<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><rss xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" version="2.0"><channel><title>श्री रामबाग मन्दिर</title><description>सर्वे भवन्तु सुखिन:सर्वे सन्तु निरामया,सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मां कश्चिद दु:खभाग भवेत्|
विद्या का अन्तिम लक्ष्य चरित्र निर्माण होना चाहिए |
"श्री महात्मा गाँधी जी"</description><managingEditor>noreply@blogger.com (Unknown)</managingEditor><pubDate>Fri, 16 Oct 2026 08:01:14 +0530</pubDate><generator>Blogger http://www.blogger.com</generator><openSearch:totalResults xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">639</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">25</openSearch:itemsPerPage><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/</link><language>en-us</language><item><title>भगवान श्री कृष्ण के मुकुट में मयूर पंख क्यों है?</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/09/blog-post_03.html</link><pubDate>Thu, 3 Sep 2026 11:44:06 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-5052263356691493462</guid><description>&lt;div&gt;&lt;span&gt;वनवास के दौरान माता सीता जी को प्यास लगी। तभी श्रीरामजी ने चारों ओर देखा तो उनको दूर-दूर तक जंगल ही जंगल दिख रहा था। कुदरत से प्रार्थना की - हे वन देवता ! आसपास जहाँ कहीं पानी हो, वहाँ जाने का मार्ग कृपा कर सुझाईये।तभी वहाँ एक मयूर ने आकर श्रीरामजी से कहा कि आगे थोड़ी दूर पर एक जलाशय है। चलिए मैं आपका मार्ग पथ प्रदर्शक बनता हूँ ।किंतु मार्ग में हमारी भूल चूक होने की संभावना है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्रीरामजी ने पूछा - वह क्यों ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तब मयूर ने उत्तर दिया कि - मैं उड़ता हुआ जाऊंगा और आप चलते हुए आएंगे, इसलिए मार्ग में मैं अपना एक-एक पंख बिखेरता हुआ जाऊंगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उस के सहारे आप‌ जलाशय तक पहुँच ही जाओगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यहां पर महत्वपूर्ण बात यह है कि - मयूर के पंख, एक विशेष समय एवं एक विशेष ऋतु में ही बिखरते हैं।अगर वह अपनी इच्छा विरुद्ध पंखों को बिखेरेगा, तो उसकी मृत्यु हो जाती है, और वही हुआ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अंत में जब मयूर अपनी अंतिम सांस ले रहा था, तब उसने मन में ही कहा कि वह कितना भाग्यशाली है, कि जो जगत की प्यास बुझाते हैं, ऐसे प्रभु की प्यास बुझाने का उसे सौभाग्य प्राप्त हुआ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मेरा जीवन धन्य हो गया। अब मेरी कोई भी इच्छा शेष नहीं रही। तभी भगवान श्रीराम ने मयूर से कहा कि मेरे लिए तुमने जो मयूर पंख बिखेरकर, अपने जीवन का त्यागकर मुझ पर जो ऋणानुबंध चढ़ाया है, मैं उस ऋण को अगले जन्म में जरूर चुकाऊंगा। अगले जन्म में "श्री कृष्ण अवतार- में उन्होंने अपने माथे(मुकुट) पर मयूर पंख को धारण कर वचन अनुसार उस मयूर का ऋण उतारा था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तात्पर्य यही है कि अगर भगवान को ऋण उतारने के लिए पुनः जन्म लेना पड़ता है, तो हम तो मानव हैं. न जाने हम कितने ही "ऋणानुबंध"- से बंधे हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसे उतारने के लिए हमें तो कई जन्म भी कम पड़ जाएंगे। इसलिए जो भी भला हम किसी का कर सकते हैं, इसी जन्म में हमें करना है।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>ब्रज के भावनात्मक 12 ज्योतिर्लिंग </title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/09/12.html</link><pubDate>Thu, 3 Sep 2026 11:39:03 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-6060134676847130139</guid><description>&lt;div&gt;&lt;span&gt;1. ब्रजेश्वर महादेव- (बरसाना)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्री राधा रानी के पिता बृषभानुजी भानोखर सरोवर मे स्नान करके नित्य ब्रजेश्वर महादेव की पूजा करते थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;2. नंदीश्वर महादेव- (नंदगांव)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यहाँ पर महादेवजी पर्वत रूप मे विराजित है जिनके ऊपर नंदभवन बना हुआ है।नंदभवन में कृष्ण बलराम मंदिर के प्रांगण में भगवान शिव के देवता हैं जिन्हें नंदीश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। शिव-लिंग के रूप में इस देवता को राजा वज्रनाभ द्वारा स्थापित किया गया था, और इस देवता को फिर से खोजा गया था और इसे नंदभवन के प्रांगण में स्थापित किया गया था। यह परंपरा है कि कृष्ण बलराम के दशम के अवशेषों को सबसे पहले नंदीश्वर महादेव के देवता को अर्पित किया जाता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;3. आसेश्वर महादेव-(नन्दगाँव)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यहाँ पर महादेवजी नंदलाला के (जन्म उत्सव के) दर्शन की आस लगाकर बैठे है। आसेश्वर नाम से ही झलकता है कि यह स्थान आशा पूर्ति से संबंधित है। पर यह आशा है किसकी?सबकी आशाओं की पूर्ति करने वाले शिव यहाँ एक आशा लेकर आये। आशा पूरी होने तक यहां तप किया और जब आशा पूरी हुई तो शिव आसेश्वर कहलाये। आज भी जो यहां कोई आशा लेकर जाता है तो उसकी आशा जरूर पूरी होती है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;4. कामेश्वर महादेव- काम्य वन (कामा)-&amp;nbsp;&lt;span&gt;यहाँ पर महादेवजी ने पार्वतीजी की राधा तत्व की महिमा जानने की कामना पूर्ण की।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;कामेश्वर नाम क्यों पड़ा? उनके कई नाम हैं - नीलकंठ, चंद्रमौली, गंगाधर, शम्भो, शंकर ठे कामेश्वर होने का एक विशेष कारण है - क्योंकि यहां पार्वती जी ने भगवान शंकर से दुर्लभ इच्छाएं प्राप्त कीं, वे आज तक अपार हैं, कामवन में ही पूरी होने से नाम कामेश्वर पड़ा। वह दुर्लभ इच्छा थी- कृष्णप्राप्ति। लक्ष्मी जी ने कहा है स वै पतिः स्यादकुतोभयः स्वयं समन्त पाति भयातुरं जनम्। स एक एवतरथा मिथोभयं नैवात्मलाभादधि मन्यते परम् ॥ (भागवतम् 5/18/20) "जो कर्म, काल के पहले है वह पति नहीं है क्योंकि वह दूसरे की रक्षा नहीं कर सकता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;5. रामेश्वर महादेव- काम्य वन (कामा)- श्रीकृष्ण ने यहाँ पर श्री राम के आवेश में गोपियों के कहने से बंदरों के द्वारा सेतु का निर्माण किया था। अभी भी इस सरोवर में सेतु बन्ध के भग्नावशेष दर्शनीय हैं। कुण्ड के उत्तर में रामेश्वर महादेव जी दर्शनीय हैं। जो श्री राम वेशी श्रीकृष्ण के द्वारा प्रतिष्ठित हुए थे। कुण्ड के दक्षिण में उस पार एक टीले के रूप में लंकापुरी भी दर्शनीय है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कथा - श्री कृष्ण लीला के समय परम कौतुकी श्री कृष्ण इसी कुण्ड के उत्तरी तट पर गोपियों के साथ वृक्षों की छाया में बैठकर विनोदिनी श्री राधिका के साथ हास्य–परिहास कर रहे थे। उस समय इनकी रूप माधुरी से आकृष्ट होकर आस पास के सारे बंदर पेड़ों से नीचे उतरकर उनके चरणों में प्रणाम कर किलकारियाँ मार कर नाचने–कूदने लगे। बहुत से बंदर कुण्ड के दक्षिण तट के वृक्षों से लम्बी छलांग मारकर उनके चरणों के समीप पहुँचे। भगवान श्री कृष्ण उन बंदरों की वीरता की प्रशंसा करने लगे। गोपियाँ भी इस आश्चर्यजनक लीला को देखकर मुग्ध हो गई। वे भी भगवान श्री रामचन्द्र की अद्भुत लीलाओं का वर्णन करते हुए कहने लगीं कि श्री रामचन्द्र जी ने भी बंदरों की सहायता ली थी। उस समय ललिता जी ने कहा– 'हमने सुना है कि महापराक्रमी हनुमान जी ने त्रेता युग में एक छलांग में समुद्र को पार कर लिया था। परन्तु आज तो हम साक्षात रूप में बंदरों को इस सरोवर को एक छलांग में पार करते हुए देख रही हैं।'&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऐसा सुनकर कृष्ण ने गर्व करते हुए कहा– जानती हो! मैं ही त्रेता युग में श्री राम था मैंने ही राम रूप में सारी लीलाएँ की थी। ललिता श्री रामचन्द्र की अद्भुत लीलाओं की प्रशंसा करती हुई बोलीं– तुम झूठे हो। तुम कदापि राम नहीं थे। तुम्हारे लिए कदापि वैसी वीरता सम्भव नहीं। श्री कृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा– तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा है, किन्तु मैंने ही राम रूप धारण कर जनकपुरी में शिव धनुष को तोड़कर सीता से विवाह किया था। पिता के आदेश से धनुष बाण धारण कर सीता और लक्ष्मण के साथ चित्रकूट और दण्डकारण्य में भ्रमण किया तथा वहाँ अत्याचारी दैत्यों का विनाश किया। फिर सीता के वियोग में वन–वन भटका। पुन: बन्दरों की सहायता से रावण सहित लंकापुरी का ध्वंसकर अयोध्या में लौटा। मैं इस समय गोपालन के द्वारा वंशी धारण कर गोचारण करते हुए वन–वन में भ्रमण करता हुआ प्रियतमा श्री राधिका के साथ तुम गोपियों से विनोद कर रहा हूँ। पहले मेरे राम रूप में धनुष–बाणों से त्रिलोकी काँप उठती थी। किन्तु, अब मेरे मधुर वेणुनाद से स्थावर–जग्ङम सभी प्राणी उन्मत्त हो रहे हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ललिता जी ने भी मुस्कराते हुए कहा–हम केवल कोरी बातों से ही विश्वास नहीं कर सकतीं। यदि श्री राम जैसा कुछ पराक्रम दिखा सको तो हम विश्वास कर सकती हैं। श्री रामचन्द्र जी सौ योजन समुद्र को भालू–कपियों के द्वारा बंधवा कर सारी सेना के साथ उस पार गये थे। आप इन बंदरों के द्वारा इस छोटे से सरोवर पर पुल बँधवा दें तो हम विश्वास कर सकती हैं। ललिता की बात सुनकर श्री कृष्ण ने वेणू–ध्वनि के द्वारा क्षण-मात्र में सभी बंदरों को एकत्र कर लिया तथा उन्हें प्रस्तर शिलाओं के द्वारा उस सरोवर के ऊपर सेतु बाँधने के लिए आदेश दिया। देखते ही देखते श्री कृष्ण के आदेश से हज़ारों बंदर बड़ी उत्सुकता के साथ दूर -दूर स्थानों से पत्थरों को लाकर सेतु निर्माण में लग गये। श्री कृष्ण ने अपने हाथों से उन बंदरों के द्वारा लाये हुए उन पत्थरों के द्वारा सेतु का निर्माण किया। सेतु के प्रारम्भ में सरोवर की उत्तर दिशा में श्री कृष्ण ने अपने रामेश्वर महादेव की स्थापना भी की। आज भी ये सभी लीलास्थान दर्शनीय हैं। इस कुण्ड का नामान्तर लंका कुण्ड भी है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;6. केदारनाथ महादेव- (बिलोंद)-&amp;nbsp;&lt;span&gt;कामा से 10 किलोमीटर आगे,&amp;nbsp; सफेद शिलाओं के पर्वत पर बना प्राकृतिक मन्दिर।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;7. पशुपति नाथ- (पसोपा गांव)-&amp;nbsp;&lt;span&gt;यह कामा से 10 किलोमीटर दक्षिण मे है। ब्रजवासियों को लाला ने रामेश्वर, केदारनाथ व पशुपति नाथ के दर्शन यही कराये थे तब से ये यही विराजमान है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;8. चक्रेश्वर महादेव- (गोवर्धन)- चकलेश्वर महादेव का मंदिर गोवर्धन के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। इस प्राचीन मंदिर की कला अद्भुत है। मानसी गंगा के किनारे स्थित इस मन्दिर में प्रथम गणेश पूजन तत्पश्चात् शिवलिंग की पूजा की जाती है। तीनों नेत्रों से लाला का दर्शन करके महादेवजी की प्यास नहीं मिटी तो ठाकुरजी ने चार मुख प्रदान किये।&amp;nbsp; महादेवजी यहाँ पर पंचमुखी है अत: पांच शिवलिंग है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;9. भूतेश्वर महादेव- (मथुरा)- भूतेश्वर महादेव मथुरा कृष्ण जन्मभूमि के दक्षिण में भूतेश्वर महादेव का मन्दिर है । इसमें ऐतिहासिक शिवलिंग एवं पाताल देवी के विग्रह हैं । भूतेश्वर महादेव का शिवलिंग नाग शासकों द्वारा स्थापित किया गया ।श्री भूतेश्वर जी मथुरा के रक्षक सुप्रसिद्ध चार महादेवों में पश्चिम दिशा के क्षेत्रपाल माने जाते हैं । संसार में व्यक्ति के मर जाने पर उसके कर्म का लेखाजोखा यमराज करते हैं, पर कहा जाता है की ब्रज में जो व्यक्ति मर जाता है उसका लेखाजोखा भूतेश्वर महादेव करते है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;10. रंगेश्वर महादेव- (मथुरा)-&amp;nbsp;&lt;span&gt;श्रीकृष्ण ने मथुरा के रक्षार्थ इनको स्थापित किया था।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उत्तर मे- गोकर्ण महादेव&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पूर्व मे- पीप्लेश्वर महादेव&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दक्षिण मे- रंगेश्वर महादेव&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पश्चिम मे- भूतेश्वर महादेव।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कथा -मथुरा के दक्षिण में श्री रंगेश्वर महादेव जी क्षेत्रपाल के रूप में अवस्थित हैं। भेज–कुलांगार महाराज कंस ने श्री कृष्ण और बलदेव को मारने का षड़यन्त्र कर इस तीर्थ स्थान पर एक रंगशाला का निर्माण करवाया। अक्रूर के द्वारा छलकर श्री नन्द गोकुल से श्री कृष्ण–बलदेव को लाया गया। श्रीकृष्ण और बलदेव नगर भ्रमण के बहाने ग्वालबालों के साथ लोगों से पूछते–पूछते इस रंगशाला में प्रविष्ट हुये। रंगशाला बहुत ही सुन्दर सजायी गई थी। सुन्दर-सुन्दर तोरण-द्वार पुष्पों से सुसज्जित थे। सामने शंकर का विशाल धनुष रखा गया था। मुख्य प्रवेश द्वार पर मतवाला कुबलयापीड हाथी झूमते हुए, बस इंगित पाने की प्रतीक्षा कर रहा था, जो दोनों भाईयों को मारने के लिए भली भाँति सिखाया गया था ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;धनुर्याग&lt;/div&gt;&lt;div&gt;रंगेश्वर महादेव की छटा भी निराली थी। उन्हें विभिन्न प्रकार से सुसज्जित किया गया था। रंगशाला के अखाड़े में चाणूर, मुष्टिक, शल, तोषल आदि बड़े-बड़े भयंकर पहलवान दंगल के लिए प्रस्तुत थे। महाराज कंस अपने बडे़-बड़े नागरिकों तथा मित्रों के साथ उच्च मञ्च पर विराजमान था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;रंगशाला में प्रवेश करते ही श्रीकृष्ण ने अनायास ही धनुष को अपने बायें हाथ से उठा लिया। पलक झपकते ही सबके सामने उसकी डोरी चढ़ा दी तथा डोरी को ऐसे खींचा कि वह धनुष भयंकर शब्द करते हुए टूट गया। धनुष की रक्षा करने वाले सारे सैनिकों को दोनों भाईयों ने ही मार गिराया। कुबलयापीड का वध कर श्रीकृष्ण ने उसके दोनों दाँतों को उखाड़ लिया और उससे महावत एवं अनेक दुष्टों का संहार किया। कुछ सैनिक भाग खड़े हुए और महाराज कंस को सारी सूचनाएँ दीं, तो कंस ने क्रोध से दाँत पीसते हुए चाणूर मुष्टिक को शीघ्र ही दोनों बालकों का वध करने के लिए इंगित किया। इतने में श्रीकृष्ण एवं बलदेव अपने अंगों पर ख़ून के कुछ छींटे धारण किये हुए हाथी के विशाल दातों को अपने कंधे पर धारण कर सिंहशावक की भाँति मुसकुराते हुए अखाड़े के समीप पहुँचे। चाणूर और मुष्टिक ने उन दोनों भाईयों को मल्लयुद्ध के लिए ललकारा। नीति विचारक श्रीकृष्ण ने अपने समान आयु वाले मल्लों से लड़ने की बात कही। किन्तु चाणूर ने श्रीकृष्ण को और मुष्टिक ने बलराम जी को बड़े दर्प से, महाराज कंस का मनोरंजन करने के लिए ललकारा। श्रीकृष्ण–बलराम तो ऐसा चाहते ही थे। इस प्रकार मल्लयुद्ध आरम्भ हो गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वहाँ पर बैठी हुई पुर–स्त्रियाँ उस अनीतिपूर्ण मल्ल्युद्ध को देखकर वहाँ से उठकर चलने को उद्यत हो गई। श्रीकृष्ण की रूपमाधुरी का दर्शनकर कहने लगीं– अहो! सच पूछो तो ब्रजभूमि ही परम पवित्र और धन्य है। वहाँ परम पुरुषोत्तम मनुष्य के वेश में छिपकर रहते हैं। देवादिदेव महादेव शंकर और लक्ष्मी जी जिनके चरणकमलों की पूजा करती हैं, वे ही प्रभु वहाँ रंग–बिरंगे पूष्पों की माला धारणकर गऊओं के पीछे–पीछे सखाओं और बलरामजी के साथ बाँसुरी–बजाते और नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ करते हुए आनन्द से विचरण करते हैं। श्रीकृष्ण की इस रूपमधुरिमा का आस्वादन केवल ब्रजवासियों एवं विशेषकर गोपियों के लिए ही सुलभ है। वहाँ के मयूर, शुक, सारी, गौएँ, बछड़े तथा नदियाँ सभी धन्य हैं। वे स्वच्छन्द रूप से श्रीकृष्ण की विविध प्रकार की माधुरियों का पान करके निहाल हो जाते हैं। अभी वे ऐसी चर्चा कर ही रही थीं कि श्रीकृष्ण ने चाणूर और बलरामजी ने मुष्टिक को पछाड़कर उनका वध कर दिया। तदनन्तर कूट, शल, तोषल आदि भी मारे गये। इतने में कंस ने क्रोधित होकर श्रीकृष्ण–बलदेव और नन्द–वसुदेव सबको बंदी बनाने के लिए आदेश दिया। किन्तु, सबके देखते ही देखते बड़े वेग से उछलकर श्रीकृष्ण उसके मञ्च पर पहुँच गये और उसकी चोटी पकड़कर नीचे गिरा दिया तथा उसकी छाती के ऊपर कूद गये, जिससे उसके प्राण पखेरू उड़ गये। इस प्रकार सहज ही कंस मारा गया। श्रीकृष्ण ने रंगशाला में अनुचरों के साथ कंस का उद्धार किया। कंस के पूजित शंकर जी इस रंग को देखकर कृत-कृत्य हो गये। इसलिए उनका नाम श्रीरंगेश्वर हुआ। यह स्थान आज भी कृष्ण की इस रंगमयी लीला की पताका फहरा रहा है। श्रीमद्भागवत के अनुसार तथा श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती पाद के विचार से कंस का वध शिवरात्रि के दिन हुआ था। क्योंकि कंस ने अक्रूर को एकादशी की रात अपने घर बुलाया तथा उससे मन्त्रणा की थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;द्वादशी को अक्रूर का नन्द भवन में पहुँचना हुआ, त्रयोदशी को नन्दगाँव से अक्रूर के रथ में श्रीकृष्ण बलराम मथुरा में आये, शाम को मथुरा नगर भ्रमण तथा धनुष यज्ञ हुआ था। दूसरे दिन अर्थात शिव चतुर्दशी के दिन कुवलयापीड़, चाणुरमुष्टिक एवं कंस का वध हुआ था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्रतिवर्ष यहाँ कार्तिक माह में देवोत्थान एकादशी से एक दिन पूर्व शुक्ला दशमी के दिन चौबे समाज की ओर से कंस-वध मेले का आयोजन किया जाता है। उस दिन कंस की 25–30 फुट ऊँची मूर्ति का श्रीकृष्ण के द्वारा वध प्रदर्शित होता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;11. चिंताहरण महादेव-&lt;span&gt;&amp;nbsp;मथुरा से 15 किलोमीटर दाऊजी के रास्ते में यहाँ लीला आसेश्वर महादेवजी की तरह है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने सात वर्ष की आयु में मिट्टी खाई थी तो मां यशोदा घबरा गईं और कृष्ण से मिट्टी को मुंह से निकालने को कहा। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपना मुंह खोला तो मां यशोदा को पूरे ब्रह्मांड के दर्शन हुए थे। इसके बाद माता यशोदा घबरा गईं और भगवान शिव को पुकारने लगीं। उनकी पुकार सुन भगवान शिव यहां प्रकट हो गए। उसके बाद यशोदा ने यमुना के जल से भगवान शिव का अभिषेक किया। माता यशोदा ने भगवान शिव से यहां विराजमान होकर सभी भक्तों की चिंताएं हरने का वचन मांगा। भगवान शिव ने माता यशोदा को ऐसा वचन दिया। इस बात का उल्लेख श्रीमद्भागवत पुराण के दसवें स्कन्द में भी है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक मान्यता यह भी है कि जब श्रीकृष्ण बाल रूप में थे, तब सभी देवता उनके बाल स्वरूप के दर्शन करने ब्रज में आए। भगवान शिव भी दर्शन करने आए, लेकिन माता यशोदा ने भगवान शिव के गले में सांप को देखकर उन्हें कृष्ण के दर्शन नहीं करने दिए। शिवजी को चिंता हुई। उन्होंने भगवान का ध्यान किया तो भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें इसी स्थान पर दर्शन देकर उनकी चिंता हर ली। बस तभी से भगवान भोलेनाथ यहीं विराजमान हो गए। इसका उल्लेख गर्ग संहिता और शिव महापुराण में भी मिलता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;12.&amp;nbsp; गोपेश्वर महादेव- (वृंदावन) -&lt;span&gt;कथा एक बार शरद पूर्णिमा की शरत-उज्ज्वल चाँदनी में वंशीवट यमुना के किनारे श्याम सुंदर साक्षात मन्मथनाथ की वंशी बज उठी। श्रीकृष्ण ने छ: मास की एक रात्रि करके मन्मथ का मानमर्दन करने के लिए महारास किया था। मनमोहन की मीठी मुरली ने कैलाश पर विराजमान भगवान श्री शंकर को मोह लिया, समाधि भंग हो गयी। बाबा वृंदावन की ओर बावरे होकर चल पड़े। पार्वती जी भी मनाकर हार गयीं, किंतु त्रिपुरारि माने नहीं। भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त श्री आसुरि मुनि, पार्वती जी, नन्दी, श्रीगणेश, श्रीकार्तिकेय के साथ भगवान शंकर वृंदावन के वंशीवट पर आ गये। वंशीवट जहाँ महारास हो रहा था, वहाँ गोलोकवासिनी गोपियाँ द्वार पर खड़ी हुई थीं। पार्वती जी तो महारास में अंदर प्रवेश कर गयीं, किंतु द्वारपालिकाओं ने श्रीमहादेवजी और श्रीआसुरि मुनि को अंदर जाने से रोक दिया, बोलीं, "श्रेष्ठ जनों" श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष इस एकांत महारास में प्रवेश नहीं कर सकता।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्री शिवजी बोले, "देवियों! हमें भी श्रीराधा-कृष्ण के दर्शनों की लालसा है, अत: आप ही लोग कोई उपाय बतलाइये, जिससे कि हम महाराज के दर्शन पा सकें?" ललिता नामक सखी बोली, यदि आप महारास देखना चाहते हैं तो गोपी बन जाइए। मानसरोवर में स्नान कर गोपी का रूप धारण करके महारास में प्रवेश हुआ जा सकता है। फिर क्या था, भगवान शिव अर्धनारीश्वर से पूरे नारी-रूप बन गये। श्रीयमुना जी ने षोडश श्रृंगार कर दिया, तो बाबा भोलेनाथ गोपी रूप हो गये। प्रसन्न मन से वे गोपी-वेष में महारास में प्रवेश कर गये।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्री शिवजी मोहिनी-वेष में मोहन की रासस्थली में गोपियों के मण्डल में मिलकर अतृप्त नेत्रों से विश्वमोहन की रूप-माधुरी का पान करने लगे। नटवर-वेषधारी, श्रीरासविहारी, रासेश्वरी, रसमयी श्रीराधाजी एवं गोपियों को नृत्य एवं रास करते हुए देख नटराज भोलेनाथ भी स्वयं ता-ता थैया कर नाच उठे। मोहन ने ऐसी मोहिनी वंशी बजायी कि सुधि-बुधि भूल गये भोलेनाथ। बनवारी से क्या कुछ छिपा है। मुस्कुरा उठे, पहचान लिया भोलेनाथ को। उन्होंने रासेश्वरी श्रीराधा व गोपियों को छोड़कर ब्रज-वनिताओं और लताओं के बीच में गोपी रूप धारी गौरीनाथ का हाथ पकड़ लिया और मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए बड़े ही आदर-सत्कार से बोले, "आइये स्वागत है, महाराज गोपेश्वर।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्रीराधा आदि श्रीगोपीश्वर महादेव के मोहिनी गोपी के रूप को देखकर आश्चर्य में पड़ गयीं। तब श्रीकृष्ण ने कहा, "राधे, यह कोई गोपी नहीं है, ये तो साक्षात् भगवान शंकर हैं। हमारे महारास के दर्शन के लिए इन्होंने गोपी का रूप धारण किया है। तब श्रीराधा-कृष्ण ने हँसते हुए शिव जी से पूछा, "भगवन! आपने यह गोपी वेष क्यों बनाया? भगवान शंकर बोले, "प्रभो! आपकी यह दिव्य रसमयी प्रेमलीला-महारास देखने के लिए गोपी-रूप धारण किया है। इस पर प्रसन्न होकर श्रीराधाजी ने श्रीमहादेव जी से वर माँगने को कहा तो श्रीशिव जी ने यह वर माँगा "हम चाहते हैं कि यहाँ आप दोनों के चरण-कमलों में सदा ही हमारा वास हो। आप दोनों के चरण-कमलों के बिना हम कहीं अन्यत्र वास करना नहीं चाहते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भगवान श्रीकृष्ण ने `तथास्तु' कहकर कालिन्दी के निकट निकुंज के पास, वंशीवट के सम्मुख भगवान महादेवजी को `श्रीगोपेश्वर महादेव' के नाम से स्थापित कर विराजमान कर दिया। श्रीराधा-कृष्ण और गोपी-गोपियों ने उनकी पूजा की और कहा कि ब्रज-वृंदावन की यात्रा तभी पूर्ण होगी, जब व्यक्ति आपके दर्शन कर लेगा। आपके दर्शन किये बिना यात्रा अधूरी रहेगी। भगवान शंकर वृंदावन में आज भी `गोपेश्वर महादेव' के रूप में विराजमान हैं और भक्तों को अपने दिव्य गोपी-वेष में दर्शन दे रहे हैं। गर्भगृह के बाहर पार्वतीजी, श्रीगणेश, श्रीनन्दी विराजमान हैं। आज भी संध्या के समय भगवान का गोपीवेश में दिव्य श्रृंगार होता है।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>कुसुम सरोवर</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/09/blog-post.html</link><pubDate>Thu, 3 Sep 2026 11:35:37 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-5571272355839407811</guid><description>&lt;div&gt;एक दिन श्री किशोरी जी सखियों के साथ कुसुम वन में फूल चयन कर रही थीं&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्री श्यामसुंदर ने माली के रूप में दूर से खड़े होकर आवाज़ लगाई, ”कौन तुम फुलवा बीनन हारी ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;साथ की सखियां भयभीत होकर इधर-उधर भाग खड़ी हुईं। श्री किशोरी जी का नीलाम्बर एक झाड़ी में उलझ गया, भाग न सकीं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस हड़बड़ाहट में एक-दो फूल भी उनके हाथ से गिर गए। इतने में माली का रूप छोड़ कर सामने श्री श्याम सुंदर आकर उपस्थित हुए।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उन्होंने नीलाम्बर को झाड़ी से छुड़ा दिया। श्री राधा के द्वारा पृथ्वी पर गिरे फूल श्री श्यामसुंदर ने उठा लिए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्री किशोरी जी ने कहा, ”प्रियतम ! पृथ्वी पर गिरे फूल पूजा के योग्य तो रहे नहीं अब क्या करोगे इनका ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्री श्यामसुंदर ने उन फूलों को सरोवर के जल से धो लिया और बोले प्राणवल्लभे ! अब ये फूल शुद्ध हो गए हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इतना कह कर श्री श्यामसुंदर ने वे कुसुम श्री किशोरी जी की बेनी में लगा दिए।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्री युगल किशोर के आनन्द की सीमा न रही। तभी से यह सरोवर ‘कुसुमसरोवर’ नाम से प्रसिद्ध हो गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जय हो मेरे प्राण आधार सर्वेश्वर श्यामाश्यामजु&amp;nbsp;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>कलयुग का दरोगा</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post_15.html</link><pubDate>Sat, 15 Aug 2026 15:20:30 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-5302738865494401971</guid><description>गांव के एक छोटे से किनारे पर, झोंपड़ी में रहने वाला बृजलाल नामक एक गरीब किसान रहता था। ज़मीन थोड़ी थी, शरीर थका हुआ, लेकिन मन में ईमानदारी और भगवान पर अटूट विश्वास था।&lt;div&gt;एक दिन सुबह के वक्त, जब वो अपने छोटे से खेत में गया, तो उसकी निगाह एक हरे-भरे पौधे पर पड़ी। हैरानी की बात ये थी कि उसने वहां कुछ बोया ही नहीं था, लेकिन लौकी का पौधा लहलहा रहा था। और उस पर तीन मोटी-ताज़ी लौकियाँ लगी थीं—साफ़, चमकती हुई, मानो खुद कुदरत ने उसे एक तोहफा भेजा हो।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसने खुशी-खुशी तीनों लौकियाँ तोड़ीं, घर लौटते हुए बच्चों से कहा, "अगर ये बिक गईं, तो मिठाई लाऊंगा।" घरवालों की आंखों में एक उम्मीद सी चमक उठी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;गाँव के हाट में पहुंचकर बृजलाल एक किनारे बैठ गया। भीड़-भाड़ से दूर, सिर पर पुरानी टोपली लगाए, आँखों में एक भोलापन लिए वो राहगीरों की तरफ उम्मीद से देखता रहा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तभी गाँव के प्रधान जी आये। भारी मूँछें, सीना फुलाया हुआ, और साथ में दो चमचों की टोली। उन्होंने एक लौकी उठाई और बोले, "बृजलाल, बाद में पैसे दे दूंगा।" किसान ने कुछ कहने की कोशिश की, पर शब्द गले में अटक गए। प्रधान चलते बने।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कुछ देर बाद थाने का मुंशी रामदयाल आया। बिना कुछ पूछे दूसरी लौकी उठाई और बोले, "कितनी बढ़िया माल है, भई वाह!" और मुस्कुराते हुए चल दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब बस एक लौकी बची थी। बृजलाल का मन घबरा रहा था। वह आसमान की तरफ देखकर बुदबुदाया, "हे भगवान, कम से कम ये बचा ले।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तभी सामने से दरोगा रघुनाथ सिंह आते दिखाई दिए—ऊँचा कद, मूंछें तनी हुईं, आँखों में तेज और चेहरे पर कठोर पर सच्ची इंसानियत का भाव।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उन्होंने रुककर पूछा, “किसके लिए बैठा है लौकी लेकर?”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बृजलाल हकलाते हुए बोला, “मालिक… दो तो ले गए… ये बची है, आप चाहें तो ले जाइए…”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दरोगा ने गौर से देखा। कुछ समझ में आया। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “बताओ, क्या हुआ?”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;किसान ने धीरे-धीरे पूरा हाल सुना दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दरोगा मुस्कुराए। बोले, “चलो, मेरे साथ।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पहले वो प्रधान जी के घर पहुंचे। वहां प्रधान जी चारपाई पर ताव देते बैठे थे और उनकी पत्नी लौकी काट रही थी। दरोगा ने पूछा, “ये लौकी कहाँ से लाई?”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्रधान बोले, “बाजार से खरीदी है।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“कितने में?” दरोगा ने फिर पूछा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब प्रधान जी की आवाज़ हल्की हो गई, आँखें बृजलाल पर टिक गईं। दरोगा ने तीखा स्वर अपनाया, “सीधा-सीधा बोलो। किसान को एक हज़ार रुपये दो नहीं तो चोरी और दबाव की FIR लिखूँगा।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बहुत कहासुनी के बाद, प्रधान ने बुझे मन से एक हज़ार रुपये थमा दिए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;फिर दरोगा किसान को लेकर थाने पहुंचे। वहां सब सिपाही कतार में खड़े किए गए। बृजलाल ने कांपते हुए एक हवलदार की तरफ इशारा किया। दरोगा गरजे, “वर्दी में हो और हरकत चोरों जैसी? शर्म नहीं आती?”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उन्होंने जेब से हज़ार रुपये निकलवाए और किसान को सौंप दिए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब बृजलाल और भी घबरा गया। सोच रहा था, कहीं दरोगा अब सब रुपये न छीन ले।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वो धीरे से जाने लगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तभी दरोगा ने आवाज़ लगाई, “अरे रुक, तीसरी लौकी का क्या?”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;फिर उन्होंने अपने पर्स से एक हज़ार का नोट निकाला और किसान के हाथ में रखा।बोले, “ये तीसरी लौकी का दाम है। अब जब भी किसी ने तुझे सताया,सीधे मेरे पास आना।बृजलाल की आंखें भर आईं। वह हाथ जोड़कर बोला, “मालिक,आज के दिन भगवान ने खुद दरोगा का रूप लिया है।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>सेवाराम और मोतीलाल </title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post_12.html</link><pubDate>Wed, 12 Aug 2026 17:43:59 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-7706652378649312163</guid><description>सेवाराम और मोतीलाल दो घनिष्ठ मित्र थे ।दोनों ही गली-गली जाकर पीठ पर पोटली लादकर कपड़े बेचने का काम करते थे ।सर्दियों के दिन थे वह गांव-गांव जाकर कपड़े बेच रहे थे तभी एक झोपड़ी के बाहर एक बुढ़िया जो कि ठंड से कांप रही थी तो सेवाराम ने अपनी पोटली से एक कंबल निकालकर उस माई को दिया और कहां माई तुम ठंड से कांप रही हो यह कंबल ओढ़ लो तो बूढ़ी माई कंबल लेकर बहुत खुश हुई और जल्दी जल्दी से उसने कंबल से अपने आप को ढक लिया और सेवाराम को खूब सारा आशीर्वाद दिया। तभी उसने सेवाराम को कहा मेरे पास पैसे तो नहीं है लेकिन रुको मैं तुम्हें कुछ देती हूं। वह अपनी झोपड़ी के अंदर गई तभी उसके हाथ में एक बहुत ही सुंदर छोटी सी ठाकुर जी की प्रतिमा थी ।वह सेवाराम को देते हुए बोली कि मेरे पास देने के लिए पैसे तो नहीं है लेकिन यह ठाकुर जी है इसको तुम अपनी दुकान पर लगा कर खूब सेवा करना देखना तुम्हारी कितनी तरक्की   होती है ।यह मेरा आशीर्वाद है तो तभी मोतीराम बुढ़िया के पास आकर बोला, अरे ओ माता जी क्यों बहाने बना रही हो अगर पैसे नहीं है तो कोई बात नहीं लेकिन हमें झूठी तसल्ली मत दो हमारे पास तो कोई दुकान नहीं है। हम इसको कहां लगाएंगे ।इनको तुम अपने पास ही रखो। लेकिन सेवाराम जो कि बहुत ही नेक दिल था और ठाकुर जी को मानने वाला था वह बोला नहीं-नहीं माताजी अगर आप इतने प्यार से कह रही हैं तो यह आप मुझे दे दो। पैसों की आप चिंता मत करो तो सेवाराम ने जल्दी से अपने गले में पढ़े हुए परने में ठाकुर जी को लपेट लिया और उनको लेकर चल पड़ा ।तो बुढ़िया दूर तक उनको आशीर्वाद दे रही थी। हरी तुम्हारा ध्यान रखेंगे ठाकुर जी तुम्हारा ध्यान रखेंगे। वह तब तक आशीर्वाद देती रही जब तक कि वह दोनों उनकी आंखों से ओझल ना हो गए ।और ठाकुर जी का ऐसा ही चमत्कार हुआ अब धीरे-धीरे दोनों की कमाई ज्यादा होने लगी अब उन्होंने एक साइकिल खरीद ली अब साइकिल पर ठाकुरजी को आगे टोकरी में रखकर और पीछे पोटली रखकर गांव गांव कपड़े बेचने लगे ।अब फिर उनको और ज्यादा कमाई होने लगी तो उन्होंने एक दुकान किराए पर ले ले और वहां पर ठाकुर जी को बहुत ही सुंदर आसन पर विराजमान करके दुकान का मुहूर्त किया। धीरे-धीरे दुकान इतनी चल पड़ी कि अब सेवाराम और मोती लाल के पास शहर में बहुत ही बड़ी बड़ी कपड़े की दुकाने  और कपड़े की मिल्लें हो गई।&amp;nbsp;&lt;div&gt;&amp;nbsp;1 दिन मोतीलाल सेवाराम को कहता कि देखो आज हमारे पास सब कुछ है यह हम दोनों की मेहनत का नतीजा है लेकिन सेवाराम बोला नहीं नहीं हम दोनों की मेहनत के साथ-साथ यह हमारे ठाकुर जी हमारे हरि की कृपा है। तो मोतीलाल बात को अनसुनी करके वापस अपने काम में लग गया। एक दिन सेवाराम की सेहत थोड़ी ढीली थी इसलिए वह दुकान पर थोड़ी देरी से आया तो मोतीलाल बोला अरे दोस्त आज तुम देरी से आए हो तुम्हारे बिना तो मेरा एक पल का गुजारा नहीं तुम मेरा साथ कभी ना छोड़ना तो सेवाराम हंसकर बोला अरे मोतीलाल चिंता क्यों करते हो मैं नहीं आऊंगा तो हमारे ठाकुर जी तो है ना ।यह कहकर सेवा  राम अपने काम में लग गया। पहले दोनों का घर दुकान के पास ही होता था लेकिन अब दोनों ने अपना घर दुकान से काफी दूर ले लिया। अब दोनों ही महल नुमा घर में रहने लगे। दोनों ने अपने बच्चों को खूब पढ़ाया लिखाया । सेवाराम के दो लड़के थे दोनों की शादी कर दी थी और मोती लाल के एक लड़का और एक लड़की थी मोतीलाल ने अभी एक लड़के की शादी की थी अभी उसने अपनी लड़की की शादी करनी थी। सेहत ढीली होने के कारण सेवाराम अब  दुकान पर थोड़े विलंब से आने लगा तो एक दिन वह मोतीलाल से बोला अब मेरी सेहत ठीक नहीं रहती क्या मैं थोड़ी विलम्ब से आ सकता हूं तो मोतीलाल ने कहा हां भैया तुम विलम्ब से आ जाओ लेकिन आया जरूर करो मेरा तुम्हारे बिना दिल नहीं लगता। फिर अचानक एक दिन सेवाराम 12:00 बजे के करीब दुकान पर आया लेकिन आज उसके चेहरे पर अजीब सी चमक थी चाल में एक अजीब सी मस्ती थी चेहरे पर अजीब सी मुस्कान थी वह आकर गद्दी पर बैठ गया तो मोतीलाल ने कहा भैया आज तो तुम्हारी सेहत ठीक लग रही है तो सेवाराम ने कहा भैया ठीक तो नहीं हूं लेकिन आज से मैं बस केवल 12:00 बजे आया करूंगा और 5:00 बजे चला जाया करूंगा। मैं तो केवल इतना ही दुकान पर बैठ सकता हूं ।तो मोतीलाल ने कहा कोई बात नहीं जैसी तुम्हारी इच्छा। अब तो सेवाराम रोज 12:00 बजे आता और 5:00 बजे चला जाता लेकिन उसकी शक्ल देखकर ऐसा नहीं लगता था कि वह कभी बीमार भी है। लेकिन मोतीलाल को अपने दोस्त पर पूरा विश्वास था कि वह झूठ नहीं बोल सकता और मेहनत  करने  से वह कभी पीछे नहीं हट सकता ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक दिन मोतीलाल की बेटी की शादी तय हुई तो वह शादी का निमंत्रण देने के लिए सेवाराम के घर गया ।घर जाकर उसको उसके बेटा बहू सेवाराम की पत्नी सब नजर आ रहे थे लेकिन सेवाराम नजर नहीं आ रहा था तो उसने सेवाराम की पत्नी से कहा भाभी जी सेवाराम कहीं नजर नहीं आ रहा तो उसकी पत्नी एकदम से हैरान होती हुई  बोली यह आप क्या कह रहे हैं? तभी वहां उसके बेटे भी आ गए और कहने लगी काका जी आप कैसी बातें कर रहे हो हमारे साथ कैसा मजाक कर रहे हो। तो  मोतीलाल बोला कि मैंने ऐसा क्या पूछ लिया मैं तो अपने प्रिय दोस्त के बारे में पूछ रहा हूं क्या उसकी तबीयत  आज भी  ठीक  नही है क्या वह अंदर आराम कर रहा है।मै खुद  अंदर जाकर उसको मिल आता हूं।तो मोतीलाल उसके कमरे में चला गया लेकिन सेवाराम उसको वहां  भी नजर नहीं आया। तभी अचानक उसकी नजर उसके कमरे में सेवाराम के तस्वीर पर पडी ।वह एकदम से हैरान होकर सेवा राम की पत्नी की तरफ देखता हुआ बोला ।अरे भाभी जी यह क्या आपने सेवाराम की तस्वीर पर हार क्यों  चढ़ाया हुआ है तो सेवा राम की पत्नी आंखों में आंसू भर कर बोली। मुझे आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी भैया कि आप ऐसा मजाक करेंगे। मोतीलाल को कुछ समझ नहीं आ रहा था तभी सेवाराम का बेटा बोला क्या आपको नहीं पता कि पिताजी को गुजरे तो 6 महीने हो चुके हैं ।मोतीलाल को तो ऐसा लगा कि जैसे उसके सिर पर बिजली  गिर  पड़ी हो ।वह एकदम से थोड़ा लड़खडाता हुआ पीछे की तरफ हटा और बोला ऐसा कैसे हो सकता है वह तो हर रोज दुकान पर आते हैं। बीमार होने के कारण थोड़ा विलंब से आता है वह 12:00 बजे आता है और 5:00 बजे चला जाता है। तो उसकी पत्नी बोली ऐसा कैसे हो सकता है कि आपको पता ना हो आप ही तो हर महीने उनके हिस्से का मुनाफे के पैसे हमारे घर देने आते हो 6 महीनों से तो आप हमें दुगना मुनाफा दे कर जा रहे हो। मोतीलाल का तो अब सर चकरा गया उसने कहा मैं तो कभी आया ही नहीं। 6 महीने हो गए यह क्या मामला है तभी उसको सेवाराम की कही बात आई मैं नहीं रहूंगा तो मेरे हरी है ना मेरे ठाकुर जी है ना वह आएंगे ।तो  मोतीलाल को जब यह बातें याद आई तो वह जोर जोर से रोने लगा और कहने लगा हे ठाकुर जी, हे हरि आप अपने भक्तों के शब्दों का कितना मान रखते हो जोकि अपने विश्राम के समय मंदिर के पट 12:00 बजे बंद होते हैं और 5:00 बजे खुलते हैं और आप अपने भक्तों के शब्दों का मान रखने के लिए कि मेरे हरी आएंगे मेरे ठाकुर जी आएंगे तो आप अपने आराम के समय मेरी दुकान पर आकर अपने भक्तों का काम करते थे । इतना कहकर वह फूट-फूट कर रोने लगा और कहने लगा ठाकुर जी आप की लीला अपरंपार है मैं ही सारी जिंदगी नोट गिनने में लगा रहा असली भक्त तो सेवाराम था  जो आपका प्रिय था और  आपने उसको अपने पास बुला लिया और उसके शब्दों का मान रखने के लिए आप उसका काम खुद स्वयं कर रहे थे। और उसके हिस्से का मुनाफा भी उसके घर मेरे रूप में पहुँचा रहे थे। इतना कहकर वह भागा भागा दुकान की तरफ गया और वहां जाकर जहां पर ठाकुर जी जिस गद्दी पर आकर बैठते थे जहां पर अपने चरण रखते थे वहां पर जाकर गद्दी को अपने आंखों से  मुंह से चुमता हुआ चरणों में लौटता हुआ जार जार रोने लगा। और ठाकुर जी की जय जयकार करने लगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;ठाकुर जी तो हमारे ऐसे हैं ।  सेवाराम को उन पर विश्वास था कि मैं ना रहूंगा मेरे ठाकुर जी  मेरा सारा काम संभालेंगे ।विश्वास के तो बेड़ा पार है इसलिए हमें हर काम उस पर विश्वास रख कर अपनी डोरी उस पर छोड़ देनी चाहिए। जिनको उन पर पूर्ण विश्वास है वह उनकी  डोरी कभी भी नहीं अपने हाथ से छूटने देंते।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जय  हो ठाकुर जी  आपकी ।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>शोरगुल किसलिये </title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post_11.html</link><pubDate>Tue, 11 Aug 2026 15:46:37 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-6780944963232054998</guid><description>&lt;div&gt;मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ गयी। हाथी को पता न चला मक्खी कब बैठी। मक्खी भिनभिनाई की आवाज मे कहा, ‘भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना, वजन ज्यादा लगे तो खबर कर देना, मैं हट जाऊंगी।’ लेकिन हाथी को कुछ सुनाई न पड़ा।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;फिर हाथी एक पुल पर से गुजरने लगा, बड़ी पहाड़ी नदी थी, भयंकर गङ्ढ था, मक्खी ने कहा कि ‘देखलो, दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए! अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना। मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी।’ हाथी के कान में थोड़ी-सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी, पर उसने कुछ ध्यान न दिया। फिर मक्खी के विदा होने का वक्त आ गया। उसने कहा, ‘यात्रा बड़ी सुखद हुई, साथी-संगी रहे, मित्रता बनी, अब मैं जाती हूं, कोई काम हो, तो मुझे कहना.. तब मक्खी की आवाज थोड़ी हाथी को सुनाई पड़ी, उसने कहा, ‘तू कौन है कुछ पता नहीं, कब तू आयी, कब तू मेरे शरीर पर बैठी, कब तू उड़ गयी, इसका मुझे कोई पता नहीं है। लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी...&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सन्त कहते हैं, ‘हमारा होना भी ऐसा ही है। इस बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। हाथी और मक्खी के अनुपात से भी कहीं छोटा, हमारा और ब्रह्मांड का अनुपात है। हमारे ना रहने से क्या फर्क पड़ता है? लेकिन हम बड़ा शोरगुल मचाते हैं। वह शोरगुल किसलिये है? वह मक्खी क्या चाहती थी? वह चाहती थी कि हाथी स्वीकार करे, मैं भी हूँ.. मेरा भी अस्तित्व है, वह कहना चाहती थी।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हमारा अहंकार अकेले नहीं जी सकता, दूसरे उसे मानें तो ही जी सकता है। इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें, हमारी तरफ देखें और हमारी उपेक्षा न हो।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सन्त विचार- हम वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों को दिखाने के लिये... स्नान करते हैं सजाते-संवारते हैं ताकि दूसरे हमें सुंदर समझें, धन इकट्ठा करते, मकान बनाते, तो दूसरों को दिखाने के लिये.. दूसरे देखें और स्वीकार करें कि हम कुछ विशिष्ट हैं, ना कि साधारण। हम मिट्टी से ही बने हैं और फिर मिट्टी में मिल जाएंगे। हम अज्ञान के कारण खुद को खास दिखाना चाहते हैं वरना तो हम बस एक मिट्टी के पुतले हैं और कुछ नहीं। अहंकार सदा इस तलाश में रहता है कि वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दें।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;शिक्षा - याद रखना चाहिए आत्मा के निकलते ही यह मिट्टी का पुतला फिर मिट्टी बन जाएगा इसलिए हमे झूठा अहंकार त्याग कर,जब तक जीवन है सदभावना पूर्वक जीना चाहिए और सब का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि जीवों में परमात्मा का अंश आत्मा&amp;nbsp; हैं।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>श्री कृष्ण ने स्त्री रूप लीला </title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post_670.html</link><pubDate>Sun, 9 Aug 2026 14:53:48 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-3365873344840369702</guid><description>मीरा का मान रखने के लिये स्वयं श्री कृष्ण ने स्त्री रूप धारण किया !!&lt;div&gt;राणा सांगा के पुत्र और अपने पति राजा भोजराज की मृत्यु के बाद जब संबन्धीयो के मीरा बाई पर अत्याचार अपने चरम पर जा पहुँचे तो मीरा बाई मेवाड़ को छोड़कर तीर्थ को निकल गई। घूमते-घूमते वे वृन्दावन धाम जा पहुँची।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जीव गोसांई वृंदावन में वैष्णव-संप्रदाय के मुखिया थे। मीरा जीव गोसांई के दर्शन करना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने मीरा बाई से मिलने से मना कर दिया। उन्होंने मीरा को संदेशा भिजवाया कि वह किसी औरत को अपने सामने आने की इजाजत नहीं देंगे। मीराबाई ने इसके जवाब में अपना संदेश भिजवाया कि "वृंदावन में हर कोई औरत है। अगर यहां कोई पुरुष है तो केवल गिरिधर गोपाल। आज मुझे पता चला कि वृंदावन में कृष्ण के अलावा यहां कोई और भी पुरुष है।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जीव गुसाईं ने सुबह जब भगवान कृष्ण के मंदिर के पट खोले तो हैरत से उनकी आँखें फटी रह गई ! सामने विराजमान भगवान कृष्ण की मूर्ति घाघरा चोली पहने हुये थी, कानों में कुंडल, नाक में नथनी, पैरों में पाजेब, हाथों में चूड़ियाँ मतलब वे औरत के संपूर्ण स्वरूप को धारण किये हुये थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जीव गुसाईं ने मंदिर सेवक को आवाज लगाई, किसने किया ये सब ??&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कृष्ण की सौगंध पुजारी जी मंदिर में आपके जाने के बाद किसी का प्रवेश नही हुआ ये पट आपने ही बंद किये और आपने ही खोले।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जीव गुसाईं अचंभित थे, सेवक बोला कुछ कहूँ पुजारी जी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वे खोए-खोए से बोले, हाँ बोलो..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पास ही धर्मशाला में एक महिला आई हुई हैं जिसने कल आपसे मिलने की इच्छा जताई थी, आप तो किसी महिला से मिलते नहीं इसलिये आपने उनसे मिलने से मना कर दिया, परन्तु लोग कहते हैं कि वो कोई साधारण महिला नही उनके एकतारे में बड़ा जादू हैं कहते हैं वो जब भजन गाती हैं तो हर कोई अपनी सुधबुध बिसरा जाता हैं, कृष्ण भक्ति में लीन जब वो नाचती हैं तो स्वयं कृष्ण का स्वरूप जान पड़ती हैं। आपने उनसे मिलने से इंकार किया कही ऐसा तो नही भगवान जी आपको कोई संदेश देना चाहते हो ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जीव गुसाईं तुरंत समझ गए कि उनसे बहुत बड़ी भूल हो गई हैं, मीरा बाई कोई साधारण महिला नही अपितु कोई परम कृष्णभक्त हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वे सेवक से बोले भक्त मुझे तुरंत उनसे मिलना हैं चलो कहाँ ठहरी हैं वो मैं स्वयं उनके पास जाऊँगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जीव गुसाईं मीरा जी के सामने नतमस्तक हो गये और भरे कंठ से बोले मुझ अज्ञानी को आज आपने भक्ति का सही स्वरूप दिखाया हैं देवी इसके लिये मैं सदैव आपका आभारी रहूंगा।आईए चलकर स्वयं अपनी भक्ति की शक्ति देखिये।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मीरा बाई केवल मुस्कुराई वे कृष्ण कृष्ण करती उनके पीछे हो चली। मंदिर पहुँचकर जीव गौसाई एक बार फिर अचंभित हुये कृष्ण भगवान वापस अपने स्वरूप में लौट आये थे, पर एक अचम्भा और भी था उन्हें कभी कृष्ण की मूर्ति में मीरा बाई दिखाई पड़ती तो कभी मीराबाई में कृष्ण।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>सिमटता अंतिम संस्कार</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post_09.html</link><pubDate>Sun, 9 Aug 2026 11:23:31 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-7078605069095411840</guid><description>रिश्तों की राख और वीडियो कॉल पर सिमटता अंतिम संस्कार: आधुनिक समाज की ढहती मानवीय संवेदनाएँ&lt;div&gt;मुम्बई के कभी जाने-माने कपड़ा व्यापारी रहे 74 वर्षीय शिवचरण राम रतन गुप्ता जब जीवन के ढलान पर पहुँचे, तो उन्हें शायद इस बात का गुमान भी नहीं रहा होगा कि जिन तीन बेटियों को उन्होंने उँगली पकड़कर चलना सिखाया, पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाया और धूमधाम से विदा किया, वही बेटियाँ जीवन के अंतिम पड़ाव पर उनके लिए पराए से भी बदतर साबित होंगी। व्यापार में घाटा होने और परिस्थितियाँ विपरीत होने पर शिवचरण जी सोनीपत के वृद्धाश्रम में शरण लेने को मजबूर हुए। अपनी बीमार और मानसिक अवसाद से जूझ रही पत्नी को भी उन्होंने वृद्धाश्रम में ही बुलवाया। दुखद बात यह रही कि कुछ माह बाद जब उनकी पत्नी ने दम तोड़ा, तो तीनों बेटियों में से कोई भी उनके अंतिम दर्शन के लिए नहीं पहुँची। अपनी जन्मदात्री माँ का अंतिम संस्कार बेटियों ने मोबाइल की स्क्रीन पर वीडियो कॉल के जरिए देखा। माँ के जाने के बाद शिवचरण जी अकेले पड़ गए और सोनीपत के ही एक अन्य नि:शुल्क वृद्धाश्रम 'समाज कल्याण शिक्षा समिति' में चले गए, जहाँ वे गुमनामी और अकेलेपन में अपने दिन काटने लगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;4 अगस्त की अलसुबह जब शिवचरण जी का निधन हुआ, तो वृद्धाश्रम संचालक ने तुरंत उनकी बेटियों को सूचित किया। परंतु संवेदनाओं का दिवालियापन तो देखिए, बड़ी बेटी ने आने से स्पष्ट इनकार कर दिया और अंतिम संस्कार के खर्च के रूप में वृद्धाश्रम के नंबर पर ₹5100 ऑनलाइन ट्रांसफर कर दिए। बेटी का कहना था कि दूरी बहुत ज्यादा है, इसलिए वे नहीं आ सकतीं और पिता का दाह संस्कार करके चिता की वीडियो कॉल से तस्वीर दिखा दी जाए। लावारिसों की तरह समाजसेवियों और स्थानीय श्मशान सेवा समिति के सहयोग से उनका अंतिम संस्कार किया गया और वह ₹5,100 की राशि भी वापस लौटा दी गई। हद तो तब हो गई जब 48 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पिता की अस्थियाँ श्मशान घाट में लावारिस पड़ी रहीं। जब बेटियों से अस्थियाँ ले जाकर गंगा में प्रवाहित करने का अनुरोध किया गया, तो जवाब मिला कि "जब पिताजी ही नहीं रहे, तो अस्थियों का क्या करेंगे, आप ही विसर्जित कर देना।" जिस पिता ने अपना पूरा जीवन बच्चों के भविष्य को सींचने में लगा दिया, उसकी अस्थियों को दो गज पवित्र जल भी अपने औलाद के हाथों नसीब नहीं हुआ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;शिवचरण राम रतन गुप्ता की यह गाथा केवल एक व्यक्ति या परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे भारतीय समाज के नैतिक और सामाजिक पतन का एक भयावह आईना है। आज देश के कोने-कोने में स्थित वृद्धाश्रम ऐसे ही बदनसीब माँ-बाप की चीखों और सिसकियों से भरे पड़े हैं। कहीं प्रोफेसर भाई और शिक्षित भतीजों ने छल से जायदाद अपने नाम करवाकर बुजुर्ग को बेघर कर दिया, तो कहीं 18 किल्ले जमीन के मालिक माँ-बाप को औलाद ने चार दिन तक भूखा रखकर मारपीट कर घर से खदेड़ दिया। विडंबना यह है कि समाज में जैसे-जैसे शिक्षा, संपन्नता और आधुनिकता बढ़ रही है, वैसे-वैसे पारिवारिक मूल्यों और मानवीय मर्यादाओं का क्षरण हो रहा है। उच्च पदों पर बैठे, विदेशों में बसे या अत्यधिक पढ़े-लिखे बच्चे अक्सर आर्थिक दौड़ और पारिवारिक गृह-क्लेश का बहाना बनाकर अपने बूढ़े माँ-बाप को बोझ समझने लगते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अत्यधिक भौतिकवादी होते इस दौर में 'मर्यादा' और 'मानवता' पूरी तरह तार-तार हो चुकी है। जिस देश में श्रवण कुमार की गाथाएँ गाई जाती थीं, जहाँ माता-पिता को ईश्वर से भी ऊँचा दर्जा दिया जाता था, वहाँ आज औलाद अपने ही जन्मदाताओं की मृत्यु को महज़ एक नोटिफिकेशन और वीडियो कॉल तक सीमित कर चुकी है। आर्थिक तंगी, आपसी अनबन या व्यस्तता चाहे जो भी कारण हों, लेकिन किसी भी तर्क से उस औलाद के अपराध को क्षम्य नहीं ठहराया जा सकता जो जीवित रहते माँ-बाप को दाने-दाने के लिए तरसाए और मरने के बाद उनकी अस्थियों तक का दुलार न दे सके। यदि आज भी समाज ने इस गंभीर पतन पर आत्मचिंतन नहीं किया और अपनी नई पीढ़ी को मानवीय संवेदनाओं के संस्कार नहीं दिए, तो याद रहे कि समय का चक्र निर्दयी है और जो बीज आज बोए जा रहे हैं, कल उसकी फसल इन्हीं औलादों को भी काटनी पड़ेगी।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title> राज्य के मंत्री</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post_07.html</link><pubDate>Fri, 7 Aug 2026 15:04:59 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-6295623414703466991</guid><description>&lt;div&gt;पुराने जमाने की बात है। एक राजा ने दूसरे राजा के पास एक पत्र और सुरमे की एक छोटी सी डिबिया भेजी।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पत्र में लिखा था कि जो सुरमा भिजवा रहा हूं, वह अत्यंत मूल्यवान है। इसे लगाने से अंधापन दूर हो जाता है। राजा सोच में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे किस-किस को दे।उसके राज्य में नेत्रहीनों की संख्या अच्छी-खासी थी, पर सुरमे की मात्रा बस इतनी&amp;nbsp; थी जिससे दो आंखों की रोशनी लौट सके।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;राजा इसे अपने किसी अत्यंत प्रिय व्यक्ति को देना चाहता था। तभी राजा को अचानक अपने एक वृद्ध मंत्री की स्मृति हो आई। वह मंत्री बहुत ही बुद्धिमान था, मगर आंखों की रोशनी चले जाने के कारण उसने राजकीय कामकाज से छुट्टी ले ली थी और घर पर ही रहता था।राजा ने सोचा कि अगर उसकी आंखों की ज्योति वापस आ गई तो उसे उस योग्य मंत्री की सेवाएं फिर से मिलने लगेंगी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;राजा ने मंत्री को बुलवा भेजा और उसे सुरमे की डिबिया देते हुए कहा, ‘इस सुरमे को आंखों में डालें। आप पुन: देखने लग जाएंगे। ध्यान रहे यह केवल 2 आंखों के लिए है।’ मंत्री ने एक आंख में सुरमा डाला। उसकी रोशनी आ गई। उस आंख से मंत्री को सब कुछ दिखने लगा।&amp;nbsp; फिर उसने बचा- खुचा सुरमा अपनी जीभ पर डाल लिया।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यह देखकर राजा चकित रह गया। उसने पूछा, ‘यह आपने क्या किया?&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब तो आपकी एक ही आंख में रोशनी आ पाएगी। लोग आपको काना कहेंगे।’ मंत्री ने जवाब दिया, ‘राजन, चिंता न करें।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैं काना नहीं रहूंगा। मैं आंख वाला बनकर हजारों नेत्रहीनों को रोशनी दूंगा।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैंने चखकर यह जान लिया है कि सुरमा किस चीज से बना है।&amp;nbsp; मैं अब स्वयं सुरमा बनाकर नेत्रहीनों को बांटूंगा।’&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;राजा ने मंत्री को गले लगा लिया और कहा, ‘यह हमारा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसा मंत्री मिला। अगर हर राज्य के मंत्री आप जैसे हो जाएं तो किसी को कोई दुख नहीं होगा।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>एक बार भगवान शिवजी ने शनिदेव जी को पीपल के पेड़ से 19 वर्षों तक लटकाकर रखा था।</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/19.html</link><pubDate>Thu, 6 Aug 2026 18:24:50 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-169784130127944169</guid><description>&lt;div&gt;उन्होंने ऐसा क्यों किया था, शनिदेव जी को ऐसी सजा क्यों दी थी, चलिए जानते हैं.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पौराणिक प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार सूर्यदेव जी ने अपने सभी पुत्रों को उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें अलग-अलग लोक बाँट दिए लेकिन शनिदेव जी अपनी शक्ति के अहंकार में चूर इस बात से खुश नहीं थे। इसलिए, उन्होंने अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए बाकी लोकों पर भी अधिकार जमा लिया।शनिदेव जी की इस हरकत से सूर्यदेव जी बहुत दुःखी थे और वो मदद माँगने भगवान् शिवजी के पास पहुंचे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भगवान् शिवजी ने सूर्यदेव जी की आराधना पर अपने गणों को शनिदेव जी से युद्ध करने के लिए भेजा, लेकिन शनिदेव जी ने सभी को परास्त कर दिया। इसके बाद भगवान शंकरजी स्वयं शनिदेव जी से युद्ध करने आये। शनिदेव जी ने भगवान शंकर पर मारक दृष्टि डाली, तो भगवन शंकरजी ने अपना तीसरा नेत्र खोलकर शनिदेव जी के अहंकार को तोड़ दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;शनिदेव जी को सबक सिखाने के लिए भगवान् शिवजी ने उन्हें 19 वर्षों तक पीपल के पेड़ से उल्टा लटका दिया। इन्ही 19 वर्षों के दौरान शनिदेव जी भगवान शंकरजी की उपासना करते रहे। यही वजह है कि शनि महादशा 19 वर्षों की होती है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पुत्र की यह दशा सूर्यदेव जी से देखी नहीं गयी। उन्होंने भगवान् शिवजी से अपने पुत्र की ग़लती की माफी माँगी और भगवान शिवजी से शनिदेव जी के लिए जीवनदान भी माँगा। इसके बाद भगवान शिवजी ने शनिदेव जी को मुक्त कर दिया और भगवान शिवजी ने शनिदेव जी को उनकी शक्तियों का प्रयोग न्यायसंगत तरीके से करने का आशीर्वाद दिया है। उसके बाद से शनिदेव जी उनके मार्गदर्शन के अधीन रहते हैं। भगवन शिवजी ने शनिदेव जी को अपना शिष्य बनाकर उन्हें दंडाधिकारी नियुक्त कर दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शनिदोष से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिवजी की पूजा की जाती है क्योंकि शनिदेव जी न केवल भगवान् शिव के प्रति बहुत आदर रखते हैं, हमेशा उनकी भक्ति में डूबे रहते हैं बल्कि उनसे डरते भी हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऐसा माना जाता है कि भगवान शिवजी की पूजा से शनिदेव जी का क्रोध शांत होता है और व्यक्ति को शनिदोष से राहत मिलती है।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title> जब श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र ने काशी को घेर लिया था</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post_105.html</link><pubDate>Thu, 6 Aug 2026 18:22:10 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-7421679409770754680</guid><description>&lt;br&gt;&lt;div&gt;एक ऐसी पौराणिक कथा, जिसमें शिव की नगरी और कृष्ण के सुदर्शन का अद्भुत सामना हुआ&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“जिस काशी को स्वयं महादेव अपनी प्रिय नगरी मानते हैं, उसी काशी पर एक दिन श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र अग्नि बनकर टूट पड़ा था… आखिर क्यों?”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कहते हैं, देवताओं की लीलाएँ मनुष्य की बुद्धि से परे होती हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जहाँ एक ओर काशी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है, वहीं दूसरी ओर श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र की महिमा ऐसी है कि उसके सामने अधर्म की कोई शक्ति टिक नहीं सकती।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन क्या कभी ऐसा हुआ कि भगवान कृष्ण का सुदर्शन चक्र स्वयं काशी की ओर दौड़ा हो?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पौराणिक कथाओं में वर्णित एक अद्भुत प्रसंग इसी रहस्य को सामने लाता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कंस की मृत्यु और जरासंध के हृदय में धधकती प्रतिशोध की अग्नि&lt;/div&gt;&lt;div&gt;द्वापर युग में मथुरा पर अत्याचारी राजा कंस का शासन था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध करके मथुरा की प्रजा को उसके अत्याचार से मुक्त किया, तब कंस के ससुर और मगध के शक्तिशाली राजा जरासंध के हृदय में प्रतिशोध की अग्नि भड़क उठी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कंस की मृत्यु उसके लिए केवल एक राजा की मृत्यु नहीं थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह इसे अपने परिवार के अपमान के रूप में देखता था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जरासंध ने संकल्प लिया—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“जब तक कृष्ण जीवित हैं, मेरा प्रतिशोध पूरा नहीं होगा।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसके बाद उसने बार-बार मथुरा पर आक्रमण किया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन हर बार श्रीकृष्ण की दिव्य रणनीति और पराक्रम के सामने उसकी विशाल सेना टिक नहीं पाती थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जरासंध के भीतर क्रोध बढ़ता गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;और इसी प्रतिशोध की अग्नि में कई राजा भी उसके साथ आ खड़े हुए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;काशीराज के वध ने जन्म दिया एक और प्रतिशोध को&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कथानुसार, एक युद्ध में काशीराज भी श्रीकृष्ण के हाथों मारे गए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र ने काशी का राजसिंहासन संभाला।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन पिता की मृत्यु का दुःख धीरे-धीरे उसके भीतर प्रतिशोध की ज्वाला बन गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसने निश्चय कर लिया—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“मैं कृष्ण से अपने पिता की मृत्यु का बदला लेकर रहूँगा।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन श्रीकृष्ण को युद्ध में पराजित करना कोई साधारण बात नहीं थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसलिए काशीराज ने वह मार्ग चुना, जिस पर बड़े-बड़े योद्धा भी जाने से डरते थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसने भगवान शिव की कठोर तपस्या आरंभ कर दी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;काशी की धरती पर गूँजने लगी तपस्या&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दिन बीतते गए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऋतुएँ बदलती रहीं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन काशीराज अपनी तपस्या से विचलित नहीं हुआ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अंततः उसकी कठोर साधना से भगवान शिव प्रसन्न हुए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;महादेव उसके सामने प्रकट हुए और बोले—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“वर माँगो।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;काशीराज ने बिना किसी संकोच के कहा—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“प्रभु! मुझे ऐसी शक्ति चाहिए जिससे मैं श्रीकृष्ण का अंत कर सकूँ।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;महादेव ने उसे समझाने का प्रयास किया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन प्रतिशोध में अंधा हो चुका मन कहाँ मानता है?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तब शिवजी ने एक भयंकर शक्ति को प्रकट किया—कृत्या।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह अग्नि के समान भयंकर थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसके प्रकट होते ही वातावरण भयावह हो उठा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसे निर्देश दिया गया कि वह जिस दिशा में भेजी जाए, वहाँ जाकर शत्रु का विनाश करे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;काशीराज को लगा कि अब श्रीकृष्ण का अंत निश्चित है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;कृत्या पहुँची द्वारका!&lt;/div&gt;&lt;div&gt;काशीराज ने कृत्या को श्रीकृष्ण की ओर भेज दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह भयंकर शक्ति आकाश को चीरती हुई द्वारका की ओर बढ़ी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसके मार्ग में भय का वातावरण फैल गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन द्वारका पहुँचकर एक अद्भुत घटना हुई।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जिस भगवान को वह नष्ट करने आई थी, उनके सामने पहुँचते ही उसकी सारी शक्ति निष्फल होने लगी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्यों?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्योंकि जिसके विरुद्ध वह भेजी गई थी, वह कोई साधारण मनुष्य नहीं था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह स्वयं श्रीकृष्ण थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्रीकृष्ण ने परिस्थिति को देखा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उनके मुख पर हल्की मुस्कान आई।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;और फिर उन्होंने अपने दिव्य अस्त्र का स्मरण किया—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“सुदर्शन!”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्षणभर में आकाश दिव्य प्रकाश से भर उठा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भगवान का सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह केवल एक अस्त्र नहीं था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश का प्रतीक था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सुदर्शन चक्र बिजली की गति से कृत्या की ओर बढ़ा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कृत्या भयभीत होकर वहाँ से भागी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन अब उसके पीछे सुदर्शन था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कृत्या भागी… और सुदर्शन उसके पीछे!&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कृत्या जिस दिशा में भागती, सुदर्शन उसका पीछा करता।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अंततः वह वापस काशी की ओर लौट आई।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसे लगा कि अपनी नगरी में पहुँचकर शायद वह बच जाएगी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन सुदर्शन चक्र भी उसके पीछे-पीछे काशी पहुँच चुका था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;फिर जो हुआ, उसने काशी की धरती को अग्नि से भर दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सुदर्शन चक्र ने कृत्या का विनाश कर दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन उसका वेग और दिव्य अग्नि वहीं नहीं रुकी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पौराणिक कथा के अनुसार, सुदर्शन चक्र ने काशी को भी अपनी अग्नि से घेर लिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;राजमहल, सेना और नगर का वैभव—सब उस प्रचंड अग्नि की चपेट में आ गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;काशी का राजा भी अपने कर्मों के परिणाम से बच नहीं सका।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन यह कथा केवल विनाश की नहीं है…&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यहीं इस कथा का सबसे गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;काशी केवल एक नगर नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हिंदू आध्यात्मिक परंपरा में काशी को ज्ञान, मोक्ष और भगवान शिव की कृपा की भूमि माना जाता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसलिए इस कथा को केवल “एक नगर के जलने” के रूप में देखना इसके आध्यात्मिक भाव को छोटा कर देना होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यह कथा हमें बताती है—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जब मन में प्रतिशोध की अग्नि जलती है, तो सबसे पहले वह स्वयं मनुष्य को जलाती है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;काशीराज श्रीकृष्ण से बदला लेना चाहता था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन जिस शक्ति को उसने अपने शत्रु के विनाश के लिए बुलाया, वही शक्ति अंततः उसके अपने नगर के विनाश का कारण बन गई।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यही कर्म का रहस्य है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हम जिस ऊर्जा को संसार में भेजते हैं, कई बार वही घूमकर हमारे जीवन के द्वार पर वापस आ खड़ी होती है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वाराणसी नाम की एक प्रसिद्ध मान्यता&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कालांतर में काशी पुनः विकसित हुई और आज यह संसारभर में वाराणसी के नाम से प्रसिद्ध है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक प्रसिद्ध व्युत्पत्ति के अनुसार, यह नगर वरुणा और असि नदियों के बीच स्थित होने के कारण “वाराणसी” कहलाया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;युग बदलते रहे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;राजा बदलते रहे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;साम्राज्य उठे और मिट गए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन काशी की आध्यात्मिक चेतना आज भी जीवित है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;गंगा आज भी बह रही है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मंदिरों में आज भी घंटियाँ बजती हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;और भक्त आज भी पुकारते हैं—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“हर हर महादेव!”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;कथा का सबसे गहरा संदेश&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्रीकृष्ण का सुदर्शन केवल शत्रुओं का संहार करने वाला अस्त्र नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सुदर्शन का अर्थ ही है—“सुंदर दर्शन” या “शुद्ध दृष्टि”।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जब दृष्टि शुद्ध होती है, तो मनुष्य सत्य को देख पाता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;और जब दृष्टि प्रतिशोध, अहंकार और द्वेष से ढक जाती है, तब मनुष्य अपनी ही शक्ति को अपने विनाश का कारण बना सकता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;काशीराज के पास तपस्या थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;शक्ति थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;राज्य था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन उसके भीतर प्रतिशोध था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;और यही प्रतिशोध उसके पतन का कारण बना।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसलिए जीवन में सबसे बड़ी विजय किसी दूसरे को हराने में नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सबसे बड़ी विजय है—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अपने भीतर के क्रोध, अहंकार और प्रतिशोध को जीत लेना।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्योंकि जिसने अपने मन को जीत लिया, उसने सबसे बड़ा युद्ध जीत लिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;और जिसने अपने मन को हारने दिया, उसके हाथ में शक्ति होते हुए भी वह स्वयं अपने विनाश का मार्ग बना सकता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;अंतिम भाव&lt;/div&gt;&lt;div&gt;काशी महादेव की नगरी है,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कृष्ण धर्म के रक्षक हैं,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;और सुदर्शन सत्य की तीक्ष्ण दृष्टि का प्रतीक।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>अहंकार और साधना</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post_06.html</link><pubDate>Thu, 6 Aug 2026 10:37:28 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-444168465258778535</guid><description>&lt;div&gt;संत कबीर गांव के बाहर झोपड़ी बनाकर अपने पुत्र कमाल के साथ रहते थे। संत कबीर जी का रोज का नियम था- नदी में स्नान करके गांव के सभी मंदिरों में जल चढाकर दोपहर बाद भजन में बैठते, शाम को देर से घर लौटते।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह अपने नित्य नियम से गांव में निकले थे इधर पास के गांव के जमींदार का एक ही जवान लडका था जो रात को अचानक मर गया रात भर रोना-धोना चला।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आखिर में किसी ने सुझाया कि गांव के बाहर जो बाबा रहते हैं उनके पास ले चलो शायद वह कुछ कर दें। सब तैयार हो गए, लाश को लेकर पहुंचे कुटिया पर देखा बाबा तो हैं नहीं, अब क्या करें ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तभी कमाल आ गए उनसे पूछा कि बाबा कब तक आएंगे ? कमाल ने बताया कि अब उनकी उम्र हो गई है सब मंदिरों के दर्शन करके लौटते-लौटते रात हो जाती है. आप काम बोलो क्या है ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लोगों ने लड़के के मरने की बात बता दी कमाल ने सोचा कोई बीमारी होती तो ठीक था पर ये तो मर गया है अब क्या करें ! फिर भी सोचा लाओ कुछ करके देखते हैं शायद बात बन जाए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कमाल ने कमंडल उठाया लाश की तीन परिक्रमा की फिर तीन बार गंगा जल का कमंडल से छींटी मारा और तीन बार राम नाम का उच्चारण किया लडका देखते ही देखते उठकर खड़ा हो गया लोगों की खुशी की सीमा न रही।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इधर कबीर जी को किसी ने बताया कि आपके कुटिया की ओर गांव के जमींदार और सभी लोग गए हैं कबीर जी झटकते कदमों से बढ़ने लगे उन्हें रास्ते में ही लोग नाचते कूदते मिले कबीर जी कुछ समझ नही पाए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आकर कमाल से पूछा कया बात हुई ? तो कमाल तो कुछ ओर ही बताने लगा बोला- गुरु जी बहुत दिन से आप बोल रहे थे ना की तीर्थ यात्रा पर जाना है तो अब आप जाओ यहां तो मैं सब संभाल लूंगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कबीर जी ने पूछा क्या संभाल लेगा ? कमाल बोला- बस यही मरे को जिंदा करना, बीमार को ठीक करना ये तो सब अब मैं ही कर लूंगा अब आप तो यात्रा पर जाओ जब तक आप की इच्छा हो।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कबीर ने मन ही मन सोचा- चेले को सिद्धि तो प्राप्त हो गई है पर सिद्धि के साथ ही साथ इसे घमंड भी आ गया है। पहले तो इसका ही इलाज करना पडेगा बाद मे तीर्थ यात्रा होगी क्योंकि साधक में घमंड आया तो साधना समाप्त हो जाती है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कबीर जी ने कहा ठीक है आने वाली पूर्णमासी को एक भजन का आयोजन करके फिर निकल जाउंगा यात्रा पर तब तक तुम आस-पास के दो चार संतो को मेरी चिट्ठी जाकर दे आओ भजन में आने का निमंत्रण भी देना।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कबीर जी ने चिट्ठी मे लिखा था-&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कमाल भयो कपूत, कबीर को कुल गयो डूब।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कमाल चिट्ठी लेकर गया एक संत के पास उनको चिट्ठी दी चिट्ठी पढ के वह समझ गए उन्होंने कमाल का मन टटोला और पूछा कि अचानक ये भजन के आयोजन का विचार कैसे हुआ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कमाल ने अहं के साथ बताया- कुछ नहीं गुरू जी की लंबे समय से तीर्थ पर जाने की इच्छा थी अब मैं सब कर ही लेता हूं तो मैने उन्हें कहा कि अब आप जाओ यात्रा कर आओ तो वह जा रहे है ओर जाने से पहले भजन का आयोजन है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;संत दोहे का अर्थ समझ गए उन्होंने कमाल से पूछा- तुम क्या क्या कर लेते हो ? तो बोला वही मरे को जिंदा करना बीमार को ठीक करना जैसे काम।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;संत जी ने कहा आज रूको और शाम को यहां भी थोडा चमत्कार दिखा दो उन्होंने गांव में खबर करा दी थोडी देर में दो तीन सौ लोगों की लाईन लग गई सब नाना प्रकार की बीमारी वाले संत जी ने कमाल से कहा- चलो इन सबकी बीमारी को ठीक कर दो।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कमाल तो देख के चौंक गया अरे, इतने सारे लोग हैं। इतने लोगों को कैसे ठीक करूं यह मेरे बस का नहीं है संत जी ने कहा- कोई बात नहीं अब ये आए हैं तो निराश लौटाना ठीक नहींक्षतुम बैठो।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;संत जी ने लोटे में जल लिया और राम नाम का एक बार उच्चारण करके छींट दिया एक लाईन में खड़े सारे लोग ठीक हो गए फिर दूसरी लाइन पर छींटा मारा वे भी ठीक बस दो बार जल के छींटे मार कर दो बार राम बोला तो सभी ठीक हो के चले गए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;संत जी ने कहा- अच्छी बात है कमाल हम भजन में आएंगे, पास के गांव में एक सूरदास जी रहते हैं उनको भी जाकर बुला लाओ फिर सभी इक्ठ्ठे होकर चलते हैं भजन में।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कमाल चल दिया सूरदास जी को बुलाने सारे रास्ते सोचता रहा कि ये कैसे हुआ कि एक बार राम कहते ही इतने सारे बीमार लोग ठीक हो गए, मैंने तीन बार प्रदक्षिणा की, तीन बार गंगा जल छिड़क कर तीन बार राम नाम लिया तब बात बनी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यही सोचते-सोचते सूरदास जी की कुटिया पर पहुंच गया जाके सब बात बताई कि क्यों आना हुआ कमाल सुना ही रहा था कि इतने में सूरदास बोले- बेटा जल्दी से दौड के जा टेकरी के पीछे नदी में कोई बहा जा रहा है जल्दी से उसे बचा ले।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कमाल दौड के गया टेकरी पर से देखा नदी में एक लडका बहा आ रहा था कमाल नदी में कूद गया और लडके को बाहर निकाल कर अपनी पीठ जी लादके कुटिया की तरफ चलने लगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चलते- चलते उसे विचार आया कि अरे सूरदास जी तो अंधे हैं फिर उन्हें नदी और उसमें बहता लडका कैसे दिख गया उसका दिमाग सुन्न हो गया था लडके को भूमि पर रखा तो देखा कि लडका मर चुका था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सूरदास ने जल का छींटा मारा और बोला- “रा”। तब तक लडका उठ के चल दिया अब तो कमाल अचंभित की अरे इन्हें तो पूरा राम भी नहीं बोला खाली रा बोलते ही लडका जिंदा हो गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तब कमाल ने वह चिट्ठी खोल के खुद पढी की इसमें क्या लिखा है जब उसने पढा तो सब समझ मे आ गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वापस आ के कबीर जी से बोला गुरु जी संसार मे एक से एक सिद्ध हैं उनके आगे मैं कुछ नहीं हूं गुरु जी आप तो यहीं रहिए अभी मुझे जाकर भ्रमण करके बहुत कुछ सीखने समझने की जरूरत है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कथा का तात्पर्य कि गुरू की कृपा से सिद्धियां मिलती हैं उनका आशीर्वाद होता है तो साक्षात ईश्वर आपके साथ खड़े होते हैं।गुरू, गुरू ही रहेंगे, वह शिष्य के मन के सारे भाव पढ़ लेते हैं और मार्गदर्शक बनकर उन्हें पतन से बचाते हैं।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title> स्त्री का सम्मान</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post_04.html</link><pubDate>Tue, 4 Aug 2026 18:10:36 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-3823430302866806918</guid><description>&lt;div&gt;महादेव के भक्त ऋषि भृंगी थे , वो स्त्रियों को तुच्छ समझते थे।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वो शिवजी को गुरु तुल्य मानते थे, किन्तु माँ पार्वती को वो अनदेखा करते थे। एक तरह से वो माँ को भी आम स्त्रियों की तरह साधारण और तुच्छ ही समझते थे। महादेव जय भृंगी के इस स्वभाव से चिंतित और खिन्न थे। एक दिन शिव जी ने माता से कहा, आज ज्ञान सभा में आप भी चले। माँ शिव जी के इस प्रस्ताव को स्वीकार की और ज्ञान सभा में शिव जी के साथ विराजमान हो गई। सभी ऋषिगण और देवताओ ने माँ और परमपिता को नमन किया और उनकी प्रदक्षिणा की और अपना अपना स्थान ग्रहण किया..&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;किन्तु भृंगी माँ और शिव जी को साथ देख कर थोड़े चिंतित थे, उन्हें समझ नही आ रहा था कि वो शिव जी की प्रदक्षिणा कैसे करे। बहुत विचारने के बाद भृंगी ने महादेव जी से कहा कि वो पृथक खड़े हो जाये। शिव जी जानते थे भृंगी के मन की बात। वो माँ को देखे, माता उनके मन की बात पढ़ ली और वो शिव जी के आधे अंग से जुड़ गई और अर्धनारीश्वर रूप में विराजमान हो गई। अब तो भृंगी और परेशान, कुछ पल सोचने के बाद भृंगी ने एक राह निकाली।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भवरें का रूप लेकर शिवजी के जटा की परिक्रमा की और अपने स्थान पर खड़े हो गए। माता को भृंगी के ओछी सोच पे क्रोध आ गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;उन्होंने भृंगी से कहा- भृंगी तुम्हे स्त्रियों से इतना ही परहेज है तो क्यूँ न तुम्हारे में से स्त्री शक्ति को पृथक कर दिया जाये और माँ ने भृंगी से स्त्रीत्व को अलग कर दिया। अब भृंगी न तो जीवितों में थे न मृत थे। उन्हें आपार पीड़ा हो रही थी..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वो माँ से क्षमा याचना करने लगे। तब शिव जी ने माँ से भृंगी को क्षमा करने को कहा।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;माँ ने उन्हें क्षमा किया और बोली - संसार में स्त्री शक्ति के बिना कुछ भी नही। बिना स्त्री के प्रकृति भी नही पुरुष भी नही। दोनों का होना अनिवार्य है और जो स्त्रियों को सम्मान नही देता वो जीने का अधिकारी नही। आज संसार में अनेकों ऐसे सोच वाले लोग हैं। उन्हें इस प्रसंग से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। वो स्त्रियों से उनका सम्मान न छीने। खुद जिए और स्त्रियों के लिए भी सुखद संसार की व्यवस्था बनाए रखने में योगदान दें।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>बिहारी भैया जी </title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post_742.html</link><pubDate>Mon, 3 Aug 2026 09:00:06 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-3453736126033657116</guid><description>जब दुनिया ने साथ छोड़ा तब बिहारी जी ‘भैया’ बनकर साथ खड़े हो गए !!&lt;div&gt;नथिया बाई माता-पिता की लाड़ली,भाग्य की परीक्षा की धधकती अग्नि में तपने वाली एक साध्वी आत्मा। विवाह के कुछ ही समय बाद सुहाग छिन गया और घाव भरा भी नहीं था कि इकलौता भाई भी चला गया। जहाँ कोई भी स्त्री टूट जाती वहाँ नथिया बाई ने आँसुओं को हार नहीं, भक्ति का अभिषेक बना दिया। उनकी दुनिया सिमट गई संतों की सेवा, ठाकुर जी की भक्ति और राधे-राधे का जाप। लेकिन परीक्षा यहीं खत्म नहीं हुई चचेरे भाई ने संत सेवा पर रोक लगा दी। ये रोक उनके लिए सांस रुकने जैसी थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तब वो रोती हुई पहुँचीं बिहारी जी के चरणों में हे सांवरिया! अगर मेरी सेवा सच्ची है तो रास्ता तुम दिखाओ।,तुम्हारे बिना मेरा कोई नहीं! और सच में पुकार सुन ली गई।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मोह-माया की जंजीरें टूटीं, और नथिया बाई चल पड़ीं वृंदावन की ओर। ना धन, ना सहारा बस भरोसा मेरे बिहारी मेरे साथ हैं।जंगल और शहर की सीमा पर उन्होंने दीन-दुखियों और संतों की सेवा शुरू कर दी। वो सेवा नहीं करती थीं वो प्रेम लुटाती थीं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;फिर आया रक्षाबंधन भाई की कमी ने हृदय भिगो दिया। सीधे बाँके बिहारी के दरबार पहुँचीं और राखी बाँध दी जगत के स्वामी को! उस दिन से बिहारी जी सिर्फ आराध्य नहीं उनके “भैया” बन गए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कहते हैं जब भक्त पूरी तरह प्रभु पर निर्भर हो जाता है तब उसकी चिंता खुद नारायण करते हैं। एक दिन संतों को खिलाने के लिए घर में एक दाना भी न बचा आँखें भर आईं आज संत भूखे रहेंगे तभी एक अनजान सेठ आया, गेहूं देकर बोला, इसे पिसवा देना।नथिया बाई ने चक्की घुमाई राधे-राधे जपते हुए और फिर जो हुआ, उसने इतिहास लिख दिया:&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चक्की से आटे के साथ सोने के कण झड़ने लगे! ये चमत्कार नहीं बिहारी जी की मुहर थी। मेरे भक्त के भंडारे कभी खाली नहीं रहेंगे। नथिया बाई की भक्ति ऐसी थी कि वो प्रभु से बातें करती थीं, उन्हें दुलारती थीं।और सांवरिया भी कई बार साक्षात् दर्शन देते थे। आज भी वृंदावन के टटीया स्थान पर उनकी स्मृति जीवंत है। वहाँ की संत सेवा हमें याद दिलाती है सच्ची श्रद्धा पत्थर से भी सोना निकाल सकती है। भगवान मूर्ति में ही नहीं, सेवा करते हर हाथ में बसते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नथिया बाई की कथा एक संदेश है- जब संसार साथ छोड़ दे तो डरना मत क्योंकि उसी मोड़ पर बिहारी जी खुद भैया” बनकर हाथ थाम लेते हैं।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>माता अनुसूया </title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post_451.html</link><pubDate>Mon, 3 Aug 2026 08:58:20 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-8484815084824349318</guid><description>क्या आपने कभी सुना है कि एक साधारण ऋषि-पत्नी ने स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश को शिशु बना दिया था? यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि सनातन परंपरा में वर्णित माता अनुसूया की अद्भुत कथा है। एक ऐसी कथा, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची भक्ति, निष्काम सेवा और अटूट पतिव्रत के सामने स्वयं त्रिदेव भी नतमस्तक हो जाते हैं।&lt;div&gt;एक समय स्वर्गलोक में एक चर्चा उठी। प्रश्न था कि तीनों लोकों में सबसे महान पतिव्रता नारी कौन है? देवताओं, ऋषियों और सिद्धों के बीच अनेक नाम लिए गए, लेकिन अंत में जब निर्णय देने का समय आया तो स्वयं ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव ने एक ही नाम लिया—माता अनुसूया। उन्होंने कहा कि संसार में यदि कोई स्त्री अपने पतिव्रत, तप, सेवा, करुणा और निष्काम प्रेम के कारण सबसे श्रेष्ठ है, तो वह महर्षि अत्रि की पत्नी माता अनुसूया हैं। यह सुनते ही स्वर्ग का वातावरण बदल गया। माता सरस्वती, माता लक्ष्मी और माता पार्वती के मन में आश्चर्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने सोचा कि आखिर ऐसी कौन-सी विशेषता है जो माता अनुसूया को सबसे महान बनाती है। धीरे-धीरे यह आश्चर्य एक जिज्ञासा में और जिज्ञासा एक परीक्षा की इच्छा में बदल गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;देवियों ने त्रिदेवों से आग्रह किया कि यदि माता अनुसूया वास्तव में इतनी महान हैं, तो उनकी परीक्षा अवश्य ली जानी चाहिए। पहले तो त्रिदेव इस बात के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने कहा कि सच्चे भक्त की परीक्षा लेना उचित नहीं होता। लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं कि अंततः उन्होंने माता अनुसूया की भक्ति और पतिव्रत की परीक्षा लेने का निश्चय किया। तीनों ने अपने दिव्य स्वरूप को त्यागकर साधुओं का वेश धारण किया और पृथ्वी पर महर्षि अत्रि के आश्रम की ओर चल पड़े।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उस समय महर्षि अत्रि किसी कार्य से आश्रम से बाहर गए हुए थे। आश्रम में केवल माता अनुसूया थीं। उनका जीवन अत्यंत सरल था। हर प्राणी की सेवा करना, अतिथियों का सत्कार करना, तप और भगवान का स्मरण करना ही उनका दैनिक नियम था। जब तीनों साधु आश्रम पहुंचे तो माता अनुसूया ने उनका अत्यंत आदरपूर्वक स्वागत किया। उन्होंने उनके चरण धोए, आसन दिया और विनम्रता से कहा, "महात्माओं, कृपया भोजन ग्रहण कीजिए। अतिथि मेरे लिए देवतुल्य हैं।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तीनों साधुओं ने एक-दूसरे की ओर देखा और बोले, "हम भोजन अवश्य करेंगे, लेकिन हमारी एक शर्त है। तुम्हें निर्वस्त्र होकर हमें भिक्षा देनी होगी।" यह सुनते ही माता अनुसूया क्षणभर के लिए मौन हो गईं। उनके सामने एक भयंकर धर्मसंकट खड़ा हो गया। एक ओर अतिथि धर्म था, जिसे निभाना उनका कर्तव्य था। दूसरी ओर पतिव्रत धर्म था, जिसकी रक्षा उनके जीवन का सबसे बड़ा व्रत था। सामान्य बुद्धि से इस संकट का कोई समाधान संभव नहीं था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन माता अनुसूया विचलित नहीं हुईं। उन्होंने आंखें बंद कीं, अपने पति महर्षि अत्रि का स्मरण किया और मन ही मन भगवान से प्रार्थना की—"यदि मेरा पतिव्रत निष्कलंक है, यदि मैंने कभी अपने धर्म से विचलित होकर कोई कार्य नहीं किया, तो सत्य स्वयं मेरी रक्षा करे।" जैसे ही उन्होंने अपने कमंडलु का पवित्र जल तीनों साधुओं पर छिड़का, उसी क्षण एक अद्भुत चमत्कार हुआ। देखते ही देखते तीनों साधु छह महीने के छोटे-छोटे शिशु बन गए। उनके तेजस्वी शरीर अब मासूम बालकों के रूप में बदल चुके थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;माता अनुसूया के हृदय में मातृत्व उमड़ पड़ा। उन्होंने उन तीनों शिशुओं को अपनी गोद में उठा लिया। उन्हें प्रेमपूर्वक भोजन कराया, झूले में सुलाया और अपने ही पुत्रों की तरह उनका पालन करने लगीं। पृथ्वी पर माता अनुसूया ने अपना धर्म निभा दिया, लेकिन उसी समय स्वर्गलोक में चिंता फैल गई। ब्रह्मा, विष्णु और महेश अपने-अपने लोकों में दिखाई नहीं दे रहे थे। देवताओं में हड़कंप मच गया। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि सृष्टि के तीनों आधार अचानक कहां लुप्त हो गए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसी बीच देवर्षि नारद वहां पहुंचे। उन्होंने ध्यान लगाकर सारी घटना देखी और देवताओं के साथ तीनों देवियों को बताया कि त्रिदेव किसी युद्ध में नहीं हारे, बल्कि माता अनुसूया के निष्कलंक पतिव्रत और तप की शक्ति से शिशु बन गए हैं। यह सुनते ही माता लक्ष्मी, माता पार्वती और माता सरस्वती को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने अहंकारवश एक महान साध्वी की परीक्षा लेने का प्रयास किया था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तीनों देवियां तुरंत पृथ्वी पर माता अनुसूया के आश्रम पहुंचीं। वहां उन्होंने तीनों दिव्य शिशुओं को माता अनुसूया की गोद में खेलते देखा। लेकिन वे यह पहचान ही नहीं सकीं कि उनमें ब्रह्मा कौन हैं, विष्णु कौन हैं और शिव कौन हैं। तीनों के चेहरे पर समान तेज था। यह देखकर उनका अहंकार पूरी तरह समाप्त हो गया। वे माता अनुसूया के चरणों में गिर पड़ीं और विनम्र स्वर में बोलीं, "माता, हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई। कृपया हमें क्षमा कर दीजिए और हमारे पतियों को उनका वास्तविक स्वरूप लौटा दीजिए।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;माता अनुसूया के हृदय में किसी के प्रति राग या द्वेष नहीं था। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "जहां सच्चा पश्चाताप हो, वहां क्षमा देने में कभी देर नहीं करनी चाहिए।" उन्होंने पुनः अपने तप का संकल्प किया और दिव्य प्रार्थना की। अगले ही क्षण वे तीनों शिशु अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गए। ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्वयं माता अनुसूया के सामने हाथ जोड़कर खड़े थे। त्रिदेव बोले, "माता, आज आपने सिद्ध कर दिया कि सच्ची भक्ति, निष्काम सेवा और पतिव्रत की शक्ति के सामने स्वयं देवता भी नतमस्तक हो जाते हैं।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;त्रिदेव माता अनुसूया से अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, "माता, कोई वरदान मांगिए।" माता अनुसूया ने विनम्र स्वर में उत्तर दिया, "प्रभुओं, मुझे किसी धन, वैभव, राज्य या शक्ति की इच्छा नहीं है। आपके दर्शन ही मेरे लिए सबसे बड़ा वरदान हैं।" माता की निष्काम भावना देखकर त्रिदेव और भी अधिक प्रसन्न हो गए। उन्होंने कहा, "तुमने कुछ नहीं मांगा, इसलिए हम स्वयं तुम्हें सबसे महान वरदान देते हैं। हम अपने-अपने दिव्य अंश से तुम्हारे पुत्र रूप में अवतार लेंगे।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भगवान विष्णु के अंश से भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ, जो योग, ज्ञान और करुणा के प्रतीक बने। भगवान शिव के अंश से महर्षि दुर्वासा प्रकट हुए, जिनका तप और सत्य के प्रति संकल्प अद्वितीय था। ब्रह्मा के अंश से चंद्रदेव का अवतार हुआ, जो शीतलता, संतुलन और सौम्यता के प्रतीक बने। उसी समय महर्षि अत्रि भी आश्रम लौट आए। उन्होंने स्वयं त्रिदेवों के दर्शन किए और समझ गए कि आज उनके आश्रम में कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि युगों तक स्मरण की जाने वाली दिव्य लीला घटित हुई है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;त्रिदेवों ने महर्षि अत्रि और माता अनुसूया को आशीर्वाद देते हुए कहा, "जब तक इस सृष्टि में धर्म, सत्य और भक्ति का प्रकाश रहेगा, तब तक तुम्हारा यश अमर रहेगा। लोग तुम्हारा स्मरण श्रद्धा, पतिव्रत और निष्काम सेवा के सर्वोच्च आदर्श के रूप में करेंगे।" उस दिन देवियों ने भी यह स्वीकार किया कि महानता सौंदर्य, वैभव या शक्ति से नहीं, बल्कि विनम्रता, सेवा, प्रेम और निष्कलंक चरित्र से प्राप्त होती है।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>गजासुर</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post_03.html</link><pubDate>Mon, 3 Aug 2026 08:56:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-1076756738392821284</guid><description>&lt;div&gt;श्री गणेश को गजासुर का ही शीश क्यों लगा? जानिए यह अद्भुत पौराणिक कथा!&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;गज (हाथी) और असुर के संयोग से जन्मे 'गजासुर' भगवान शिव के परम भक्त थे। महादेव की आराधना के बिना वे अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। उनकी इसी अनन्य भक्ति ने उन्हें वह अकल्पनीय सम्मान दिलाया, जिसे आज पूरी दुनिया पूजती है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;महादेव का अनोखा वरदान&lt;/div&gt;&lt;div&gt;गजासुर की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे मनचाहा वरदान मांगने को कहा। गजासुर ने कहा, "प्रभु! आप कैलाश छोड़कर मेरे उदर (पेट) में ही निवास करें।" भोले भंडारी तो ठहरे भक्तों के अधीन, वे तुरंत गजासुर के पेट में समा गए। जब माता पार्वती को शिवजी कहीं नहीं मिले, तो उन्होंने भगवान विष्णु से सहायता मांगी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्रीहरि की अद्भुत लीला&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्रीहरि ने शिवजी को मुक्त कराने के लिए एक लीला रची। वे एक चरवाहे का भेष धारण कर मनमोहक बांसुरी बजाने लगे और उनके साथ सजे-धजे नंदी ने गजासुर के सामने अद्भुत नृत्य किया। गजासुर इस कला से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने अपनी सुध-बुध खोकर चरवाहे (विष्णु जी) को मुँहमांगा वरदान देने का वचन दे दिया। श्रीहरि ने तुरंत शिवजी को उसके उदर से मुक्त करने का वरदान मांग लिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;गजासुर की अंतिम इच्छा&lt;/div&gt;&lt;div&gt;गजासुर अपने वचन से पीछे नहीं हटा। वह समझ गया कि ये स्वयं नारायण हैं। उसने शिवजी को मुक्त किया और एक भावुक मांग रखी— "प्रभु! मेरे शरीर से आपके जाने के बाद जीवन का कोई मोल नहीं रहा। मुझे ऐसा वरदान दें कि मेरे शरीर का कोई अंश हमेशा आपके साथ पूजित हो।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तब श्रीहरि ने उसे आशीर्वाद दिया कि समय आने पर उसे अकल्पनीय सम्मान मिलेगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्रथम आराध्य बनने का सौभाग्य&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कालान्तर में, जब भगवान गणेश का शीश धड़ से अलग हुआ, तब भगवान विष्णु इसी शिवभक्त गजासुर का शीश काटकर लाए थे और उसे गणपति के धड़ से जोड़ दिया था। इस तरह अपनी निस्वार्थ भक्ति के कारण गजासुर, शिवजी के प्रिय पुत्र के रूप में संसार में प्रथम आराध्य हो गए!&amp;nbsp;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>दयालु और बड़ा दिल</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post_02.html</link><pubDate>Sun, 2 Aug 2026 08:14:27 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-6447807960652089077</guid><description>&lt;div&gt;एक बार भगवान श्री हरि विष्णु जी शेषनाग पर बैठे बोर हो गये और उन्होने धरती पर घूमने का विचार मन मे किया, वेसे भी कई साल बीत गये थे धरती पर आये, अतः वह अपनी यात्रा की तैयारी मे लग गये।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;स्वामी को तैयार होता देख कर लक्ष्मी मां ने पुछा आज सुबह सुबह कहा जाने कि तैयारी हो रही है?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; विष्णु जी ने कहा हे लक्ष्मी मै धरती लोक पर घुमने जा रहा हूं, तो कुछ सोच कर लक्ष्मी मां ने कहा ! हे देव क्या मै भी आप के साथ चल सकती हूं?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; भगवान विष्णु ने दो पल सोचा फ़िर कहा एक शर्त पर, तुम मेरे साथ चल सकती हो तुम धरती पर पहुँच कर उत्तर दिशा की ओर बिलकुल मत देखना। इस के साथ ही माता लक्ष्मी ने हां कह के अपनी बात मनवाली।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ओर सुबह सुबह माँ लक्ष्मी ओर भगवान विष्णु धरती पर पहुँच गये।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अभी सुर्य देवता निकल रहे थे, रात बरसात हो कर हटी थी, चारो ओर हरियाली ही हरियाली थी, उस समय चारो ओर बहुत शान्ति थी ओर धरती बहुत ही सुन्दर दिख रही थी, माँ लक्ष्मी मन्त्र मुग्ध हो कर धरती को देख रही थी, भूल गई कि पति को क्या वचन दे कर आई है? चारो ओर देखती हुयी कब उत्तर दिशा की ओर देखने लगी पता ही नही चला।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उत्तर दिशा में माँ लक्ष्मी को एक बहुत ही सुन्दर बगीचा नजर आया, वँहा से भीनी भीनी सुगन्ध आ रही थी, बहुत ही सुन्दर सुन्दर फूल खिले थे, यह एक फूलों का बगीचा था, माँ लक्ष्मी बिना सोचे समझे उस बगीचे मे गई ओर एक सुंदर सा फूल तोड लाई, किन्तु यह क्या जब माँ लक्ष्मी भगवान विष्णु के पास वापिस आई तो भगवान विष्णु की आंखो मै आंसु थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भगवान विष्णु ने माँ लक्ष्मी को कहा कि कभी भी किसी से बिना पुछे उसका कुछ भी नही लेना चाहिये, साथ ही अपना वचन भी याद दिलाया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;माँ लक्ष्मी को अपनी भूल का पता चला तो उन्होने भगवान विष्णु से इस भूल की क्षमा मागी, तब भगवान विष्णु ने कहा कि तुमने जो भूल की है उस का दंड तो तुम्हे अवश्य मिलेगा?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; जिस माली के बगीचे से तुमने बिना पुछे फ़ुल तोडा है, यह एक प्रकार की चोरी है, इसलिये अब तुम तीन साल तक माली के घर नौकरानी बन कर रहॊ, उस के बाद मै तुम्हे बैकुण्ठ मे वापीस बुलाऊंगा, माँ लक्ष्मी ने चुपचाप सर झुका कर हाँ कर दी (आज कल की लक्ष्मी थोडे थी?)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;माँ लक्ष्मी एक दीन हीन निर्धन औरत का रुप धारण करके, बगीचे के स्वामी के घर गई, घर क्या एक झोपड़ी थी, स्वामी का नाम माधव था, माधब की पत्नी, दो बेटे ओर तीन बेटियाँ थी , सभी उस बगीचे मै काम करके किसी तरह से गुजारा करते थे,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp; माँ लक्ष्मी जब एक साधारण और दीन हीन औरत बन कर माधव के झोपड़ी पर गई तो माधव ने पूछा बहिन तुम कोन हो? इस समय तुम्हे क्या चाहिये? तब मां लक्ष्मी ने कहा, मै एक असहाय औरत हू मेरी देख भाल करने वाला कोई नही, मैने कई दिनो से भोजन भी नही किया मुझे कोई भी काम दे दॊ, साथ में तुम्हारे घर का काम भी कर दिया करुगीं , बस मुझे अपने घर में एक कोने में आसरा देदो।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;माधव बहुत ही दयालु था, उसे दया आ गई, लेकिन उस ने कहा, बहिन मै तो बहुत ही गरीब हुँ, मेरी कमाई से मेरे घर का खर्च मुस्किल से चलता है, लेकिन अगर मेरी तीन की जगह चार बेटियाँ होती तो भी मेने गुजारा करना था, अगर तुम मेरी बेटी बन कर जेसा रुखा सुखा हम खाते है उस मै खुश रह सकती हो तो बेटी अन्दर आ जाओ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;माधाव ने माँ लक्ष्मी को अपने झोपडे में शरण दे दी, और माँ लक्ष्मी तीन साल तक उस माधव के घर पर नोकरानी बन कर रही।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जिस दिन माँ लक्ष्मी माधव के घर आई थी उस से दुसरे दिन ही माधाव को फूलो से इतनी आमदनी हुयी की शाम को एक गाय खरीद ली, फ़िर धीरे धीरे माधव ने काफ़ी जमीन खरीद ली, और सब ने अच्छे अच्छे कपड़े भी बनवा लिये, और फ़िर एक बड़ा पक्का घर भी बनवा लिया, बेटियों और पत्नी ने गहने भी बनवा लिये, और अब मकान भी बहुत बड़ा बनवा लिया था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;माधव सदैव सोचता था कि मुझे यह सब इस महिला के आने के बाद मिला है, इस बेटी के रुप मे मेरी किस्मत आ गई है और अब 2-3 साल बीत गये थे, लेकिन मां लक्ष्मी अब भी घर मै और बगीचे में काम करती थी, एक दिन माधव जब अपने बगीचे से काम खत्म करके घर आया तो उस ने अपने घर के सामने द्वार पर एक देवी स्वरुप गहनों से लदी एक औरत को देखा, ध्यान से देख कर पहचान गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;अरे यह तो मेरी मुहँ बोली चौथी बेटी यानि वही औरत है, पहचान गया कि यह तो माँ लक्ष्मी है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब तक माधव का पूरा परिवार बाहर आ गया था, सब हैरान हो कर माँ लक्ष्मी को देख रहे थे, माधव बोला है मां हमे क्षमा कर दो, हम ने आप से अंजाने मे ही घर और बगीचे मे काम करवाया है, माँ यह कैसा अपराध हो गया है, माँ हम सब को क्षण कर दो।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब माँ लक्ष्मी मुस्कुराई और बोली, हे माधव तुम बहुत ही अच्छे और दयालु व्यक्त्ति हो, तुम ने मुझे अपनी बेटी की तरह से रखा, अपने परिवार के सदस्य की तरह से, इस के बदले मै तुम्हे वरदान देती हूं कि तुम्हारे पास कभी भी खुशियो की और धन की कमी नही रहेगी, तुम्हे सारे सुख मिलेगे जिस के तुम हकदार हो।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यह सब बोल कर माँ अपने स्वामी के द्वारा भेजे रथ मे बैठ कर बैकुण्ठ चली गई।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस कहानी मे माँ लक्ष्मी का संदेश है कि जो लोग दयालु और बड़े दिल के होते है मै वही निवास करती हूं, अतः हमे सभी की मदद करनी चाहिये, और गरीब से गरीब को भी तुच्छ नही समझना चाहिये।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;शिक्षा - एक छोटी सी भूल पर भगवान ने माँ लक्ष्मी को दंड दिया हम तो बहुत ही तुच्छ है, फ़िर भी भगवान हमे अपनी कृपा मे रखता है, हमे भी हर जीव के प्रति दयालुता दिखानी और बरतनी चाहिये और यह दुःख सुख हमारे ही कर्मो का फ़ल है।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>नारी-चाला</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post_01.html</link><pubDate>Sat, 1 Aug 2026 09:25:14 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-263955681702887246</guid><description>एक था राजा । राजा की हजामत बनाने जो नाई आता था, उसकी | पत्नी नैण अपूर्व सुंदरी थी। एक बार वजीर ने नाइन को देखा तो वह देखता ही रह गया। नाई की अनुपस्थिति में उसने राजा से कहा, "हे प्रभु! स्त्रियाँ तो बहुत देखी हैं, लेकिन 'नैण' पर तो आँख टिकाए नहीं टिकती। उसे तो आपकी सेज पर होना चाहिए।" राजा तो स्वभाव से ही सामंत - वृत्ति का था । श्रवण मात्र से ही वह नारी के रूप- वैभव पर मुग्ध हो गया तथा नैण को प्राप्त करने के लिए उसकी लार टपकने लगी। वजीर ने उसे परामर्श दिया, "महाराज! नाई को कहीं बाहर भिजवा सकें तो उसकी अनुपस्थिति में नैण को फुसलाया जा सकता है।"&lt;div&gt;राजा ने नाई को बुलाकर कहा, "मुझे 'स्त्री-चाला' की जरूरत है। जहाँ कहीं से ही संभव हो, जाकर तुरंत ले आओ। तुम्हारी क्षमता तथा वफादारी पर मुझे पूरा भरोसा है।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नाई बेचारा सीधा-सादा। वह सोच में पड़ गया। उसे तो 'स्त्री चाला' नाम की बला का भी नहीं पता था। वह उदास सा घर पहुँचा। बिना खाए-पिए खाट पर लेट गया। उसकी पत्नी ने पूछा, “इतने घबराए हुए क्यों हो?"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नाई ने रोनी सी सूरत बनाकर कहा, "राजा ने मुझे स्त्री चाला लाने का आदेश दिया है। पर मैं उसके बारे में कुछ भी नहीं जानता, व्यर्थ की मुसीबत गले पड़ गई।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नैण ने विश्वस्त स्वर में कहा, “तुम तो व्यर्थ में स्त्री-चाला की चिंता कर रहे हो । जाओ, राजा से कहो- मैं स्त्री चाला तो ले आऊँगा, लेकिन पहले मुझे चार करोड़ रुपए दे दो।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नाई राजा के पास गया और चार करोड़ रुपए ले आया ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नाइन ने रुपए लिये तथा सँभालकर रख दिए। उसने अपने पति को छिपा दिया। दिन छिपने के बाद नैण सज-सँवरकर गाँव में घूमने लगी। रास्ते में उसे चौकीदार मिला। वह बड़ी आत्मीयता से बोला, "प्रिये, तुम कहाँ जा रही हो?"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नैण बोली, "मेरा पति राजा के लिए 'स्त्री चाला' लेने बाहर गया है। घर में मैं अकेली हूँ और ऊपर से अँधियारी रात, सो मैं परिचितों के घर जा रही हूँ ।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चौकीदार ने कहा, " घर अपना ही अच्छा होता है। रात को मैं ही तुम्हारे घर आ जाऊँगा । पहरेदार को छोड़, क्यों तुम अन्यत्र जाती हो। " नैण ने 'अच्छा' कहा और आगे चल दी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;फिर उसे गाँव का नंबरदार मिला। नैण की महक से उसका भी शरीर पिघलने लगा। उसने कहा, "तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं । अँधेरा घना होते ही मैं तुम्हारे घर आ जाऊँगा।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चौकीदार, नंबरदार के बाद नैण को वजीर, राजा तथा राजऋषि मिले, उन्होंने भी रात होते ही उसके घर पहुँचने की बात कही। नैण 'हाँ-हाँ' करती मन-ही-मन मुसकराती अपने घर लौट आई।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;घर पहुँचते ही उसने चूल्हा जलाया तथा उसमें दो लकड़ियाँ लगा दीं और पतीला चढ़ा दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सबसे पहले गुनगुनाता हुआ चौकीदार आया। वह अभी नैण को छूने की कल्पना ही कर रहा था कि नंबरदार ने आवाज लगा दी। चौकीदार ने डरकर कहा, "ओ नैणी, मुझे बचाओ।" नैण ने उसे उल्टी घघरी पहनाकर दाल पीसने बिठा दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नंबरदार के बाद वजीर आया तो नंबरदार ने कहा, "ओ नैणी, मुझे बचा! मेरी तो इज्जत खतरे में है ।" नैण ने उसका दिउट बनाया तथा उसके ऊपर लैंप रख दिया। इसी प्रकार अभी वजीर अंदर आया ही था कि राजा आ गया। वजीर के अनुनय-विनय करने पर नैण ने उसका मुँह मिट्टी से लीप दिया तथा उसे अलमारी में बिठा दिया। अभी राजा नैण से प्रेम भरी बातें करने ही लगा था कि बाहर से राजऋषि की आवाज आ गई। राजा गिड़गिड़ाया, "नैणी, मेरी साख खतरे में है, नारी की माया अपरंपार है। तू ही मुझे बचा सकती है।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नैण बोली, "महाराज, चिंता मत करो, मैं तो आपकी बाँदी हूँ। आपको अपना देवता बनाकर अलमारी में बिठाती हूँ। फिर कोई नहीं पहचान पाएगा।" उसने राजा के मुँह पर भी मिट्टी पोत दी तथा उसे अलमारी में बिठा दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अंत में राजऋषि का आगमन हुआ। उसने अलमारी में बैठे लोगों को देख लिया और पूछा, "ये कौन लोग हैं, कन्या ?"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;"महाराज! ये सभी मेरे देवता लोग हैं।" नैण बोली ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसके इतना कहते ही सबको एक-दूसरे की उपस्थिति का एहसास हो गया तथा लज्जित होकर वे आगे-पीछे भाग निकले। राजऋषि भी खिसियानी बिल्ली सा उनके पीछे भाग लिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सबके भाग जाने पर नैणी अपने पति के पास आई। बड़े प्यार से उसे दुलारते हुए नैणी ने भोजन परोसा और कहा, "देखा, तुम्हारे ये हितैषी किस प्रकार मेरी देह नोचने के लिए लार टपका रहे थे। लेकिन 'स्त्री चाले' के सामने इनकी क्या बिसात? यदि अब राजा तुमसे पूछे कि 'स्त्री चाला' कहाँ है, तो कहना मेरी पत्नी ने तुम्हारे मुँह पर मिट्टी तो लीप दी, 'स्त्री चाला' और क्या होता है ?"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नैण की चतुराई पर नाई गद्गद हो उठा।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>तुलसी दया ना छोड़िए जब तक घट में प्राण</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/08/blog-post.html</link><pubDate>Sat, 1 Aug 2026 09:23:14 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-2656658585483650583</guid><description>&lt;div&gt;हम बचपन से पढ़ते और सुनते आ रहे हैं ‍‍कि "दया धर्म का मूल है" सभी धर्मग्रंथों में दया पर ही अधिक जोर क्यों दिया गया है ? अगर हम दया नहीं कर सकते हैं तो हमारा यह मानव जीवन निरर्थक है, यह तो उसी प्रकार की बात हुई कि जन्म लिया, खाये-पिये, बड़े हुये, विवाह-शादी हुयीं, वंशवृद्धि कर परिवार को आगे बढ़ाया और कालांतर में जीवन यात्रा पूरी कर पहुंच गये अगली योनियों में।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऐसा जीवन तो पशु-पक्षी भी जीते हैं, तो फिर हम इंसानों व पशु-पक्षियों में क्या अंतर रह जाता है ? छोटे बच्चे, भूखे बीमार, बिलखते बच्चे, बुजुर्ग असहाय वृद्ध-वृद्धा यह फेहरिस्त काफी लंबी है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हे मनुष्य आत्माओं, तुम इन पर दया करो, तुम्हें भगवान् मिलेंगे, आपको ईश्वर की प्राप्ति के लिए दयालु बनना होगा। मन में दयाभाव व इंसानों के प्रति करुणा, विनम्रता व सहनशील रखना यह वाक्य हम सभी ने कई बार पढ़ा होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सड़क से गुजरते हुये या काम पर जाते समय कोई बीमार या बुजुर्ग व्यक्ति इस तरह की लिफ्ट मांगते हैं और लोग हैं कि इनको नजरअंदाज कर निकल जाते हैं, यह बात विडंबना की ही कही जायेगी, अरे भाई, किसी बीमार या जरूरतमन्द व्यक्ति को अगर हम जाते हुये अपने वाहन पर बिठाकर उसके मुकाम या उसके नजदीकी ठिकाने तक ही छोड़ दें तो हमको उसकी जो दुआयें मिलेंगी, उसी दुआओं से हमारा मानव जीवन सार्थक हो जायेगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हमें अपार खुशी तो मिलेगी ही इस बात की कि आज मैंने अपनी जिंदगी में एक अच्‍छा काम किया, देखियेगा कि हमको ईश्वर-प्राप्ति की गर चाह है तो हमको अपने आचरण को थोड़ा-सा ही सही, लेकिन सुधारना जरूर होगा, ठीक है हमारे पास समय नहीं है तो आज के मोबाइल, ई-मेल व इंटरनेट के जमाने में भी हम दया को अर्पित कर सकते हैं, वो भी घर बैठे ही, वो कैसे ?&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ठीक है यदि हमारे पास अनाथालय, वृद्धाश्रम, महिला श्राविका आश्रम, महिला उद्धार गृह, कुष्ठ उद्धार गृह आदि जगहों पर जाने का समय नहीं है तो हम इन आश्रमों के फोन, मोबाइल या सोशल नेटवर्किंग पर संपर्क कर अपनी दान राशि भेंट कर सकते हैं। इन आश्रमों के कर्मचारी हमारे घर आकर दान राशि ले जायेंगे तथा हम पुण्य के भागी बन जायेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अगर हम किसी की एक छोटी-सी भी मदद करते हैं तो वह व्यक्ति कृतज्ञ भाव से हमारी ओर देखता है, तब हमको जो आत्मसंतोष मिलता है, उसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता है। कभी हम भूखे बच्चों को रोटी खिलाकर, फटेहाल व ठंड में ठिठुरते लोगों को वस्त्र पहनाकर, किसी सताई हुई नारी को यह दिलासा देते हुये कि बहन चिंता मत करो, हम आपके साथ है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसके सिर पर अगर हम हाथ रखेंगे तो भावुकतावश हमारी आँखों से भी इस बात को लेकर अश्रुधारा बह निकलेगी कि आज मैंने ज़िन्दगी में अच्‍छा काम किया है, जब ईश्वर के सामने हम अपने कर्मों का हिसाब-किताब देने हेतु खड़े होंगे तो बिलकुल निश्चिंत होंगे, क्योंकि हमारे मन में यह भाव लगा रहेगा कि मैंने अपनी जिंदगी में‍ किसी आत्मा को कभी कोई कष्ट नहीं पहुंचाया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक इंसान होने के नाते हर व्यक्ति को चाहिये कि वह कभी भी किसी को बुरा नहीं बोले और न ही कभी बुरा कर्म ही करें। अगर हम किसी को बुरा बोलते हैं तो उसके वायब्रेशन सारे वायुमंडल में फैल जाते हैं, यह अपने, सामने वाले के साथ ही वातावरण को भी प्रदूषित करते हैं। अत: सदैव मीठा बोलें, यही बात कर्म पर भी लागू होती है, हमारे कर्म जितने अच्छे होंगे, हम ईश्वर के उतने ही करीब होंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ठीक है हमारे पास पैसे नहीं है, तो हम यह काम तो कर ही सकते हैं कि रास्ते में एक पत्थर पड़ा है, जो आते-जाते लोगों को लहूलुहान कर रहा है, कई लोग ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं, कई को गंभीर चोट लग भी सकती है या लगती भी है, तो हमें चाहिये कि वो पत्थर उस जगह से हटा कर एक तरफ रख दें। हमारे इस जरा-से कष्ट से कई लोगों को सुविधा हो जायेगी। अनजाने व खामोशी से किया गया यह कर्म हमको भी आत्मसंतुष्टि देगा व लोगों की दुआयें भी मिलेंगी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कई चौराहों व रास्तों पर देखा गया है कि बच्चे, बुजुर्ग व महिलायें रास्ता पार करने हेतु ट्रैफिक रुकने का इंतजार कर रहे होते हैं किंतु ट्रैफिक है कि रुकने का ही नाम नहीं लेता। हम ऐसी स्थि‍ति में उनकी मदद के लिहाज से उनका हाथ पकड़कर रास्ता पार करा सकते हैं, यह भी बिना खर्च किये मुफ्त की एक अच्‍छी मानव-सेवा है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मानव की सेवा माधव की सेवा के बराबर मानी गई है। हम चाहें चारों धाम की यात्रा करें लेकिन एक इंसान की सेवा अगर जरूरत के समय नहीं करते हैं तो चारों धाम की यात्रा का कोई फल मिलने वाला नहीं। खराब वचन और खराब कर्म करने के बाद भगवान् को जल, अर्घ्य व एक निस्वार्थ असहायों की सेवा करके हम अपने द्वारा किये गये पाप से बरी नहीं हो सकते।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्योंकि कर्मों का फल तो हर व्यक्ति को भुगतना ही पड़ता है। इससे भगवान भी नहीं बच सके तो इंसान की क्या बिसात? अगर समाज से श्रेष्ठ कर्म यानी दया-भाव का खात्मा हो जाये तो यह बस्ती इंसानों की बस्ती न कहलाकर पशु-पक्षियों से भी गई-बीती बस्ती कहलायेगी। इंसान द्वारा इंसान से प्रेम किया जाना मनुष्यता की पहली पहचान है। इस प्रकार हम भी अधिक नहीं तो थोड़ी सी दया-भावना मन में रखकर पी‍ड़ित मानवता की सेवा कर इस उक्ति को सार्थक कर सकते हैं कि दया धर्म का मूल है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सज्जनों, मानव सेवा माधव सेवा का जज्बा अपने आप में इतना कूट-कूट कर भर दो। अपने समाज में असहाय बच्चे, असहाय बीमार बुजुर्ग, या समाज की सताई हुई दुखियारी माँ-बहन, सबके प्रति मानव सेवा माधव सेवा' की भावना से कार्य करें। निश्चित रूप से हमको आत्मिय सुख की प्राप्ति होगी, बीमार, अपाहिज, विकलांग, भूखे, नेत्रहीन व कुष्ठ रोगी के प्रति जो करुणा व दया के भाव के साथ हम जीते हैं तो विश्वास करें कि हम भगवान् के निकट जा रहे हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कई सज्जन लोगों में यह भावना  कूट-कूट कर भरी हुई है,ऐसे संस्कारी लोगों ने कई असहायों को अपनाया है तथा उनकी सेवा कार्य जारी है,इस प्रकार हम दया-भाव रखकर पी‍ड़‍ित मानवता की सेवा कर सकते हैं तथा ईश्वर के काफी करीब पहुंच सकते हैं..!!&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>आलसी-कछुवा</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/05/blog-post_41.html</link><pubDate>Sat, 9 May 2026 18:23:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-1940639497858491503</guid><description>एक समय की बात है। एक बड़े तालाब के नजदीक एक कछुआ युवती निवास करती थी। उसके शरीर से बहुत बुरी गंध आती थी और उसका चेहरा भी बहुत बदसूरत था। वह बहुत मूर्ख भी थी। साथ ही वह उतनी ही आलसी और तमाम तरह की गंदी आदतों वाली थी। उसका नाम पाशांडी था।&lt;div&gt;वह जिस तालाब के नजदीक रहती थी उस तालाब का पानी बहुत साफ था। तारे और तमाम दूसरे ग्रह नक्षत्र इस निर्मल सरोवर के जल में अपनी परछाईं नित्य प्रति देखते रहते और उसकी सुंदरता पर मुग्ध रहते, जब सरोवर के जल में अनंत तारों का प्रकाश फैल जाता, टिमटिमाते तारे उसके निर्मल जल में अठखेलियाँ करते प्रतीत होते और वह सरोवर पृथ्वी पर आकाश का एक छोटा टुकड़ा सा प्रतीत होता। ऐसे समय में का पाशांडी को सरोवर में कूदकर नहाना, इधर से उधर तक अपने सिर को उठाए तैरना बहुत सुखकर प्रतीत होता। वह पानी में दूर तक तैरती और फिर वापस लौटती। तारों की परछाइयों के बीच आनंद से ओतप्रोत होकर उनसे विभिन्न प्रकार के खेल खेलती।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उस सरोवर में एक चमकीला तारा रोज अपनी परछाईं देखने आता और जल की निर्मलता में अपने रूप सौंदर्य को देखकर खुद अपने ऊपर मोहित सा रहता। उसका नाम निकुंज था। वह का पाशांडी को रोज जल में अठखेलियाँ करते हुए देखता। उसे आश्चर्य होता कि का पाशांडी उसकी परछाईं के साथ बहुत समय तक बड़े प्यार से खेलती रहती थी। वह आकाश में इतनी दूर था कि का पाशांडी की बदसूरती को नहीं देख सकता था और न ही उसे यह पता था कि वह कितनी आलसी और मूर्ख युवती है। उसे सिर्फ इतना ही पता था कि रात में वह बहुत खुलकर उसकी परछाईं के साथ बहुत प्यार से तमाम तरह के खेल खेलती है। यह देख कर उसे बहुत अच्छा लगता था। एक दिन उसने सोचा कि वह अगर उसकी परछाईं&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पर इतनी मुग्ध है तो अगर वह वास्तव में उसे मिल जाए तो वह कितनी खुश होगी और उसे कितना अधिक प्रेम करेगी। यह सोच निकुंज मन-ही-मन का पाशांडी से प्रेम करने लगा। उसने निश्चय किया कि एक दिन वह उससे मिलने पृथ्वी पर अवश्य जाएगा और का पाशांडी से विवाह करेगा। जब उसके दोस्तों ने इस संबंध के बारे में सुना वे बुरी तरह परेशान हो गए। उन लोगों ने उसे समझाने की कोशिश की कि उसका निर्णय अत्यधिक खतरनाक है। किसी दूसरी भूमि पर जाना और वहाँ अपना घर बनाना तथा एक ऐसे व्यक्ति से संबंध स्थापित करना, जिसके बारे में वह कुछ नहीं जानता, किसी भी तरह उचित नहीं है। दूसरी भूमि के लोगों की आदतें और स्वभाव पूरी तरह अलग होते हैं, इसलिए उनके साथ सहज संबंध बनाना कतई आसान नहीं होता, परंतु निकुंज ने किसी की बात न मानी। सचमुच प्रेम में डूबे व्यक्ति को कुछ भी दिखाई नहीं देता, अतः एक दिन वह चमकीला तारा आकाश में अपने घर को छोड़ अपनी पूरी संपत्ति के साथ पृथ्वी पर का पाशांडी से मिलने उसके पास पहुँच गया। उसने अपनी पूरी संपत्ति का पाशांडी को अर्पित कर दी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जब का पाशांडी को इसका अहसास हुआ कि अचानक वह इतनी अमीर हो गई है और दुनिया में सबसे अलौकिक व्यक्ति से उसका विवाह हुआ है तो उसका सिर गर्व से ऊँचा उठ गया। वह और भी अहंकार से भर उठी। उसकी अकर्मण्यता और आलस्य भी निरंतर बढ़ता गया, अब वह पहले से भी अधिक आलसी और सुस्त हो गई थी। उसका घर पूरी तरह गंदगी से भरा और अस्त-व्यस्त रहता तथा उसका शरीर भी कीचड़ से सना होता, फिर भी वह उन्हें साफ करने का कोई प्रयास न करती। उसे यह देखकर भी बिल्कुल शरम नहीं आती कि उसके पति को बहुत गंदे और टूटे-फूटे बरतनों में खाना मिलता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;का पाशांडी के इस व्यवहार को देखकर निकुंज बहुत उदास और दुःखी हुआ, परंतु अत्यंत ध्यानपूर्वक वह अपनी पत्नी को समझाने का प्रयास करता रहा। उसे साफ सफाई से रहने और अपने व्यवहार में सुधार करने की प्रार्थना करता रहा, परंतु इन सबका का पाशांडी के ऊपर कोई असर नहीं पड़ा। वह दिन-ब-दिन और अधिक आलसी और आराम तलब होती गई। पैसे, धन-संपत्ति की अधिकता के कारण उसका अहंकार भी दिनों दिन और भी गहरा होता गया। ठीक ही कहा गया है कि किसी आलसी की आदत को सुधारना दुनिया में सबसे मुश्किल काम होता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अंत में परेशान होकर निकुंज ने उसे छोड़ देने की धमकी दी। उसके पड़ोसियों ने भी उसे समझाया कि वह अपनी आदतों में सुधार कर ले नहीं तो अगर उसके पति ने उसे छोड़ दिया तो उसकी स्थिति बहुत बुरी हो जाएगी, परंतु इतना होने के बावजूद भी का पाशांडी की आदतों में कोई बदलाव नहीं आया। अंत में पूरी तरह निराश हो जाने के बाद निकुंज अपनी सारी संपत्ति अपने साथ समेटकर वापस अपने घर आकाश में चला गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब अचानक का पाशांडी को अपनी गलती का एहसास हुआ। पति के वापस चले जाने से वह दुःख और पीड़ा से भर उठी। उसे अपना जीवन तमाम तरह के अभाव से ग्रस्त और परेशानियों से भरा हुआ प्रतीत हुआ। वह आकाश की ओर जाते हुई अपने पति को गिड़गिड़ाकर पुकारने लगी कि बस एक बार वह वापस चला आए, अब वह अपनी आदतों में सुधार कर लेगी और जैसा वह कहेगा, वैसा ही व्यवहार करेगी, परंतु अब बहुत देर हो चुकी थी। उसका पति फिर वापस कभी नहीं आया और वह अकेले ही पीड़ा और शरम में डूबी अपना जीवन निर्वाह करती रही।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आज भी का पाशांडी इस उम्मीद में रहती है कि उसका पति वापस पृथ्वी पर लौटकर आएगा। वह आकाश की ओर अपनी गरदन उठाएँ, निरंतर उसी तरफ देखती रहती है। दुःख से भरी हुई, धीरे-धीरे चलती, वह एकटक आकाश की ओर देखती है और उसे लगता है कि उसका पति किसी भी क्षण वापस आ सकता है। इस घटना के बाद का पाशांडी का नाम उस पूरे क्षेत्र में अत्यंत घृणा के साथ लिया जाने लगा। लोग उसका मजाक उड़ाते और वह सब के लिए घृणा का पात्र बन गई। उसे मूर्खता और गंदगी का पर्याय माना जाने लगा। उसको लेकर तमाम तरह के मुहावरे और गीत बने और लोग आज भी आलसी और अकर्मण्य पत्नियों को चेतावनी देने के लिए उसका उदहारण देते हैं और उन मुहावरों का प्रयोग करते हैं, जो उसके अपमान में बने थे। समाज की परित्यक्त स्त्रियों को शिक्षा देने के लिए आज भी खासी समाज में का पाशांडी की कथा कही जाती है।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>लंका का पुस्तकालय</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/05/blog-post_80.html</link><pubDate>Sat, 9 May 2026 18:21:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-583921067408688519</guid><description>लंका जलने के तीसरे दिन, जब राख अभी गर्म थी, विभीषण जी ने अशोक वाटिका के पीछे वाले गुप्त कक्ष का ताला खोला।&lt;div&gt;यह रावण का निजी पुस्तकालय था। सोने की दीवारें नहीं, ताड़पत्र थे। दस हज़ार से ज़्यादा। उन पर कोई राक्षसी मंत्र नहीं, सामवेद के स्वर, आयुर्वेद के सूत्र, नक्षत्र गणना, और वीणा के आलाप लिखे थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक युवा राक्षस, मेघनाद का बेटा अक्षय नहीं, उसका शिष्य तरणि, ने पूछा, "महाराज विभीषण जी, सब कहते हैं दशानन अजेय थे क्योंकि ब्रह्माजी का वरदान था। क्या यही उनकी शक्ति का रहस्य था?"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;विभीषण जी हँसे, पर हँसी में थकान थी। "वरदान कवच देता है, तलवार नहीं। भैया की शक्ति का रहस्य दस सिरों में नहीं था। वह दस सिरों में बँटा हुआ था।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पहला सिर – सुनने वाला&lt;/div&gt;&lt;div&gt;रावण पैदा पुलस्त्य ऋषिदेव जी के कुल में हुआ, जन्म से ब्राह्मण था। दस साल की उम्र में उसने अपने पिता विश्रवा जी से पूछा, "पिताजी, राक्षस क्यों डरते हैं?" विश्रवा ने कहा, "क्योंकि वे सुनते नहीं।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;रावण ने तब पहला तप किया। वह हिमालय गया, कैलाश जी की छाया में बैठा, और शिव जी का तांडव नहीं, शिवजी का मौन सुना। सात साल तक उसने सिर्फ सुना। हवा, पानी, यक्षों की फुसफुसाहट, मरते हुए पशुओं की साँस।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जब वह लौटा, तो उसके पास पहला सिर था – श्रोता। वह किसी भी भाषा को एक बार में समझ लेता। देव, दानव, नाग, पशु। इसीलिए वह यम से युद्ध कर सका, क्योंकि यम के भैंसे की थकान की आवाज़ सुन ली थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लोगों ने कहा, "रावण को वरदान मिला।" सच यह था कि उसने सुनने की तपस्या की थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दूसरा सिर – गाने वाला&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दूसरा रहस्य उसकी वीणा थी, रुद्र वीणा। रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए सिर काटे, यह कथा सब जानते हैं। पर वह सिर काटना बलि नहीं था, स्वर था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हर बार जब वह अपना सिर चढ़ाता, तो नाड़ी से एक नया स्वर निकलता। नौ बार उसने किया। दसवें बार शिवजी ने हाथ पकड़ लिया। कहा, "बस कर। तूने मृत्यु को संगीत बना दिया।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उस दिन से रावण के कंठ में वह शक्ति आई कि वह सामवेद को उल्टा गा सके। उल्टा सामवेद मृत्यु को रोकता नहीं, समय को धीमा करता है। इसीलिए लंका में घड़ी धीरे चलती थी। राक्षस सौ साल जवान रहते।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;विभीषण जी ने एक ताड़पत्र उठाया। उस पर रागभैरव उल्टा लिखा था। "भैया इसे रोज़ भोर में गाते थे। कहते थे, शक्ति मारने में नहीं, ठहरने में है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तीसरा सिर – गिनने वाला&lt;/div&gt;&lt;div&gt;रावण ज्योतिषी था, पर फलित नहीं, गणित। उसने लंका की नींव उस मुहूर्त में रखी जब शनि वक्री था। सबने कहा अपशकुन। उसने कहा, "वक्री ग्रह पीछे देखता है। जो पीछे देखे, वह गिरता नहीं।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसने नवग्रह को बंदी बनाया, यह भी आधा सच है। उसने उन्हें बंदी नहीं, बंधक बनाया। हर ग्रह से एक सूत्र लिया। मंगल से धातु विज्ञान, बुध से भाषा, शुक्र से संजीवनी का अधूरा सूत्र।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसका दसवाँ सिर यही था – संग्रहकर्ता। वह जानता था कि ज्ञान बाँटने से घटता नहीं, पर रोकने से सड़ता है। उसने रोक लिया। लंका का पुस्तकालय दुनिया का सबसे बड़ा था, पर द्वार बंद था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चौथा रहस्य – अहंकार नहीं, भय&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तरणि ने पूछा, "फिर हारे क्यों?"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;विभीषण जी ने राख पर हाथ फेरा। "क्योंकि उसने दस सिरों को एक साथ कभी नहीं सुना।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;रावण की असली शक्ति एकाग्रता थी। वह एक समय में एक ही सिर से सोचता। युद्ध में वह योद्धा, यज्ञ में ब्राह्मण, दरबार में राजा, वीणा पर कलाकार। पर जब सीता जी को लाया, तब पहली बार दसों सिर एक साथ बोले।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक ने कहा, यह अधर्म है। दूसरे ने कहा, यह प्रतिशोध है। तीसरे ने कहा, यह प्रेम है। चौथे ने कहा, यह परीक्षा है। पाँचवें ने कहा, यह नियति है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह सुन नहीं पाया। उसने सुनना बंद कर दिया था। जिस दिन उसने श्रोता सिर को चुप कराया, उसी दिन शिवजी का दिया हुआ स्वर टूट गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लोग कहते हैं रामजी ने नाभि में बाण मारा। नाभि में अमृत था, यह भी कथा है। सच यह है कि नाभि वह जगह है जहाँ से आवाज़ निकलती है। रावण की नाभि में वह पहला स्वर बचा था जो उसने कैलाश पर सुना था। रामजी ने उसे नहीं मारा, उसे मुक्त किया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बाण लगते ही रावण हँसा। विभीषण जी ने देखा था। अंतिम क्षण में दसों सिर एक साथ चुप हो गए, और पहली बार वह पूरा सुन पाया – अपने भीतर का मौन।उसने रामजी से कहा, "मुझे ब्राह्मण की तरह अग्नि देना।" वह वरदान नहीं माँग रहा था, वह याद दिला रहा था कि वह कौन था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;u&gt;रहस्य का अंत&lt;/u&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;विभीषण जी ने ताड़पत्र समेटे और कहा, "भैया जी की शक्ति तप था, संगीत था, गणना थी। पर शक्ति का रहस्य यह नहीं कि तुम कितना इकट्ठा कर लो। रहस्य यह है कि तुम कितना छोड़ सको।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;"उसने देवताओं से अमरता माँगी, ब्रह्माजी ने कहा नहीं। उसने मनुष्य और वानर को छोड़ दिया, क्योंकि उसे लगा वे तुच्छ हैं। वही छूट उसे ले डूबी। शक्ति जब चुनती है कि किसे छोटा समझे, तभी वह अंधी हो जाती है।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तरणि ने पूछा, "तो क्या रावण जी बुरे थे?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;विभीषण जी ने उत्तर नहीं दिया। उसने वीणा उठाई, जो कोने में रखी थी। एक तार टूटा था। उसने उसे छेड़ा। बेसुरी आवाज़ निकली।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;"बुरे नहीं, अधूरे थे। दस सिर होने का अर्थ दस बार सोचना नहीं, एक बार दसों को सुनना है। वह कभी नहीं कर पाये।बाहर लंका में नई सुबह हो रही थी। राख पर अंकुर फूट रहे थे। विभीषण जी ने पुस्तकालय का द्वार खोल दिया। पहली बार लंका के बच्चे अंदर आए, ताड़पत्र छुए, स्वर पढ़े।और तब, कहते हैं, हवा में कहीं दूर से रुद्र वीणा का उल्टा भैरव फिर बजा, पर इस बार धीमा नहीं, मुक्त। जैसे कोई बहुत पुराना श्रोता अंत में अपना ही गीत सुन रहा हो।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>मैं हर जीव में उपस्थित हूँ</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/05/blog-post_9.html</link><pubDate>Sat, 9 May 2026 17:57:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-1902278801988921855</guid><description>एक धनवान सेठ थे, जो श्री कृष्ण के परम भक्त थे। वे दिन-रात कान्हा का नाम जपते और प्रतिदिन स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर मंदिर में भोग लगाने जाते।&lt;div&gt;परंतु उनके साथ एक विचित्र बात होती—जैसे ही वे रास्ते में चलते, उन्हें नींद आ जाती और जब आँख खुलती तो सारे पकवान गायब मिलते। यह देखकर वे बहुत दुखी होते और कान्हा से शिकायत करते—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“प्रभु! मैं आपके लिए भोग बनाता हूँ, फिर भी आपको अर्पित क्यों नहीं कर पाता?”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तब कान्हा मुस्कुराकर कहते—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“वत्स, हर दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है। जो मेरे भाग्य में होगा, वही मेरे पास आएगा।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सेठ को यह बात समझ नहीं आई। उन्होंने दृढ़ निश्चय किया—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“प्रभु! कल मैं आपको भोग लगाकर ही रहूँगा।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अगले दिन वे सुबह-सुबह उठे, स्नान किया और अपनी पत्नी से अनेक प्रकार के स्वादिष्ट पकवान बनवाए। चार डिब्बों में भरकर वे मंदिर के लिए निकल पड़े और मन ही मन सोचते रहे—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“आज चाहे कुछ भी हो जाए, मैं सोऊँगा नहीं।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;रास्ते में उन्हें एक भूखा, दुबला-पतला छोटा बच्चा मिला, जो हाथ फैलाकर भोजन माँग रहा था। सेठ का हृदय पिघल गया और उन्होंने उसे एक लड्डू दे दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जैसे ही बच्चे को लड्डू मिला, वहाँ कई और भूखे बच्चे आ गए। उनकी हालत देखकर सेठ से रहा नहीं गया, और उन्होंने सबको भोजन बाँटना शुरू कर दिया। देखते ही देखते सारे पकवान बच्चों में बाँट दिए गए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तभी उन्हें याद आया—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“अरे! आज तो मैंने कान्हा को भोग लगाने का वचन दिया था…”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;थोड़े उदास मन से वे मंदिर पहुँचे और श्रीकृष्ण के सामने बैठ गए। तभी कान्हा प्रकट हुए और प्रेम से बोले—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“जल्दी लाओ मेरा भोग, मुझे बहुत भूख लगी है!”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सेठ ने संकोच से सारी बात बता दी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कान्हा मुस्कुराए और बोले—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“मैंने पहले ही कहा था—हर दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है। जिनके नाम थे, उन्होंने खा लिया। तुम व्यर्थ चिंता क्यों करते हो?”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;फिर कान्हा सेठ को अपने साथ उन बच्चों के पास ले गए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सेठ ने देखा—उन भूखे बच्चों के बीच स्वयं कृष्ण विभिन्न रूपों में भोजन करते हुए दिखाई दे रहे हैं। यह दृश्य देखकर उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कान्हा बोले—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“मैं हर जीव में उपस्थित हूँ। जब तुमने उन बच्चों को खिलाया, तब वास्तव में तुमने मुझे ही भोग लगाया। मैं अलग-अलग रूपों में, अलग-अलग स्थानों पर वही स्वीकार करता हूँ जो मेरे भाग्य में होता है।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यह सुनकर सेठ भाव-विभोर होकर प्रभु के चरणों में गिर पड़े और बोले—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“प्रभु, आपकी लीला अपरंपार है।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कान्हा हँसते हुए बोले—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“कल फिर भोग बनाना… और इस बार भी मुझे ही देना!”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सेठ और भगवान दोनों मुस्कुरा उठे।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>चिड़िया की परेशानी</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/05/blog-post_7.html</link><pubDate>Thu, 7 May 2026 08:28:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-6541320897083100389</guid><description>&lt;div&gt;घने जंगल में एक अनोखी चिड़िया रहती थी, जिसका नाम था कैसोवैरी। वह दिखने में तो चिड़िया थी, पर बाकी चिड़ियों की तरह उड़ नहीं सकती थी। उसके पंख छोटे और शरीर भारी था, इसलिए वह अधिकतर जमीन पर ही रहती थी। बचपन से ही दूसरी चिड़ियों के बच्चे उसे देखकर मज़ाक उड़ाते थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कोई कहता, “अरे, जब तू उड़ ही नहीं सकती तो चिड़िया किस काम की?”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कोई पेड़ की ऊँची डाल पर बैठकर चिल्लाता, “कभी हमारे पास भी आ जाया कर… हर समय जानवरों की तरह नीचे ही घूमती रहती है!”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इतना कहकर सब जोर-जोर से हँसने लगते। शुरू-शुरू में कैसोवैरी इन बातों को अनदेखा कर देती थी। वह सोचती थी कि शायद एक दिन सब उसे समझेंगे। लेकिन रोज़-रोज़ के तानों और मज़ाक ने धीरे-धीरे उसके दिल को दुखी कर दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक दिन वह बहुत उदास होकर एक पेड़ के नीचे बैठ गई। उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने आसमान की ओर देखते हुए कहा,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“हे ईश्वर! आपने मुझे चिड़िया क्यों बनाया? और अगर बनाया तो मुझे उड़ने की शक्ति क्यों नहीं दी? देखिए, सब मेरा मज़ाक उड़ाते हैं। अब मैं इस जंगल में एक पल भी नहीं रहना चाहती। मैं इस जगह को हमेशा के लिए छोड़कर जा रही हूँ।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यह कहकर कैसोवैरी धीरे-धीरे जंगल से बाहर जाने लगी। वह कुछ ही दूर पहुँची थी कि पीछे से एक भारी आवाज़ सुनाई दी—&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“रुको कैसोवैरी! तुम कहाँ जा रही हो?”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कैसोवैरी ने आश्चर्य से पीछे मुड़कर देखा। सामने एक बड़ा-सा जामुन का पेड़ खड़ा था। वही उससे बात कर रहा था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पेड़ ने प्यार से कहा,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“कृपया तुम यहाँ से मत जाओ। हमें तुम्हारी बहुत ज़रूरत है। पूरे जंगल में पेड़-पौधों के फलने-फूलने में तुम्हारा बहुत बड़ा योगदान है। तुम अपनी मजबूत चोंच से फलों को खाती हो और उनके बीज पूरे जंगल में बिखेर देती हो। उन्हीं बीजों से नए पेड़ उगते हैं और जंगल हरा-भरा बना रहता है।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पेड़ ने आगे कहा,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;“हो सकता है बाकी चिड़ियों के लिए तुम्हारा कोई महत्व न हो, लेकिन हमारे लिए तुम बहुत महत्वपूर्ण हो। तुम जैसी चिड़िया इस जंगल में और कोई नहीं है। तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता। इसलिए कृपया हमें छोड़कर मत जाओ।”&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पेड़ की बातें सुनकर कैसोवैरी की आँखों में चमक आ गई। उसे पहली बार महसूस हुआ कि वह इस दुनिया में बेकार नहीं है। भगवान ने उसे भी एक खास काम के लिए बनाया है। सिर्फ उड़ नहीं पाने से वह किसी से कम नहीं हो जाती है&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब उसका मन हल्का और खुश हो गया। उसने सोचा कि दूसरों की बातों से दुखी होना ठीक नहीं। हर किसी के अंदर कोई न कोई खास गुण होता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कैसोवैरी मुस्कुराई और खुशी-खुशी वापस जंगल की ओर लौट गई। अब वह पहले की तरह उदास नहीं थी। उसे अपने अस्तित्व और अपने महत्व का एहसास हो चुका था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;शिक्षा:&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी दूसरों से अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए। हर इंसान अपने आप में अनोखा और खास होता है। भगवान ने हर किसी को किसी न किसी विशेष उद्देश्य के लिए बनाया है। इसलिए हमें अपने गुणों को पहचानना चाहिए और सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीना चाहिए।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>भक्त माई पंजीरी जी</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/05/blog-post_6.html</link><pubDate>Wed, 6 May 2026 13:49:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-3145112525282816382</guid><description>&lt;div&gt;वृंदावन के पास एक गाँव में भोली-भाली माई ‘पंजीरी’ रहती थी।दूध बेच कर वह अपनी जीवन नैया चलाती थी। वह मदनमोहन जी की अनन्य भक्त थी।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ठाकुर मदनमोहन लाल भी उससे बहुत प्रसन्न रहते थे। वे उसे स्वप्न में दर्शन देते और उससे कभी कुछ खाने को माँगते, कभी कुछ। पंजीरी उसी दिन ही उन्हें वह चीज बनाकर भेंट करती,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह उनकी दूध की सेवा नित्य करती थी, सबसे पहले उनके लिए प्रसाद निकालती, रोज उनके दर्शन करने जाती और दूध दे आती।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन गरीब पंजीरी को चढ़ावे के बाद बचे दूध से इतने पैसे भी नहीं मिलते थे कि दो वक्त का खाना भी खा पाये, अतः कभी कभी मंदिर जाते समय यमुना जी से थोड़ा सा जल दूध में मिला लेती।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;फिर लौटकर अपने प्रभुजी की अराधना में मस्त होकर बाकी समय अपनी कुटिया में बाल गोपाल जी के भजन कीर्तन करके बिताती।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कृष्ण कन्हैया जी तो अपने भक्तों की टोह में रहते ही हैं, नित नई लीला करते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक दिन पंजीरी के सुंदर जीवन क्रम में भी रोड़ा आ गया। जल के साथ-साथ एक छोटी सी मछली भी दूध में आ गई और मदनमोहन जी के चढ़ावे में चली गई।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दूध डालते समय मंदिर के गोसाईं की दृष्टि पड़ गई। गोसाईं जी को बहुत गुस्सा आया, उन्होंने दूध वापस कर दिया,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पंजीरी को खूब डाँटा फटकारा और मंदिर में उसका प्रवेश निषेध कर दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पंजीरी पर तो जैसे आसमान टूट पड़ा। रोती-बिलखती घर पहुँची-ठाकुरजी; मुझसे बड़ा अपराध हो गया, क्षमा करो, पानी तो रोज मिलाती हूँ, तुमसे कहाँ छिपा है,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ना मिलाओ तो गुजारा कैसे हो ? और उस बेचारी मछली का भी क्या दोष ? उस पर तो तुम्हारी कृपा हुई तो तुम्हारे पास तक पहुँची।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन प्रभुजी, तुमने तो आज तक कोई आपत्ति नहीं की, प्रेम से दूध पीते रहे, फिर ये गोसाईं कौन होता है मुझे रोकने वाला।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;और मुझे ज़्यादा दुःख इसलिए है कि तुम्हारे मंदिर के गोसाईं ने मुझे इतनी खरी खोटी सुनाई और तुम कुछ नहीं बोले।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ठाकुर, यही मेरा अपराध है तो मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि तुम अगर रूठे रहोगे, मेरा चढ़ावा स्वीकार नहीं करोगे तो मैं भी अन्न-जल ग्रहण नहीं करुंगी,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यहीं प्राण त्याग दूंगी। भूखी प्यासी, रोते रोते शाम हो गई।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तभी पंजीरी के कानों में एक मधुर कंठ सुनाई दिया- माई ओ माई, उठी तो दरवाजे पर देखा कि एक अतिसुंदर किंतु थका-हारा सा एक किशोर कुटिया में झाँक रहा है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कौन हो बेटा...?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैया, बृजवासी ही हूँ, मदन मोहन के दर्शन करने आया हूँ। बड़ी भूख लगी है कुछ खाने का मिल जाए तो तुम्हारा बड़ा आभारी रहूँगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पंजीरी के शरीर में ममता की लहर दौड़ गई। कोई पूछने की बात है बेटा, घर तुम्हारा है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ना जाने तुम कौन हो जिसने आते ही मुझ पर ऐसा जादू बिखेर दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बड़ी दूर से आए हो क्या ? क्या खाओगे ? अभी जल्दी से बना दूँगी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अरे मैया, इस समय क्या रसोई बनाओगी, थोड़ा सा दूध दे दो वही पी कर सो जाउँगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दूध की बात सुनते ही पंजीरी की आँखें डबडबा आयीं, फिर अपने आप को सँभालते हुए बोली-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बेटा, दूध तो है पर सवेरे का है, जरा ठहरो अभी गैया को सहला कर थोड़ा ताजा दूध दुह लेती हूँ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अरे नहीं मैया, उसमें समय लगेगा। सवेरे का भूखा प्यासा हूँ, दूध का नाम लेकर तूने मुझे अधीर बना दिया है,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अरे वही सुबह का दे दो, तुम बाद में दुहती रहना।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;डबडबायी आँखों से बोली... थोड़ा पानी मिला हुआ दूध है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अरे मैया तुम मुझे भूखा मारोगी क्या ? जल्दी से दूध छान कर दे दो वर्ना मैं यहीं प्राण छोड़ दूंगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पंजीरी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये बालक कैसी बात कर रहा है, दौड़ी-दौड़ी गई और झटपट दूध दे दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दूध पीकर बालक का चेहरा खिल उठा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैया, कितना स्वादिष्ट दूध है। तू तो यूँ ही ना जाने क्या-क्या बहाने बना रही थी,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब तो मेरी आँखों में नींद भर आई है, अब मैं सो रहा हूँ, इतना कहकर वो वहीं सो गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पंजीरी को फ़ुर्सत हो गई तो दिन भर की थकान, दुःख और अवसाद ने उसे फिर घेर लिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जाड़े के दिन थे ,भूखे पेट उसकी आँखों में नींद कहाँ से आती। जाडा़ बढ़ने लगा तो अपनी ओढ़नी बालक को ओढ़ा दी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दूसरे प्रहर जो आँख लगी कि ठाकुर श्री मदन मोहन लाल जी को सम्मुख खड़ा पाया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ठाकुर जी बोले, मैया, मुझे भूखा मारेगी क्या ? गोसाईं की बात का बुरा मान कर रूठ गयी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;खुद पेट में अन्न का एक दाना तक न डाला और मुझे दूध पीने को कह रही है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैंने तो आज तेरे घर आकर दूध पी लिया अब तू भी अपना व्रत तोड़ कर कुछ खा पी ले और देख,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैं रोज़ तेरे दूध की प्रतीक्षा में व्याकुल रहता हूँ, मुझे उसी से तृप्ति मिलती है। अपना नियम कभी मत तोड़ना।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;गोसाईं भी अब तेरे को कुछ ना कहेंगे। दूध में पानी मिलाती हो, तो क्या हुआ ? उससे तो दूध जल्दी हज़म हो जाता है। अब उठो और भोजन करो।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पंजीरी हड़बड़ाकर उठी, देखा कि बालक तो कुटिया में कहीं नहीं था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सचमुच लाला ही कुटिया में पधारे थे। पंजीरी का रोम-रोम हर्षोल्लास का सागर बन गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;झटपट दो टिक्कड़ बनाए और मदन मोहन जी को भोग लगाकर आनंदपूर्वक खाने लगी। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;थोड़ी देर में सवेरा हो गया पंजीरी ने देखा कि ठाकुर जी उसकी ओढ़नी ले गये हैं और अपना पीतांबर कुटिया में ही छोड़ गए हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इधर मंदिर के पट खुलते ही गोसाईं ने ठाकुर जी को देखा तो पाया की प्रभुजी एक फटी पुरानी सी ओढ़नी ओढ़े आनंद के सागर में डूबे हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसने सोचा कि प्रभुजी ने अवश्य फिर कोई लीला की है, लेकिन इसका रहस्य उसकी समझ से परे था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लीला-उद्घाटन के लिए पंजीरी दूध और ठाकुर जी का पीताम्बर लेकर मंदिर के द्वार पर पहुँची और बोली -&lt;/div&gt;&lt;div&gt;गुसाईं जी, देखो तो लाला को, पीतांबर मेरे घर छोड़ आये और मेरी फटी ओढ़नी ले आये।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल सवेरे आपने मुझे भगा दिया था, लेकिन भूखा प्यासा मेरा लाला दूध के लिये मेरी कुटिया पर आ गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;गोसाईं जी पंजीरी के सामने बैठ गए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भक्त और भगवान के बीच मैंने क्या कर डाला, भक्ति बंधन को ठेस पहुंचा कर मैंने कितना बड़ा अपराध कर डाला, माई, मुझे क्षमा कर दो।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पंजीरी बोली.. गुसाई जी, देखी तुमने लाला की चतुराई, अपना पीतांबर मेरी कुटिया मे जानबूझकर छोड़ दिया और मेरी फटी-चिथड़ी ओढ़नी उठा लाये।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भक्तों के सम्मान की रक्षा करना तो इनकी पुरानी आदत है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ठाकुरजी धीरे-धीरे मुस्कुरा रहे थे, अरे मैया तू क्या जाने कि तेरे प्रेम से भरी ओढ़नी ओड़ने में जो सुख है वो पीतांबर में कहाँ।&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item><item><title>बाँसुरी की जादुई पुकार</title><link>http://shrirambagmandir.blogspot.com/2026/05/blog-post_5.html</link><pubDate>Tue, 5 May 2026 09:38:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-2285792650623177350.post-8687831136180193734</guid><description>&amp;nbsp;जब हीरों का हार छोड़कर चोर ने माँगा कृष्ण के चरणों का एक साधारण मोरपंख।"&lt;div&gt;"यह कहानी भक्त और भगवान के अटूट भाव पर आधारित है।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लखन नाम का एक शातिर चोर था, जिसके मन में न तो ईश्वर के लिए कोई स्थान था और न ही इंसानियत के लिए। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी चोरी और हेरा-फेरी में गुज़ार दी थी। एक शाम उसे खबर मिली कि पास के गाँव के पुराने राधा-कृष्ण मंदिर में ठाकुर जी को बहुत कीमती और प्राचीन गहने पहनाए गए हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लखन ने मन ही मन तय कर लिया कि आज की यह चोरी उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और आख़िरी चोरी होगी, जिससे वह अपनी आगे की ज़िंदगी ऐशो-आराम से बिताएगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आधी रात को जब पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा था, लखन मंदिर की दीवार फाँदकर भीतर घुस गया। मंदिर के गर्भगृह में घना अँधेरा था और बस एक छोटा सा दीया टिमटिमा रहा था। जैसे ही वह प्रतिमा के करीब पहुँचा, उसे अचानक हवाओं में एक बहुत ही मधुर बाँसुरी की धुन सुनाई देने लगी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह चौंक गया क्योंकि मंदिर में उसके सिवा और कोई नहीं था। उसने अपनी आँखें मलीं और देखा कि राधा-कृष्ण की प्रतिमा से एक हल्की और अलौकिक नीली रोशनी निकल रही है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लखन ने अपने डर को दबाया और प्रतिमा के गले से हीरों का हार उतारने के लिए हाथ बढ़ाया। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र श्री कृष्ण की मंद-मंद मुस्कुराती मूरत पर पड़ी, उसके हाथ जैसे पत्थर के हो गए। उसे लगा कि वे पत्थर की आँखें उसे देख रही हैं और पूछ रही हैं— "लखन, क्या तू सच में यही लेने आया है?"&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उस मुस्कान में इतनी करुणा और ऐसा खिंचाव था कि लखन की हिम्मत जवाब दे गई। उसके हाथ से औज़ार गिर पड़े और वह वहीं घुटनों के बल बैठ गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उस अँधेरे मंदिर में लखन को अपने जीवन का एक-एक पाप किसी फिल्म की तरह याद आने लगा। उसे याद आया कि कैसे उसने गरीबों को सताया लोगों की मेहनत की कमाई लूटी। पहली बार उसे अपने कृत्यों पर शर्म महसूस हुई। वह फफक-फफक कर रोने लगा और प्रतिमा के चरणों में सिर रखकर माफी माँगने लगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह कहने लगा— "प्रभु, मैं तो आपको लूटने आया था, पर आपने तो मेरी आत्मा ही बदल दी"। पूरी रात वह उसी संगीत और उस दिव्य रोशनी के घेरे में रोता रहा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सुबह जब मंदिर के पुजारी जी ने पट खोले, तो उन्होंने देखा कि एक आदमी ठाकुर जी के चरणों में सिर रखकर सोया हुआ है। उसके पास चोरी के औज़ार पड़े थे, लेकिन उसके हाथ में कोई गहना नहीं, बल्कि एक मुरझाया हुआ मोरपंख था जो शायद रात में प्रतिमा से उसके ऊपर गिर गया था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पुजारी ने जब उसे जगाया, तो लखन की आँखों में वो शातिरपन नहीं, बल्कि एक असीम शांति थी। वह अब चोर नहीं, बल्कि एक 'भगत' बन चुका था। उस दिन के बाद लखन ने मंदिर की सेवा में अपना जीवन लगा दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सीख : परमात्मा की शरण में जाने के लिए पहले से पवित्र होना ज़रूरी नहीं है। उनकी एक नज़र ही सबसे बड़े अपराधी को भी पवित्र करने की शक्ति रखती है। ईश्वर को केवल भाव चाहिए, चाहे वह पश्चाताप के आँसुओं में ही क्यों न हो।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>noreply@blogger.com (Pt. Laxmi Kant Sarma And Other)</author></item></channel></rss>