>
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		<title>एक ही लोग, पर दो व्यवहार, कैसे?</title>
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		<pubDate>Thu, 24 Dec 2009 05:24:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पंकज बेंगाणी</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[आचार व्यवहार]]></category>

		<category><![CDATA[विकास]]></category>

		<category><![CDATA[समाज]]></category>

		<category><![CDATA[अहमदाबाद]]></category>

		<category><![CDATA[कांकरिया]]></category>

		<category><![CDATA[जनमार्ग]]></category>

		<category><![CDATA[झील]]></category>

		<category><![CDATA[दिल्ली]]></category>

		<category><![CDATA[मेट्रो]]></category>

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		<description><![CDATA[भारत हो और गंदगी ना हो ऐसा हो नहीं सकता. हमारे धार्मिक स्थानों से लेकर सार्वजनिक वाहनों, सड़कों, गलियों और मौहल्लों हर जगह गंदगी के ढेर दिखाई दे जाते हैं. नदियाँ नालियाँ बनी हुई है, और हम ऐसे ही जीने के अभ्यस्त हैं.
लोगों का व्यवहार ही ऐसा हो गया है कि वह कुड़ेदान के पास [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>भारत हो और गंदगी ना हो ऐसा हो नहीं सकता. हमारे धार्मिक स्थानों से लेकर सार्वजनिक वाहनों, सड़कों, गलियों और मौहल्लों हर जगह गंदगी के ढेर दिखाई दे जाते हैं. नदियाँ नालियाँ बनी हुई है, और हम ऐसे ही जीने के अभ्यस्त हैं.</p>
<p>लोगों का व्यवहार ही ऐसा हो गया है कि वह कुड़ेदान के पास कचरे का पहाड़ बनाता है और कुड़ादान खाली होता है. इसलिए तब आश्चर्य होता है जब यही लोग कभी कभी अपवाद की मिसाल पेश कर देते हैं.</p>
<p><strong>कम से कम 3 स्थान ऐसे देखें मैनें जो मुझे आश्चर्यचकित करते हैं. </strong></p>
<p><a href="http://www.delhimetrorail.com/index.htm" target="_blank"><strong>दिल्ली मेट्रो</strong></a> में कई बार सफर किया है. दिल्ली मेट्रो की तो अपनी विशेषता है ही परंतु उसमें सफर करने वाले दिल्लीवासियों की तारीफ करनी चाहिए कि मेट्रो में गंदगी नहीं दिखाई देती. मेट्रो को शुरू हुए एक दशक होने वाला है लेकिन मेट्रो अभी भी लगभग ज्यों की त्यों बनी हुई है, यह उल्लेखनीय बात है.</p>
<p>लेकिन मेट्रो स्टेशन से बाहर आते ही स्थिति पलट जाती है. आप कश्मीरी गेट, झिलमिल, वेलकम और दिलशाद गार्डन स्टेशन से बाहर आएंगे तो सड़क पर गुटखों के पैकेटों और पीक की बरसात देखेगे.</p>
<p><strong>दूसरा उदाहरण</strong> – अहमदाबाद की <a href="http://ravijr.files.wordpress.com/2009/05/610x.jpg" target="_blank"><strong>कांकरिया झील</strong></a>. अहमदाबाद की सीमाचिह्न रूपी इस झील के नए अवतार को आम जनता के लिए खुले एक साल हो गया है लेकिन यह लेकफ्रंड अभी भी नया नवेला है. एक कागज़ का टुकड़ा भी नहीं दिखता उधर, चाहे लाखों लोग अब तक यहाँ आकर चले गए हों.</p>
<p><strong>तीसरा उदाहरण</strong> – <a href="http://http://www.tarakash.com/blogs/mantavya/?p=998" target="_blank"><strong>अहमदाबाद जनमार्ग</strong></a> बीआरटी. इसको शुरू हुए 3 महिने [ट्रायल रन 8 महिने] हो चुके हैं लेकिन यह भी अभी तक साफ सुथरी बनी हुई है.</p>
<p>लेकिन बाहर आने पर स्थिति पलट जाती है. विशेष रूप से कांकरिया झील से बाहर आने पर उसके कुछ दरवाजों के आगे पीक और गुटखे के पैकेट दिख जाते हैं.</p>
<p><strong>तो ऐसा क्यों है यह समझ नहीं आता.</strong> लोग तो वही हैं. वही लोग मेट्रो और बीआरटी में सफर करते हैं. वही लोग साफ सफाई रखते हैं. और वही लोग बाहर आकर सबसे पहला काम पीक थूकने का करते हैं. <strong>दो व्यवहार कैसे? और क्यों नहीं यही व्यवहार कायम रखा जाए?</strong></p>
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